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09.13.2014


दलदल

"मैं उस समय बारह साल का था। वह दस साल का रहा होगा। वह -- मेरा सबसे अच्छा मित्र सुब्रोतो।" बूढ़े की भारी आवाज़ कमरे में गूँज उठी। वह हमें अपने जीवन की सत्य-कथा सुना रहा था।

कुछ पल रुक कर बूढ़े ने फिर कहना शुरू किया, "मेरा जन्म सुंदरबन इलाक़े के पास एक गाँव में हुआ। गाँव से दो मील दूर दक्षिण में दलदल का इलाक़ा था। पिता मछुआरे थे जो गाँव के उत्तर में बहती नदी से मछलियाँ पकड़ने का काम करते थे। पिता बताते थे कि पच्चीस-तीस मील दूर जा कर यह नदी एक बड़ी नदी में मिल जाती थी। गाँव के पूरब और पश्चिम की ओर घने जंगल थे।

मेरा मित्र सुब्रोतो बचपन में ही अपाहिज हो गया था। पोलियो की वज़ह से उसकी एक टाँग हमेशा के लिए बेकार हो गई थी। पर मेरी सभी शरारतों और खेलों में वह मेरा भरपूर साथ निभाने की कोशिश करता था। सुब्रोतो की आवाज़ बहुत सुरीली थी। वह बहुत मीठे स्वर में गीत गाता था। उसके गाए गीत सुन कर मैं मस्त हो जाता था।

हमें गाँव के दक्षिण में स्थित दलदली इलाक़े की ओर जाने की सख़्त मनाही थी। उस दलदल के भुतहा होने के बारे में अनेक तरह की कहानियाँ प्रचलित थीं। हम बच्चे अक्सर गाँव के उत्तर में बहती नदी के किनारे जा कर खेलते थे। मैं नदी में किनारे के पास ही तैरता रहता जबकि सुब्रोतो किनारे पर बैठा नदी के पानी में एक कोण से चपटे पत्थर फेंक कर उन्हें पानी की सतह पर फिसलता हुआ देखता।

अपने हम-उम्र बच्चों के बीच मैं बड़ा बहादुर माना जाता था। दरअसल मैंने एक बार गाँव में घुस आए एक लकड़बग्घे पर पत्थर फेंक-फेंक कर उसे गाँव से बाहर भगा दिया था। एक बार नदी किनारे खेलते-खेलते गाँव के कुछ बच्चों ने मुझे चुनौती दी कि क्या मैं गाँव के दक्षिण के दलदली इलाक़े में अकेला जा सकता था? बात जब इज़्ज़त पर बन आई तो मैंने चुनौती मान ली। हालाँकि सुब्रोतो ने मुझे ऐसा करने से मना किया पर तब तक मैंने हामी भर ली थी। यह तय हुआ कि कल मैं गाँव के दक्षिण में स्थित दलदली इलाक़े में जाऊँगा और सकुशल लौट कर दिखाऊँगा।

नियत दिन सुबह गाँव के सभी बच्चों की टोली गाँव के दक्षिणी छोर पर पहुँची। मैं और सुब्रोतो भी उन सब के साथ थे। मुझे दो मील दूर के दलदली इलाक़े में जा कर कुछ समय वहाँ बिताना था और फिर सकुशल वापस लौट कर दिखाना था। सबूत के लिए मुझे दलदल की कुछ गीली मिट्टी साथ ले जाए जा रहे थैले में भर कर वापस लानी थी। बाक़ी बच्चे वहीं मेरा इंतज़ार करने वाले थे। उस दलदली इलाक़े में जाने से सभी डरते थे।

