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09.19.2017


 मूर्ति

पत्थर हो या इंसान -- भीतर की आग जब बाहर निकलती है तो यही होता है।---

 

हो सकता है, आज जो सत्य-कथा मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ वह आपको सुनने में अविश्वसनीय लगे। लेकिन कई बार सच पर यक़ीन कर पाना आसान नहीं होता। यह सत्य-कथा मुझे मेरे एक संवेदनशील मित्र भास्कर ने कुछ अरसा पहले सुनाई। मैं चाहता हूँ कि आप सब भी यह दास्तान सुनें।

भास्कर पिछले पंद्रह-बीस सालों से देश के आदिवासी इलाक़ों में आदिवासियों की भलाई के लिए एक एन. जी. ओ. चला रहा है। उसका एन. जी. ओ. "सवेरा" आदिवासियों को शिक्षित और जागरूक बनाने की दिशा में बहुत अच्छा काम कर रहा है। भास्कर दिन-रात जंगल-पहाड़ आदि की परवाह किए बिना किसी जुनूनी आदमी की तरह देश के दूर-दराज़ के आदिवासी इलाक़ों में अपने काम में लगा रहता है। छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, झारखंड, उड़ीसा, बंगाल और तेलंगाना के आदिवासी इलाक़ों में लगभग हर आदिवासी भास्कर और उसके एन. जी. ओ. के नाम और काम से परिचित है।

महीना भर पहले जब भास्कर कुछ दिनों के लिए दिल्ली आया तो एक दिन मैंने उसे अपने घर खाने पर बुलाया। वहीं बातों-बातों में उसने मुझे यह सत्य-कथा सुनाई। अब यह अजीब दास्तान आप उसी के शब्दों में सुनिए --

 

कई साल पहले छत्तीसगढ़ के दांतेवाड़ा ज़िले में सरकार ने आदिवासियों की लगभग दो सौ एकड़ उपजाऊ ज़मीन उनसे औने-पौने दाम पर ज़बरदस्ती ले ली। असल में राज्य के एक बड़े उद्योगपति जतन नाहटा ने वहाँ कोल्ड-ड्रिंक बनाने का प्लांट लगाने का मन बना लिया था। नाहटा राज्य के शीर्ष नेताओं और आला अफ़सरों को जानता था, सभ्यता के अंधकार में चमकती थीं जिनकी खुर्रांट आँखें। नाहटा को अपना काम करवाने के सभी गुर आते थे। लिहाज़ा उसे आदिवासियों की यह दो सौ एकड़ उपजाऊ ज़मीन सस्ते में ही मिल गई। बहुत से स्थानीय आदिवासी बेघर-बार हो गए। उन्होंने विरोध भी किया, लेकिन बेचारे आदिवासियों की सुनता ही कौन है। मुट्ठी भर अमीर लोगों के उल्लास का रंग आदिवासियों के उदासी के रंग का जनक था। उनके आकाश का चाँद कीचड़ में सना पड़ा था। रात की पीठ में किसी ख़ंजर के गहरे घाव-सा था उनका समय। सीलिंग-फ़ैन से टकरा कर कट गई तड़पती चिड़िया-सा था उनका समय। पानी से बाहर खींच ली गई छटपटाती मछली-सा था उनका समय। विस्थापित आदिवासियों की दुर्दशा देख कर जैसे सितारों की आँखें भीग गई थीं। जैसे हवा की बोली में एक बेचारगी-सी आ गई थी। स्तब्ध रात में जब हवा चलती तो लगता जैसे नक्षत्र रो रहे हों।

आख़िर प्लांट बन कर तैयार हो गया। वह एक ऐसी सुबह थी जो रात के रंग की थी। इस फ़ैक्ट्री-परिसर में ही जतन नाहटा ने अपने लिए एक शानदार कोठी भी बनवाई जो सुख-सुविधा के सभी साधनों से लैस थी। जब कभी सुरक्षा-कर्मियों से घिरा नाहटा अपने प्लांट के दौरे पर आता तो उसी शानदार मकान में रहता।

