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04.05.2015


हत्यारे

"नहीं बताए तो गोली मार दो स्साले को।" मोटे दढ़ियल की नुकीली आवाज़ चाकू के तेज़ धार-सी चुभी।

सुबह सात बजे पास के कारख़ाने का तेज़ सायरन बजने पर भी मेरा उठने का जी नहीं कर रहा था। अब भी आँखों में नींद भरी हुई थी। रात में देर से सोया था। असल में शाम को नीलोफ़र के यहाँ पार्टी में चला गया था। वहाँ महफ़िल ऐसी जमी कि समय का कुछ पता ही नहीं चला। सुबह सायरन बजने के कुछ देर बाद तक नींद और जागने की सीमा-रेखा पर पड़ा ऊँघता रहा।

"उठो शर्मा, आज सोमवार है!" दिमाग़ के किसी कोने में कौंधा। आँखें खुल गईं। बिस्तर पर पड़े-पड़े इष्ट देवता को याद किया। कल्याण कर प्रभु! फिर उठ कर अँगड़ाई ली। अभी वाश-बेसिन पर जा कर मुँह पर छींटे मारे ही थे कि दरवाज़े की घंटी अपरिचित अंदाज़ में बज उठी। सुबह-सुबह कौन आ मरा है कमबख़्त! तौलिए से मुँह पोंछ कर जैसे ही दरवाज़ा खोला, सात फ़ुट का एक हट्टा-कट्टा गंजा मुच्छड़ मुझे पीछे धकेल कर भीतर घुस आया। उसके हाथ में पिस्तौल थी। उसके ठीक पीछे एक मोटा दढ़ियल भी घुसा चला आया और उसने दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया।

"क...क्या हो रहा है यह? कौन हो तुम लोग? क्या चाहिए? किससे मिलना है?" मैंने हकबका कर पूछा। सब कुछ पलक झपकते ही हो गया था। मैं कमरे के बीचो-बीच भौंचक्का खड़ा था।

"चोप्प! सवाल हम पूछेंगे। तुम सिर्फ़ जवाब दोगे। के.पी. कहाँ है?" मुझे कॉलर से पकड़ कर गंजे ने पूछा।

"कौन के.पी.? मैं किसी के.पी.-वे.-पी. को नहीं जानता।" मैं उसकी गिरफ़्त से छूटने के लिए कसमसाया। उसकी लंबाई मेरे बौनेपन का मज़ाक उड़ा रही थी।

"तू के.पी. को नहीं जानता है, बहैन...? के.पी. का लंगोटिया यार!"

उल्टे हाथ का एक ज़ोरदार थप्पड़ मेरी कनपटी पर पड़ा। समूचा माथा भन्ना गया। बहुत सारी मक्खियाँ दिमाग़ की गलियों में भिनभिनाने लगीं।

"नहीं बताए तो गोली मार दो स्साले को!" मोटे दढ़ियल की नुकीली आवाज़ चाकू के तेज़ धार-सी चुभी।

"सुना तुमने? सच-सच बता दो, कहाँ है के.पी.?"

गंजा फटे स्वर में बोला। उसका बायाँ हाथ मेरी गर्दन पर कसता जा रहा था। दाएँ हाथ में पिस्तौल थी। उसकी आवाज़ सुनकर लगता था, जैसे कोई ख़राब पंखा घुर्र-घुर्र कर रहा हो।

"मुझे नहीं मालूम। मैं वाक़ई किसी के.पी. को नहीं जानता?" मैंने बैठी आवाज़ में कहा। मुझे साँस लेने में तकलीफ़ हो रही थी। माथे से पसीने की नदियाँ बह निकली थीं। कान गर्म हो गए थे। दिल की धड़कन बिदके घोड़े-सी भागने लगी थी। सामने दीवार पर टँगी घड़ी की सुइयाँ सात बज कर पाँच मिनट पर ठहर गई थीं।