लेकिन ऐन मौक़े पर मुझे भी उस दलदली इलाक़े में अकेले जाने में डर लगने लगा। मैंने बाक़ी बच्चों से इजाज़त माँगी कि मेरा प्रिय मित्र सुब्रोतो भी मेरे साथ जाएगा। बाक़ी बच्चे बड़ी मुश्किल से माने पर सुब्रोतो ने दलदली इलाक़े में जाने से साफ़ इंकार कर दिया। जब मैंने उसे हमारी मित्रता का वास्ता दे कर भावुक किया तब जा कर वह मेरे साथ चलने के लिए तैयार हुआ।
आख़िर उस सूर्य-जले दिन हमने अपना सफ़र शुरू किया। दो-ढाई मील चल कर अंत में हम दोनों उस इलाक़े में पहुँच गए। सामने खदकता हुआ दलदल था जिसमें डरावने बुलबुले फूट रहे थे और अजीब-सी भाप उठ रही थी। दलदल के किनारे से कुछ दूर पहुँच कर हम दोनों बैठ गए। सुब्रोतो लँगड़ा कर चलने की वज़ह से बेहद थक गया था और हाँफ रहा था। लेकिन असली काम तो अभी बाक़ी था। सबूत के तौर पर हमें दलदल की थोड़ी गीली मिट्टी साथ लाए थैले में भर कर वापस ले जानी थी।

सुब्रोतो को वहीं छोड़ कर मैं दलदल की ओर आगे बढ़ा। ज़मीन घास, मरे हुए पत्तों और फिसलन भरी काई से ढँकी हुई थी। ठीक से कुछ पता नहीं चल रहा था कि कहाँ ठोस ज़मीन ख़त्म हो गई थी और गहरा दलदल शुरू हो गया था।

अगला क़दम ज़मीन पर रखते ही मैंने पैर को धँसता हुआ महसूस किया। इससे पहले कि मैं सँभल पाता, मेरा दूसरा पैर भी दलदल में धँसने लगा था।

मैं सुब्रोतो का नाम ले कर ज़ोर से चिल्लाया। लेकिन जब तक सुब्रोतो लँगड़ाते हुए मेरे पास पहुँचता, मैं कमर तक दलदल में धँस गया था। जैसे नदी में डूबता हुआ आदमी तिनके को भी सहारा समझ कर बचने के लिए व्याकुल हो कर छटपटाता है, उसी तरह मैंने भी सुब्रोतो के अपनी ओर बढ़े हुए हाथ को कस कर अपने हाथों में पकड़ लिया और व्याकुल हो कर छटपटाते हुए ख़ुद को किसी तरह दलदल से बाहर निकालना चाहा। लेकिन जब मैंने उसके हाथ के सहारे दलदल से बाहर निकलने की कोशिश की तो इस खींच-तान में सुब्रोतो के पैर की किनारे पर से पकड़ ढीली हो गई और वह भी मेरे साथ ही उस दलदल में आ गिरा। देखते-ही-देखते वह भी दलदल में कमर तक धँस गया। दलदल हर पल हम दोनों पर अपना शिकंजा कसते हुए हमें नीचे खींचता जा रहा था।

घबरा कर मैंने इधर-उधर देखा। किनारे पर उगे एक बरगद के पेड़ की शाखाएँ दलदल के ऊपर फैली थीं। वहाँ से कुछ लम्बी जटाएँ नीचे दलदल की ओर आ रही थीं।

मैं पूरा ज़ोर लगा कर ऊपर की ओर उचका और मैंने अपने दोनों हाथ उन जटाओं की ओर फैलाए। पता नहीं यह मेरे उचकने का असर था या जटाओं को ही मुझ पर दया आ गई थी, नीचे दलदल की ओर लटकी एक मज़बूत जटा मेरी हथेलियों की गिरफ़्त में आ गई। उस जटा की पकड़ के सहारे मैं किसी तरह धीरे-धीरे ख़ुद को दलदल से बाहर खींचने में कामयाब हो गया। मैं वैसे भी शरीर से हृष्ट-पुष्ट था। जटा को पकड़ कर मैं ऊपर बरगद की शाख़ा पर चढ़ गया। तब तक सुब्रोतो छाती तक दलदल में धँस चुका था।

