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05.15.2014


इधर से ही

लुटेरे इधर से ही गए हैं
यहाँ प्रकृति की सारी ख़ुशबू
लुट गई है

भ्रष्ट लोग इधर से ही गए हैं
यहाँ एक भोर के माथे पर
कालिख़ लगी हुई है

फ़रेबी इधर से ही गए हैं
यहाँ कुछ निष्कपट पल
ठग लिए गए हैं

हत्यारे इधर से ही गए हैं
यहाँ कुछ अबोध सपने
मार डाले गए हैं

हाँ, इधर से ही गुज़रा है
रोशनी का मुखौटा पहने
एक भयावह अँधेरा
कुछ मरी हुई तितलियाँ
कुछ टूटे हुए पंख
कुछ मुरझाए हुए फूल
कुछ झुलसे हुए वसंत
छटपटा रहे हैं यहीं

लेकिन सबसे डरावनी बात
यह है कि
यह जानने के बाद भी
कोई इस रास्ते पर
उनका पीछा नहीं कर रहा


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