"ऐसे नहीं बोलेगा ये मादर...गोली मार दो इसे!" मोटे दढ़ियल ने गंजे को फिर चाभी दी।

"तुम्हें क्या लगता है, हम यहाँ नौटंकी करने आए हैं? सीधी तरह बता दो, के.पी. कहाँ है?" गंजे मुच्छड़ ने मेरी गर्दन पर अपनी गिरफ़्त कस दी। पीड़ा के अजगर मुझे जकड़ने लगे, पर मैं चुप रहा। चुप्पी ही मेरा एकमात्र हथियार था।

"मैं कहता हूँ, गोली मार दो स्साले को!" दढ़ियल मेज़ पर पड़ी किताबों को इधर-उधर कर रहा था। न जाने क्या ढूँढ रहा था उनमें। क्या उसे शक था कि मैंने उसके के.पी. को किसी किताब के पन्ने में छिपा रखा था?

"नहीं, नहीं। शरीफ़ आदमी है यह तो। मरना नहीं चाहता। हाँ तो, शरीफ़ आदमी! जानते हो, हम कौन हैं? पेशेवर क़ातिल। चलो शाबाश! फटाफट बता दो, कहाँ है के.पी.? हम तुम्हें छोड़. देंगे।" गंजे ने पुचकार कर कहा, जैसे के.पी. का पता बता देने पर वह मुझे लॉलीपॉप इनाम में देगा!

"तुम्हें ग़लतफ़हमी हुई है। मैं किसी के.पी. को नहीं जानता। तुम ग़लत जगह अपना समय बर्बाद कर रहे हो।"

"नहीं बताए तो गोली मार दो स्साले को। इसकी तो लाश भी बोलेगी!" दढ़ियल ने फिर वाणी का छुरा मारा। अब वह अलमारियों में ताक-झाँक कर रहा था। शायद मैंने उसके के.पी. को किसी अलमारी में बंद कर रखा हो!
"ना, ना! अच्छा आदमी है यह तो! ख़ुद ही बता देगा! हाँ तो, अच्छे आदमी, अब तुम मुझे बताओगे कि के.पी. कहाँ है?" कह कर गंजे ने पिस्तौल की नली मेरी कनपटी पर रख दी। मेरा सिर गर्म हो गया। साँस रुकने लगी ... क्या सब ख़त्म हो जाएगा? अभी? यहीं? इसी वक़्त? और मैं केवल दीवार पर टँगी एक फ़्रेम्ड तस्वीर बनकर रह जाऊँगा? क्या ऐसे मरना है मुझे? अजनबी गुंडों के हाथों? भरी जवानी में? अकारण? क्या यही नियति है? ऐसा तो कुछ भी नहीं किया है मैंने कि मुझे ऐसी मौत मिले। आस्तिक हूँ। हाल ही में हुए 'चमत्कार' के समय पड़ोस के मंदिर में गणेश की मूर्ति को दूध भी पिला चुका हूँ। किसी से व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है मेरी, न ही कभी किसी का हक़ मारा है मैंने। सीधा-सादा आदमी हूँ। ओढ़ने-बिछाने के लिए मुट्ठी भर विश्वास है, बस। तो क्या ये हत्यारे आज मेरी हत्या कर देंगे? मेरे विश्वास की भी हत्या कर देंगे?

"मैं वाकई के.पी. नाम के किसी आदमी को नहीं जानता?" पिस्तौल की राक्षसी नली मेरी कनपटी पर तनी हुई थी। मेरे होठ सूख रहे थे। कनपटी जल रही थी। काँख पसीने से भीग गई थी।

"मैं तीन तक गिनता हूँ। अगर यह फिर भी नहीं बताए, तो गोली मार दो इसे!" दढ़ियल की नुकीली आवाज़ चाकू के तेज़ धार-सी चुभी। हथेलियाँ पसीने से चिपचिपी हो गईं। आँखों के आगे अँधेरा-सा छाने लगा। दिल की धड़कन छाती की दीवार पर हथौड़े-सी पड़ रही थी। मैं मौत का इंतज़ार करने लगा। होनी को कौन टाल सकता है।