मुझे पता था, यदि मैंने सुब्रोतो को बचाने के लिए जल्दी ही कुछ नहीं किया तो दलदल उसे साबुत निगल जाएगा। लेकिन मेरे हाथ-पैर ठीक विपरीत दिशा में काम कर रहे थे। डर ने मुझे जकड़ रखा था। मेरी देह जल्दी-से-जल्दी उस दलदल की पहुँच से दूर भाग जाना चाहती थी।

मुझे ख़ुद भी नहीं याद, किस तरह मैं पेड़ से उतर कर किनारे पर पहुँचा। जब मुझे होश आया, तब तक सुब्रोतो गले तक दलदल के भीतर जा चुका था। लेकिन उसके हाथ अब भी बाहर थे। मैंने भाग कर पेड़ से लटकती एक लम्बी जड़ तोड़ कर उसकी ओर फेंकी। पर शायद तब तक बहुत देर हो चुकी थी। हालाँकि सुब्रोतो ने जटा अपने हाथों में पकड़ी और मैंने उसे बाहर खींचने की कोशिश भी की किंतु वह जटा सुब्रोतो के अशक्त हाथों से बार-बार छूट जाती थी। संभवत: वह उस दलदल में बहुत गहराई तक धँस चुका था। शायद उसकी देह में अब अधिक ऊर्जा नहीं बची थी। या फिर कोई अथाह शक्ति हमारी तमाम कोशिशों के बावजूद उसे धीरे-धीरे नीचे खींचती चली जा रही थी।

देखते-ही-देखते सुब्रोतो दलदल में ग़ायब होने लगा। मेरी आँखों के सामने ही उस राक्षसी दलदल ने उसे ज़िंदा निगल लिया। नीचे जाते समय उसके चेहरे पर एक अजीब कातर भाव था, जैसा भाव मारने के लिए ले जाए जा रहे बकरे के चेहरे पर होता है। एक अजीब-सी आवाज़ हुई और सुब्रोतो का सिर दलदल के भीतर ग़ायब हो गया। दलदल की सतह पर पहले जहाँ सुब्रोतो था, वहाँ कुछ पल बड़े-बड़े बुलबुले फूटते रहे।

फिर एक ऐसी मनहूस सघन चुप्पी वहाँ छा गई जैसे सारे विश्व की आवाज़ें किसी दानवी शक्ति ने सोख ली हों।

मैं सन्न रह गया। सब मेरी ही ग़लती थी। सुब्रोतो तो इस दलदली इलाक़े में आना ही नहीं चाहता था। मैं ही उसे मौत के मुँह में घसीट लाया। मैं अपनी जगह पर जड़ हो गया था।

सुब्रोतो को दलदल में ग़ायब हुए एक-दो मिनट बीत चुके थे। तभी एक अजीब-सी भयावह आवाज़ हुई - जैसे गले में कुछ फँस जाने पर कोई चिल्लाने की मर्मांतक कोशिश कर रहा हो।

अब मैं आप को जो बताऊँगा, उस पर आप यक़ीन नहीं करेंगे। मुझे मालूम है, आप को यह असम्भव लगेगा। आप कहेंगे - वह मेरा भ्रम था। वहम था। पर नहीं। मैं अपने पूरे होशो-हवास में था। यही सच है।

दलदल में पूरा धँस कर ग़ायब हो जाने के लगभग दो मिनट बाद एक अजीब-सी भयावह आवाज़ के साथ अचानक सुब्रोतो का कीचड़ से सना सिर और दोनों हाथ दलदली मिट्टी से ऊपर निकल आए! जी हाँ, मेरा सबसे अच्छा मित्र सुब्रोतो, जिसे कुछ देर पहले दलदल पूरा का पूरा लील गया था, उसने एक झटके से अपना कीचड़-सना सिर और अपने दोनों हाथ दोबारा दलदल से बाहर निकाल लिए थे। क्या उसने अपनी समस्त संचित ऊर्जा केंद्रित करके जीवित बचे रहने का एक अंतिम महा-प्रयास किया था? क्या वह मौत के पंजों में छटपटा रहे जीवन की एक अंतिम फड़फड़ाहट थी? या वह कुछ और ही था जो मेरी समझ और कल्पना, दोनों से परे था? ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि सुब्रोतो का चेहरा उसका अपना चिर-परिचित चेहरा नहीं लग रहा था। यह मेरा वह मित्र नहीं लग रहा था जिसे मैं बरसों से जानता था।

