कविता
अपने हृदय की ओर
तुम्हारे हाथ
ठूँठ होते पहाड़
ढीली पड़ती मुट्ठियाँ
पहाड़ का दुःख
पहाड़िया
पहाड़ी नदी के बारे
में
बंद होठों
को अब तुम्हें ...
बाँसलोय में
बहत्तर ऋतु
महुआ के फूलने के मौसम में
माँ अब
मैं पहाड़ की बेटी
आलेख
लोकजीवन
के अन्यतम चितेरे : कविवर बाबा त्रिलोचन
‘शब्द
और संस्कृति’-
हमारे समय,
लोक और संस्कृति का अर्थपूर्ण अवगाहन
- पुस्तक चर्चा