... बचपन में एक बार घर के शैतान नौकर ने एक कबूतर पकड़ कर ब्लेड से उसकी एक टाँग काट डाली थी। तब बहुत रोया था मैं और लँगड़ा कबूतर उससे छीन कर उड़ा दिया था मैंने, पर उसके उड़ते ही दस-बारह कौवे उसके पीछे पड़ गए थे और घबराया कबूतर उनसे बचने के लिए तीन-चार मिनट तक बदहवास-सा इधर-उधर उड़ता रहा था। और अंत में थक कर नीचे गिर गया था। और तब सारे कौवों ने मिलकर उस लँगड़े कबूतर को नोच डाला था ...

"नहीं, नहीं। बड़ा प्यारा आदमी है यह तो। अभी बताएगा। क्यों, प्यारे आदमी? हम तुम्हें मसखरे लगते हैं? हत्यारे हैं, हत्यारे! के.पी. तो मरेगा ही, पर उसका पता नहीं बताया, तो पहले तुम मरोगे। समझे?"

मैं चुपचाप अपनी आती-जाती साँसों का शोर सुनता रहा। क्या कहता? उन्हें मेरी बात पर यक़ीन नहीं था। उनके लिए मेरे शब्द अपने अर्थ खो चुके थे।

"गोली मार दो स्साले को!"

गंजे ने मेरी कनपटी पर पिस्तौल की मूठ दे मारी। आँखों में किसी सुरंग का अँधेरा भरता चला गया। भूचाल आ गया। दुनिया चक्कर खाने लगी। अँधेरे में सैकड़ों झींगुर एक साथ बोलने लगे। पीड़ा की एक उजली लकीर बिजली-सी कौंधी। फिर अँधेरा घना होता चला गया। लड़खड़ा कर मैं ज़मीन पर बैठ गया।

"सब पता है इसे। जान कर नहीं बता रहा है। गोली मार दो इसे?"

काली सुरंग में मनहूस आवाज़ों के चमगादड़ फड़फड़ा रहे थे। दिमाग़ में किसी टाइम-बम की टिक्-टिक् साफ़ सुनाई दे रही थी।

मरना तो एक दिन सबको है, मरने से क्या डरना, पर थोड़ा समय अगर और मिल जाता तो ... कई अधूरे काम अब यूँ ही पड़े रह जाएँगे।

गंजे ने कॉलर से खींच कर मुझे फिर उठा दिया। क़मीज़ के ऊपरी बटन टूट कर ज़मीन पर जा गिरे।

"उठो, अच्छे आदमी! क्या तुम इतनी जल्दी मरना चाहते हो? अब भी बता दो, प्यारे आदमी, कहाँ है के.पी.?"

"मैं कहता हूँ गोली मार दो स्साले को!" मेरी कनपटी जल रही थी। एक गुलौड़ा निकल आया था, जो बेहद टभक रहा था। लगता था, सिर फट कर हज़ार टुकड़ों में बँट जाएगा। क्या विक्रम भी तब ऐसा ही महसूस करता था, जब उसके कंधे पर पड़ा वेताल उसे कोई कहानी सुना कर उससे किसी कठिन प्रश्न का उत्तर माँग बैठता था?

रात पार्टी में धीमन ने कहा था, "तुम्हारी कुंडली देख ली है। शनि की साढ़े-साती शुरू हो गई है। परेशान करेगी। हनुमान चालीसा का पाठ किया करो और नमक कम खाओ।"

"क्यों बे, बताता है के.पी. का पता कि दबा दूँ ट्रिगर? सीधा ऊपर का टिकट कट जाएगा!" मौत मेरे माथे पर दस्तखत करने जा रही थी।

"जब मैं किसी के.पी. को जानता ही नहीं तो तुम्हें उसका पता कहाँ से दूँ?"