दरअसल सुब्रोतो के कीचड़-सने चेहरे पर एक विकृत मुस्कान फैली थी जिसके भीतर से उसकी दो खुली आँखें किसी अतिरिक्त ऊर्जा से चमक रही थीं। दहकते अंगारों-सी लाल आँखें! मेरी दिशा में फैले उसके दोनों हाथ मदद माँगते-से नहीं लग रहे थे बल्कि मुझे पकड़ कर उस भुतहे दलदल में खींच लेने को आतुर-से लग रहे थे। बल्कि यदि मैं पास होता तो वे हाथ मुझे निश्चित-ही दबोच लेते।

मैं बेहद डर गया और थर-थर काँपने लगा। हालाँकि मेरा ज़हन मुझे कह रहा था कि मैं फिर से पेड़ से तोड़ी गयी लम्बी जड़ उसकी ओर फेंक कर उसे बचाने का प्रयास करूँ, किंतु मेरी पूरी देह इस सोच के विरुद्ध एकजुट हो गई थी। बदहवास-सा मैं पलटा और वहाँ से सरपट भागा। बहुत दूर जा कर ही मैंने हाँफते हुए मुड़ कर देखा। सुब्रोतो का सिर अब दोबारा दलदल में नीचे धँसने लगा था। किंतु उसके दोनों हाथ अब भी मुझे अपनी ओर बुलाते प्रतीत हो रहे थे ...

जब मेरी आँख खुली तो मैं गाँव में अपने घर के बिस्तर पर पड़ा था। मेरी माँ मेरे सिरहाने बैठी थी। पिता बगल में खड़े थे। मैं उन्हें सुब्रोतो के साथ हुई दुर्घटना के बारे में बता कर रोने लगा। यह सुन कर माँ ने मुझे सीने से लगा लिया। तब पिता ने बताया कि जब मैं कई घंटों तक नहीं लौटा तो गाँव के बच्चे बड़ों को ले कर दलदली इलाक़े की ओर गए। मैं उन्हें दलदल से कुछ दूर ज़मीन पर बेहोश पड़ा मिला था। तेज़ बुखार में तपता हुआ। वे सब मुझे उठा कर गाँव ले आए। पिता ने बताया कि मैं तीन दिनों तक नीम-बेहोशी की हालत में बिस्तर पर पड़ा सुब्रोतो का नाम बड़बड़ाता रहा था। गाँव का ओझा आ कर अपना यत्न कर गया था। उसका कहना था कि उस भुतहा दलदल वाले इलाक़े में जाने की वज़ह से मेरे अंदर किसी प्रेत का वास हो गया था। लेकिन अंत में पड़ोसी गाँव के वैद जी के देसी उपचार से ही तीन दिन के बाद आज मुझे होश आया था।

उस त्रासद घटना के बाद मेरा जीवन पहले जैसा नहीं हो पाया। सुब्रोतो के पिता इस सदमे से पागल-से हो गए। वे मुझे अक्सर गाँव के दक्षिणी दलदली इलाक़े की ओर बौराए-से भटकते दिखते। मैं इस दुर्घटना के लिए ख़ुद को कभी माफ़ नहीं कर पाया। मुझे लगता, मैं सुब्रोतो को बचा सकता था। लेकिन मैं कायर निकला। भयभीत मैं उसे दलदल में धँसता हुआ छोड़ कर भाग आया। उसकी वह अंतिम छवि मेरे स्मृति-पटल पर सदा के लिए अंकित हो गई थी : दलदली कीचड़ से सना उसका चेहरा ... उसकी विकृत मुस्कान ... अंगारों-सी दहकती उसकी आँखें ... मेरी ओर फैले उसके दोनों हाथ ...। चाह कर भी मैं उस मारक छवि से मुक्ति नहीं पा सका।