ज़ख़्म पर नमक यह कि नाहटा को आदिवासियों पर कोई भरोसा नहीं था। उनके बारे में उसकी धारणा अच्छी नहीं थी। इसलिए उसने अपने कारख़ाने में स्थानीय आदिवासियों को नौकरी नहीं देने के स्पष्ट निर्देश दे रखे थे। ग़ैर-आदिवासी मज़दूरों को कारख़ाने में काम करने के लिए दूसरे राज्यों से लाया गया। बेचारे स्थानीय आदिवासी कहीं के नहीं रहे। एक तो उनकी पुश्तैनी ज़मीन उन से छीन ली गई थी। दूसरे, उन्हीं की ज़मीन पर बने कारख़ाने में उन्हें ही नौकरी नहीं दी जा रही थी।

मुझसे यह अन्याय देखा नहीं गया। मैं रायपुर में जतन नाहटा से मिला। मैंने उसे बहुत समझाया कि अगर वह अपने प्लांट में स्थानीय आदिवासियों को नौकरी देगा तो वहाँ के आदिवासियों में उसके प्रति रोष कम हो जाएगा। हालाँकि नाहटा मुझसे शिष्टता से मिला लेकिन वह अपने स्टैंड से टस-से-मस नहीं हुआ। जैसे पत्ते पेड़ों से चिपके रहते हैं, वैसे ही वह चिपका रहा अपने नज़रिए से।

" ये स्साले "झिंगालाला हो" लोग किसी काम के नहीं होते। भास्कर बाबू, अगर आप इन आदिवासियों के लिए फिर भी काम करना चाहते हैं तो शौक़ से कीजिए। मेरी शुभकामनाएँ।" यह कह कर नाहटा ने मेरी बात टाल दी।

उस पल मेरी निगाह से वह ऐसा गिरा जैसे गिरता है कोई दुनिया की सबसे ऊँची इमारत से। दरअसल नाहटा जैसे लोग Kxuद को काजू, किशमिश और मेवा समझते थे। लेकिन वे छिलकों से भी गए-गुज़रे थे। वे आईने की भ्रामक गहराई को सच समझते थे। यह युग ही ऐसा था कि यहाँ बौने लोग डाल रहे थे लम्बी परछाइयाँ। हर खोटी अठन्नी रुपए के भाव चल रही थी जबकि असली रुपया धूल में उपेक्षित पड़ा था। छेनी, हथौड़ा, फावड़ा, रेगमार, खुरपी और हँसिया यहाँ रो रहे थे जबकि हर डकार-मारू तोंद यहाँ ऐश कर रही थी।

नाहटा के इंकार के बावजूद मैंने अपना प्रयास जारी रखा। बीच-बीच में उससे मिल कर मैं उसे समझाने की कोशिश करता रहता।

जतन नाहटा से अपनी मुलाक़ातों के दौरान मुझे पता चला कि उसे प्राचीन और दुर्लभ मूर्तियाँ आदि इकट्ठा करने का शौक़ है। एक बार जब मैं रायपुर में उसके बंगले पर उससे मिलने गया तो मुझे उसके ड्राइंग-रूम के एक कोने में किसी आदिवासी-देवता की बहुत पुरानी आदमक़द मूर्ति रखी दिखी। मेरे पूछने पर नाहटा ने मुझे बताया-

"अभी हाल ही में मैं दांतेवाड़ा में अपनी फ़ैक्ट्री के दौरे पर गया था। तब किसी ने मुझे बताया कि पास के एक आदिवासी गाँव के मुखिया के पास किसी आदिवासी-देवता की प्राचीन और दुर्लभ मूर्ति है। यह सुनकर मैं उस गाँव में गया। मूर्ति देखते ही मेरे मन ने कहा - यह तो संग्रहणीय है। इसे मेरे पास होना चाहिए।

