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01.15.2012
 
बंद होठों को अब तुम्हें खोलना चाहिये
सुशील कुमार

बंद होठों को अब तुम्हें खोलना चाहिये ।

चुप रहे इतने दिन, दुःख सहे कितने दिन
विदीर्ण हॄदये, अब तुम्हें बोलना चाहिये ।
कितनी धैर्य-परीक्षा दे, करोगी अपनी रक्षा
माते, केशपाश तुम्हें अपना खोलना चाहिये।

हे शिवरुपा, हे आद्याशक्ति, हे कपाल-कुंडला
तुम्हें अपना अंतस्ज्वाल टटोलना चाहिये,
हृदय में पडा़ महामौन अब तोड़ना चाहिये ।


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