अक्सर सुब्रोतो मेरे दु:स्वप्नों में आता। मेरी ओर फैले उसके दोनों हाथ मुझे दबोच लेते और अपने साथ उस भुतहा दलदल में खींच ले जाते। सर्दियों की रात में डर की कँपकँपी के कारण मेरी नींद खुल जाती और मैं ख़ुद को पसीने से तरबतर पाता। यह भावनात्मक सदमा मुझे चैन से जीने नहीं दे रहा था। जब मैं आईने में देखता तो मेरी छवि अपना मुँह मोड़ लेना चाहती। मेरा जीवन जैसे उस दलदल का बंधक बन कर रह गया था। मैं अपने दु:स्वप्नों के भीतर फँसा छटपटाता रहता।

मेरी ऐसी हालत देख कर पिता ने मुझे पढ़ने के लिए एक रिश्तेदार के पास कलकत्ता भेज दिया। पढ़ाई के बाद मेरी नौकरी दिल्ली में लग गई। मैं फिर कभी गाँव नहीं गया। दरअसल मैंने अपना गाँव हमेशा के लिए छोड़ दिया था। मुझे दु:स्वप्न आने कम हो गए लेकिन पूरी तरह बंद नहीं हुए। मैं गाँव से दूर चला आया था लेकिन गाँव की स्मृतियाँ मुझसे पूरी तरह दूर नहीं हो सकी थीं।

मैंने शहर की एक लड़की से शादी कर ली। फिर मेरे घर बेटे ने जन्म लिया। समय बीतता गया। कई बरस बाद माँ-बाबूजी भी चल बसे। पर मैं वापस गाँव नहीं गया। उन्हीं दिनों मैंने यह कविता लिखी थी : "तुम डरते हो / एड्स से / कैंसर से / मृत्यु से / मैं डरता हूँ / उन पलों से / जब जीवित होते हुए भी / मेरे भीतर कहीं / कुछ मर जाता है ...।"

धीरे-धीरे मेरा बेटा दस साल का हो गया। वह भी बहुत सुरीली आवाज़ में गाना गाता था। उसके गाए गीत सुन कर मुझे सुब्रोतो की बहुत याद आती। कभी-कभी मुझे लगता जैसे सुब्रोतो ने ही मेरे घर में बेटे के रूप में जन्म ले लिया है। पता नहीं आप इसके बारे में क्या कहेंगे लेकिन धीरे-धीरे मेरे दिल की यह धारणा मज़बूत होती जा रही थी।

अंत में मैंने फ़ैसला किया कि मैं वापस गाँव जाऊँगा। अब मैं चालीस साल का हो गया था। आख़िर कब तक मैं उस त्रासद घटना का बोझ सलीब-सा अपने कंधों पर ढोता रहता?

गर्मी की छुट्टियों में मैं तीस बरसों का लम्बा अंतराल पार करके गाँव चला आया।

मेरी पत्नी और बेटा भी मेरे साथ थे। दूर से देखा मैंने गाँव के अपने घर को, गोया अंतरिक्ष से देखा मैंने धरती उर्वर को। मन में एक धुकधुकी भी थी कि मेरी अधेड़ आँखें मेरे बचपन के दृश्यों का सामना अब न जाने कैसे कर पाएँगी। मेरे ज़हन में बचपन के मधुर दिनों की स्मृतियाँ लौटने लगीं। लेकिन गाँव अब पहचाना भी नहीं जा रहा था। वह जैसे एक बाज़ार में तब्दील हो चुका था। अब घरों में घुस आया था बाज़ार। बाज़ार में खो गए थे घर। अब पक्की गलियों वाले कस्बेनुमा स्वरूप में बदल चुके मेरे गाँव में जगह-जगह कोका-कोला और पेप्सी बेचने वाली दुकानें खुल गई थीं।