इतनी बेशक़ीमती मूर्ति इन गँवारों के पास क्या कर रही है। लेकिन आदिवासी लोग इसे बेचने के लिए तैयार ही न हों। वे इसे अपना ग्राम-देवता बताते थे और इसकी पूजा करते थे। मैंने उन्हें बहुत लालच दिया पर वे नहीं माने। तब मुझे दूसरे तरीक़े से इस मूर्ति को हासिल करना पड़ा।"

मुझे बेचारे आदिवासियों से सहानुभूति हुई। हमने उनकी नदियाँ-जंगल-पहाड़, सब उनसे छीन लिये थे। उनकी नदियों पर हमने जगह-जगह बाँध बना दिये थे जिससे उनकी हज़ारों एकड़ ज़मीन पानी में डूब गई थी और वे विस्थापित हो गए थे। हमने उनके जंगल काट डाले थे और उन्हें उनके ही इलाक़े से बेदख़ल कर दिया था। हम उनके पहाड़ों से चट्टानें काट-काट कर अपने नगर और महानगर बसा रहे थे। वे अपनी आजीविका के लिए जिस प्रकृति की देन पर निर्भर थे, हमने उसका अंधाधुँध दोहन करके आदिवासियों को कहीं का नहीं छोड़ा था। मजबूरी में इनकी युवतियाँ महानगरों के साहब लोगों के घरों में नौकरानियों का काम कर रही थीं जहाँ इनका हर प्रकार से शोषण हो रहा था। हर तरह के शोषण और अत्याचार से तंग आ कर इनके युवक हथियार उठा रहे थे और पुलिस से मुठभेड़ों में मारे जा रहे थे। हम अपनी फ़िल्मों में इन आदिवासियों की वेश-भूषा, इनकी बोली और इनके रहन-सहन का मज़ाक उड़ा रहे थे। इन्हें उपहास का पात्र बना रहे थे। हमने इनकी उपजाऊ ज़मीन पर क़ब्ज़ा करके वहाँ फ़ैक्ट्रियाँ बना ली थीं। इतना सब कर के भी जब हमारा मन नहीं भरा था तो अब हम आदिवासियों से इनकी जीवन-पद्धति और इनके देवी-देवता भी छीन रहे थे। इस देश के इन मूल निवासियों के साथ हम यह कैसा व्यवहार कर रहे थे?

मुझ से रहा नहीं गया और मैंने स्थानीय लोगों के माध्यम से दांतेवाड़ा के उस गाँव के आदिवासी-देवता की मूर्ति की चोरी की रपट वहाँ के थाने में लिखवा दी। साथ ही यह सूचना भी दे दी कि वह मूर्ति इस समय जतन नाहटा के घर में है। इस मामले में मैं स्वयं पर्दे के पीछे ही रहा ताकि नाहटा मेरे एन. जी. ओ. का नुक़सान नहीं करे। लेकिन जतन नाहटा जैसे उद्योगपति के हाथ बहुत लम्बे थे। उसने हर स्तर पर रिश्वत दे कर मामले को रफ़ा-दफ़ा करवा दिया। मैंने मीडिया में भी नाहटा की करतूत का पर्दाफ़ाश करवाया। पर वह राज्य के सत्तारूढ़ दल को चुनाव के समय तगड़ा चंदा देता था। लिहाज़ा राज्य सरकार ने उसके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की। मन मसोस कर मैंने अपना पूरा ध्यान अपने एन. जी. ओ. को चलाने में लगा दिया। अपने एन. जी. ओ. के माध्यम से मैं जो भी थोड़ा-बहुत इन आदिवासियों के लिए कर सकता था, करता रहा।

इसके बाद साल भर मैं छत्तीसगढ़ से बाहर दूसरे राज्यों के आदिवासी इलाक़ों में व्यस्त रहा। जब मैं वापस रायपुर लौटा तो एक दिन मुझे पता चला कि रतन नाहटा काफ़ी समय से बीमार था और अस्पताल में भर्ती था। किसी ने बताया कि उसकी दिमाग़ी हालत अब ठीक नहीं थी। यह सुन कर मुझे हैरानी हुई। साल भर पहले तो वह बिल्कुल ठीक-ठाक था।