मेरी आवाज़ मोमबत्ती की बुझती लौ-सी काँपी।

"अच्छा! तू के.पी. को नहीं जानता?" दढ़ियल कड़े क़दमों से चलता हुआ मेरे पास आ गया।
"नहीं?"

"तुम शर्मा नहीं हो?" गंजे ने पूछा।

"हूँ?"

"यक़ीन करो, मैं के.पी. नाम के किसी आदमी को नहीं जानता?"

"झूठ बोल रहा है यह। गोली मार दो इसको!" दढ़ियल ने मेरा दाहिना हाथ पकड़ कर पीछे की ओर ऐंठ दिया। आह! पीड़ा के अजगरों ने बाँह और कंधे को कस कर जकड़ लिया। मैं छटपटाने लगा। हाँ, हाँ, मार डालो मुझे! हर पल मरते रहने से तो बेहतर है, यह यातना जल्दी ख़त्म हो जाए।

"सच-सच बताओ, तुम रजत शर्मा नहीं हो? के.पी. के पार्टनर?" गंजे की पिस्तौल की नली अब मेरे गर्दन की नीली नस को पुचकार रही थी।

हूँ..... तो ये हत्यारे मुझे रजत शर्मा समझ बैठे हैं?

"नहीं।" कराहते हुए मैंने कहा।

रजत शर्मा को जानता था मैं। शहर में आ बसे कश्मीरी विस्थापितों की देख-भाल कर रही संस्था का सक्रिय सदस्य था वह। अपना कोई बिज़नेस भी था उसका। जवाहर नगर में रहता था। दो-एक बार चंदे-वंदे के सिलसिले में मुझसे मिला था वह।

"झूठ बोल रहा है। मैं कहता हूँ, गोली मार दो स्साले को!"

"हम कैसे मान लें कि तुम रजत शर्मा नहीं हो?" गंजे ने घूर कर पूछा। जैसे वह पुलिसवाला हो और मैं अपराधी!

"कोट की जेब में मेरा 'आइ-कार्ड' पड़ा है। देख लो?" मेरी आवाज़ उम्मीद की उजली पगडंडी ढूँढ़ रही थी।

गंजा खूँटी पर टँगे कोट की जेब से मेरा 'आइ-कार्ड' निकाल लाया। ग़ौर से उसे देखने लगा। जैसे इस तरह देखने से लिखे हुए अक्षर बदल जाएँगे! समय ठिठक कर वहीं जम गया। मुझे लगा, उसकी निगाह की गर्मी से शिनाख्ती-कार्ड जलकर भस्म हो जाएगा। दीवार पर चिपकी मधुबाला की तस्वीर सहम गई थी। कैलेंडर से झाँकती सोनल मान सिंह की काजली आँखें पसीजी-सी लग रही थीं।

सीलिंग-फ़ैन की ओट से एक छिपकली नीचे ताक रही थी।

एक लंबे अंतराल के बाद गंजा बोला --?" हूँ... तो तुम रजत शर्मा नहीं, राकेश शर्मा हो।" जमा हुआ समय पिघल कर बहने लगा। बाहर कहीं एक कोयल ज़ोर से कूकी। छिपकली सीलिंग-फ़ैन की ओट से बाहर निकल आई।

"हाँ?" मैंने कहा।

"रजत शर्मा को जानते हो?"

"नहीं?"

मैं इन हत्यारों को रजत शर्मा का पता क्यों बताऊँ?

"झूठा कहीं का! गोली मार दो स्साले को!" दढ़ियल की आवाज़ चाकू के तीखे नोक-सी फिर चुभी।

"छोटे छोड़ दो इसे। यह वो नहीं?"

"पर ...?"

"छोटे, हमने ग़लत आदमी पकड़ लिया है!"