दुकानों में वोडाफ़ोन, एयरटेल और आइडिया कनेक्शन के सिम-कार्ड बिकने लगे थे। गाँव में डिश टी. वी., टाटा- स्काइ और केबल-कनेक्शन पहुँच चुका था। सुनने में आया कि 'वालमार्ट' भी उस इलाक़े में अपना आउटलेट खोलने वाला था। कई और बहु-राष्ट्रीय कंपनियों के आउटलेट तो गाँव में पहले ही खुल चुके थे। गाँव अब बाज़ार की गिरफ़्त में जा चुका था। वह मेरा पहले वाला गाँव नहीं रहा था। वह अपना अक्षत क्वाँरापन खो चुका था।

गाँव के पूरब और पश्चिम में उगा जंगल काट दिया गया था। वहाँ कारें बनाने वाली एक विदेशी कंपनी ने अपना प्लांट लगा लिया था। इस कंपनी ने हर तरह के हथकंडे अपना कर कई गाँववालों से भी उनकी ज़मीन ख़रीद ली थी। उत्तर में बहती नदी पर बाँध बन गया था। इस की चपेट में आने से हमारा गाँव तो बच गया था लेकिन उत्तर में बसे कई गाँव बाँध के पानी में डूब गए थे और वहाँ के लोग विस्थापित हो गए थे।

लेकिन जो बात आपको चौंका देगी, अब वह सुनिए। गाँव से दो मील दूर दक्षिण में स्थित दलदल को टनों मिट्टी डाल कर बिल्कुल भर दिया गया था। इस ठोस बना दी गई ज़मीन पर विदेशी सामान बेचने वाली कई दुकानें खड़ी हो गई थीं। उस पुराने दलदल के स्थान पर अब बाज़ार मौजूद था। बाज़ार का नया ' दलदल' - मैंने सोचा।

ख़ैर। समय कब का करवट बदल चुका था। फिर मैं अपने दु:स्वप्नों के जाल में अब तक क्यों फँसा हुआ था? वहाँ खड़े-खड़े मैं बहुत देर तक यही सब सोचता रहा।

मैं सुब्रोतो की याद में कुछ करना चाहता था। मैंने गाँव में ज़मीन ख़रीद कर एक अस्पताल बनाने का फ़ैसला किया। मैंने वही ज़मीन ख़रीद ली जहाँ पहले दलदल हुआ करता था और अब दुकानें थीं। दुकानें तुड़वा कर मैंने वहीं अपने बचपन के मित्र के नाम पर 'सुब्रोतो मुखर्जी चैरिटी अस्पताल' बनवाया। अब इस अस्पताल में इलाक़े के ग़रीब और बीमार लोगों की मुफ़्त देख-भाल होती है।"

 

इतनी कहानी सुना कर बूढ़ा ख़ामोश हो गया। मैंने खिड़की से बाहर देखा। बाहर हवा चुप थी। सामने मैदान में खड़े ऐंठे पेड़ चुप थे। वहीं बेंच के नीचे बैठा रोज़ अपनी ही दुम से झगड़ने वाला लँगड़ा कुत्ता चुप था। एक सिमसिमी ख़ामोशी चू-चू कर सड़क की छाती पर बिछती जा रही थी। और सड़क चुप्पी की केंचुल उतार फेंकने के लिए कसमसा रही थी।

आख़िर सघन चुप्पी को रौंदते हुए बूढ़े की भारी आवाज़ फिर गूँजी, "अपने डर से कभी मत डरो। डर को देख कर अपनी आँखें कभी मत मूँदो क्योंकि जो डर गया, समझो वह जीते-जी मर गया। आपकेमामले में वह डर क्या है, मुझे नहीं पता। पर मेरे मामले में वह डर दलदल था।"


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