उत्सुकतावश नाहटा का पता लगा कर मैं उससे मिलने अस्पताल में पहुँचा। वह उस महँगे प्राइवेट अस्पताल के मनोरोगी वार्ड में भर्ती था। डॉक्टरों से पूछने पर पता चला कि उसे "ऐक्यूट पैरानोइया" और "स्किज़ोफ़्रीनिया" जैसा कुछ मर्ज़ हो गया है। वहाँ मौजूद उसके घरवालों ने बताया कि उसे काल्पनिक आवाज़ें सुनाई देती हैं। वह किसी अदृश्य व्यक्ति से बातें करता है। उसे यह भय भी सताता रहता है कि कोई उसकी हत्या करने के लिए आ रहा है। कभी वह अवसाद-ग्रस्त हो जाता है, कभी हिंसक हो उठता है। वग़ैरह।

उसकी पत्नी वसुंधरा रोते हुए कहने लगी, " भाई साहब, पता नहीं इन्हें क्या हो गया है। इलाज का भी कोई फ़ायदा नहीं हो रहा।" मैंने उसे सांत्वना दी और हिम्मत से काम लेने के लिए कहा।

हालाँकि डॉक्टर मुझे नाहटा से मिलने देने के लिए पहले राज़ी नहीं हुए, लेकिन अपने जोख़िम पर मैंने डॉक्टरों को मना लिया।

"सावधान रहिएगा," एक डॉक्टर ने मुझे चेतावनी दी।

जब मैं नाहटा के कमरे में दाख़िल हुआ तो वह अपने बिस्तर पर उकड़ूँ बैठा हुआ दीवार को घूर रहा था। उसकी दाढ़ी बेतरतीबी से बढ़ी हुई थी। उसके सिर के अधिकांश बाल इस थोड़े से अरसे में ही सफ़ेद हो गए थे।

मैंने धीरे से उसका नाम लिया और वह मेरी ओर पलटा। कुएँ के तल पर जो आदिम अँधेरा होता है वैसा कुछ उसकी आँखों में भरा हुआ था। वह मुझे घूर रहा था। खोई हुई निगाहों से। जैसे उसके लिए चेहरों के कोई नाम न हों। दिनों का कोई वार न हो।

फिर भी मैंने उसे धीरे से अपना नाम बताया और अचानक जैसे वह अँधेरे को लाँघ कर रोशनी में लौट आया। उसके चेहरे की उदास मुस्कान में पहचान का मद्धिम बल्ब जल उठा।

"यह सब कैसे हुआ?" मैंने कुर्सी पर बैठते हुए पूछा।

"मूर्ति...।" वह अस्पष्ट-सा कुछ बुदबुदाया। ज़ाहिर है, वह उस आदिवासी-देवता की मूर्ति की बात कर रहा था। उसकी सहमी हुई आँखों में एक गूँगा रुदन था।

"क्या हुआ?" मैंने कोमल स्वर में फिर पूछा।

"उस मूर्ति में आदिवासियों ने जादू-टोना कर दिया है। वह मूर्ति नहीं, काला जादू है। रात में वह मूर्ति किसी भयानक जीवित आदमी में बदल जाती है। एक रात जब मैं सो रहा था, वह मूर्ति वाला आदमी मेरे बेड-रूम में घुस आया। मेरी छाती पर चढ़ कर वह मेरा गला दबाते हुए कहने लगा- "मैं तेरा ख़ून पी जाऊँगा।" बहुत मुश्किल से जान बचा कर मैं वहाँ से भाग पाया। मेरे घरवाले और डॉक्टर, सब मुझे पागल समझते हैं। कोई मेरी बात पर यक़ीन नहीं करता। लेकिन मैं सच कह रहा हूँ, मैं पागल नहीं हूँ। भास्कर बाबू, मुझे बचा लो।" उसकी चेतना के मुहाने पर दु:स्वप्नों की दस्तक थी।