"जा, मर स्साले!" दढ़ियल ने मुझे ज़ोर से धक्का दिया मैं दीवार से जा टकराया। थोड़ा-सा पुराना पलस्तर झड़ गया।

"सुनो, तुम किस्मतवाले हो कि तुम राकेश शर्मा हो, रजत शर्मा नहीं!" गंजा बोला।

"पर यह सब जान गया है। इसे ज़िंदा छोड़ कर कैसे जा सकते हैं? मैं तो कहता हूँ, गोली मार दो स्साले को!" दढ़ियल मेरा पूर्व-जन्म का शत्रु लगता था।

"रहने दो, छोटे! सुनो, सीधे आदमी! तुम समझ गए होगे, हम लोग कितने ख़तरनाक हैं। अगर हम आज आए हैं तो कल फिर आ सकते हैं। ग़लती से भी कहीं मुँह मत खोलना। समझे? तुमने कुछ नहीं देखा। कुछ नहीं सुना। तुम खुद पर एक एहसान करोगे। अपना मुँह सिले रहोगे। गाँधी के तीन बंदर ही अब तुम्हें बचा सकते हैं!" गंजे के गले से एक ख़राब पंखा घुर्र-घुर्र कर रहा था।

मैंने सिर हिला दिया। वाह हत्यारो! गाँधी के दर्शन का यह उपयोग!

"और हमारे जाने के आधे घंटे बाद तक बाहर नहीं निकलना।" गंजे ने हिदायत दी। मैंने हामी भरी। पीड़ा के अजगर अंग-अंग को डस रहे थे।

गंजे ने पिस्तौल पतलून की जेब में रख कर दरवाज़ा खोल लिया। धूप का एक उत्सुक टुकड़ा प्राइवेट जासूस-सा टोह लेता हुआ कमरे में घुस आया और भीतर बिखरे तनाव को सूँघने लगा।

"बच गया, स्साला! पर कुछ गड़बड़ की तो तुझे गोली मारने मैं खुद आऊँगा?" शब्दों की आरी से मुझे अधमरा कर दढ़ियल भी गंजे के साथ बाहर निकल गया। मैं चुपचाप दीवार से सटा खड़ा रहा। छाती अब भी धौंकनी-सी चल रही थी।

बाहर मोटर-साइकिल स्टार्ट हो चुकी थी। पड़ोसन मिस सैली का अल्सेशियन भौंकने लगा। फिर मोटर-साइकिल के इंजन की आवाज़ दूर होती चली गई और कुत्ता चुप हो गया।

मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे गले पर रखा चाकू हटा लिया हो। एक लम्बी साँस ले कर मैं दरवाज़े तक आया। वे जा चुके थे। बाहर अप्रैल की सड़क पर सूनापन बिखरा पड़ा था। सड़क के किनारे उगे नंगे पेड़ों पर नई कोंपलें निकलने लगी थीं। हवा में पड़ोस के मंदिर की घंटियों की आवाज़ बह रही थी। तभी देर से उठने वाला कोई मुर्ग़ा उतावले स्वर में बाँग देने लगा। कलाई घड़ी आठ बजा रही थी।

मैंने माथे से पसीना पोंछा। नसों में दौड़ रही फफकती-सी पीड़ा अब कुछ कम हो गई थी। कनपटी के टभकते गुलौड़े पर हाथ फेरा। नहीं! ख़ून नहीं निकला था। केवल सूजन थी। मौत मुझे क़रीब से सूँघ कर जा चुकी थी। आज उसका दिन कहीं और था। आज मेरी बारी नहीं थी। कहीं कोई था जो चाहता था कि मैं अभी रहूँ। उसे मन-ही-मन धन्यवाद दिया। फिर नीचे पड़ा अख़बार उठाया और भीतर की ओर मुड़ गया। पास के कारख़ाने का तेज सायरन फिर बजने लगा था ... क्या ऐसा कोई कारख़ाना नहीं लगाया जा सकता जहाँ नेक इंसानों का, अच्छे मनुष्यों का उत्पादन हो सके?


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