"हो सकता है, आप ने कोई बुरा सपना देखा हो। यह सब आप का वहम भी तो हो सकता है," उसके कंधे पर हाथ रखकर मैंने उसे सांत्वना दी। उसकी देह बर्फ़ की सिल्ली-सी ठंडी थी। उसकी आँखों में अंतरिक्ष का काला खोखल भरा था।

"पहले मुझे भी ऐसा लगा था। लेकिन उस रात के बाद भी जब दो-तीन बार और वही मूर्ति वाला भयानक आदमी उसी तरह बेड-रूम में मेरी छाती पर चढ़ कर मेरा गला दबाने लगा तो मैं समझ गया, यह कोई काला जादू है। अँधेरे में उसकी जलती कोयले-सी दहकती आँखें मैं नहीं भूल सकता," नाहटा ने कहा। वह पाशविक अँधेरे में लिपटा था। उसके धूप-विहीन चेहरे में धँसी ऊष्मा-रहित आँखें डरावनी लग रही थीं।

"अब वह मूर्ति कहाँ है? " मैंने पूछा।

"मेरे मकान के तहख़ाने में। लेकिन मैं अब उस मकान में वापस नहीं जाऊँगा।" नाहटा के चेहरे पर भय की रेखाएँ फैलने लगी थीं। अचानक वह चीख़ा, "देखो, देखो। वह मुझे मारने आ रहा है। बचाओ, बचाओ ...।" वह डर के मारे चिल्ला रहा था। उसका चेहरा राख के रंग का हो गया था। वह जैसे अपने दु:स्वप्नों के भँवर में फँसा छटपटा रहा था।

फिर जैसे गाड़ी का गियर बदल जाता है, ठीक वैसे ही उसके हाव-भाव में परिवर्तन आ गया। अब वह ग़ुस्से में आ गया था। मैं आशंकित हो कर कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। उसने कुर्सी उठाई और दीवार पर निशाना साध कर किसी अदृश्य व्यक्ति पर वह कुर्सी दे मारी।

डॉक्टरों ने मुझे फ़ौरन कमरे से बाहर बुला लिया। फिर कुछ वार्ड-बोएज़ ने आ कर नाहटा को पकड़ा। वह लगातार उनसे छूटने के लिए जद्दोजहद कर रहा था। जैसे उसकी धमनियों में बाढ़ का शोर हो। शिराओं में सुनामी आ गई हो। साँसें किसी चक्रवात की चपेट में हों। बहुत मुश्किल से डॉक्टर उसे शांत करने के लिए सोने का इंजेक्शन लगा पाया।

हालाँकि नाहटा ने आदिवासियों के साथ जो किया था, मैं वह जानता था लेकिन फिर भी मुझे उसकी हालत पर तरस आ गया। उसका जीवन मौत से ज़्यादा निर्मम हो गया था। पर मेरे पास फ़ुर्सत नहीं थी। मैं अपने एन. जी. ओ. के काम में व्यस्त हो गया।

दो माह बाद जब मैं दोबारा रायपुर लौटा तो वहीं मुझे यह ख़बर मिली कि पागलपन की हालत में ही जतन नाहटा ने अस्पताल के कमरे में आत्म-हत्या कर ली थी। पता चला कि एक रात उसने खिड़की का काँच तोड़ कर उस काँच से अपने हाथ की नस काट ली। किसी ने बताया कि अपने अंतिम दिनों में वह किसी मूर्ति वाले भयानक आदमी से बुरी तरह डरा रहता था। उसे पागलपन के भयानक दौरे पड़ते थे।

यह सुन कर मैं सोचने लगा - इंसान अपने लिए स्वयं ही सोने-चाँदी की बेड़ियाँ और हथकड़ियाँ बना लेता है। और ऐश्वर्य के कारावास भी। दौलत की हवस आदमी से क्या-क्या नहीं करवाती। वह दूसरों का हक़ मारता है। औरों के हिस्से की धूप, पानी, हवा, आकाश छीनता है। लेकिन अंत में सब कुछ यहीं धरा रह जाता है। आगे केवल अर्थी होती है। चिता होती है। अस्थियाँ होती हैं। बस।

नाहटा की ऐसी मौत की ख़बर सुनकर मुझे अफ़सोस हुआ लेकिन बार-बार मूर्ति वाली वह अजीब बात याद आ जाती। इसलिए एक दिन मैं नाहटा की पत्नी वसुंधरा से मिलने उसके बंगले पर पहुँचा। उसकी पत्नी से संवेदना व्यक्त करते हुए मैंने आदिवासी-देवता की उस प्राचीन मूर्ति के बारे में जानना चाहा।

"वह तो तहख़ाने में पड़ी है।" नाहटा की पत्नी वसुंधरा केवल इतना ही बता पाई। तब मैंने उसे उस मूर्ति के बारे में सारी बात बताई कि कैसे उसे दांतेवाड़ा के एक स्थानीय आदिवासी-गाँव से चुरा कर यहाँ लाया गया था। मैंने इच्छा प्रकट की कि वह मूर्ति वापस उसी आदिवासी-गाँव के निवासियों को सौंप दी जाए जहाँ से वह चुराई गई थी। वह वहाँ के देवता की मूर्ति थी। उस गाँव के आदिवासी उस मूर्ति की पूजा करते थे। यह उनकी परम्परा का अभिन्न अंग था।

"ले जाइए इसे। हमारे लिए तो यह केवल दुर्भाग्य ले कर ही आई। इसी के कारण इनकी जान चली गई।" आदिवासी-देवता की वह प्राचीन मूर्ति मुझे सौंपते हुए नाहटा की पत्नी वसुंधरा रोने लगी थी।

उस मूर्ति को छू कर देखने पर न जाने क्यों मुझे भी ऐसा लगा जैसे वह कोई साधारण मूर्ति नहीं थी। जैसे उसके सीने में दिल जैसा कुछ धड़क रहा था।

मैंने वह मूर्ति उस गाँव के आदिवासियों को वापस लौटा दी जहाँ पहले की तरह ही अब वे अपने धार्मिक रीति-रिवाजों और परम्पराओं का पालन करते हैं।

मैंने बहुत प्रयास किया कि जतन नाहटा ने अपना प्लांट बनाने के लिए आदिवासियों की जो दो सौ एकड़ ज़मीन ले ली थी, वह उन आदिवासियों को वापस लौटा दी जाए। दरअसल नाहटा की पत्नी वसुंधरा उस ज़मीन को अपशकुनी मानती थी। इसलिए उसने वह ज़मीन सरकार को वापस लौटा दी। लेकिन नीति-नियंताओं और अधिकारियों ने वह ज़मीन वापस आदिवासियों को देने के एवज़ में मुझसे लाखों रुपए की रिश्वत माँगी। मेरे पास इतने रुपए नहीं थे। इसलिए कुछ नहीं हो सका। अब उस जगह पर एक वीरान खंडहर है जहाँ जंगली घास और विषैली वनस्पतियाँ उगती हैं और मच्छर पनपते हैं। लोग बताते हैं कि ढही हुई रातों में जब पीला, खंडित चाँद उस खंडहर पर उगता है तो वहाँ का पूरा दृश्य भुतहा हो जाता है। ...

तो यह थी वह अजीब दास्तान, वह त्रासद कथा जो मेरे मित्र भास्कर ने मुझे सुनाई। कभी-कभी मुझे लगता है जैसे उस उद्योगपति जतन नाहटा का पागलपन और उसकी मौत आदिवासी-देवता द्वारा लिया गया बदला थी। आदिवासियों से उनकी ज़मीन छीन लेने का बदला। आदिवासियों की जीवन-पद्धति, परम्पराओं और आस्था पर वार करने का बदला। जैसे वह मूर्ति हिसाब चुका रही थी। पाठको, सच क्या है, मैं नहीं जानता। इसका फ़ैसला मैं आप पर छोड़ता हूँ। यदि भास्कर की मानें तो -
"पत्थर हो या इंसान, भीतर की आग जब बाहर निकलती है तो यही होता है।"


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