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11.12.2007
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विषकन्या
सुषम बेदी


जितना लगाव इस घर से मुझको है क्या संजय को हो सकता है? मैं जिसने अपनी ज़िंदगी के बेशकीमत साल यहाँ गुजारे। इस घर की ईंट-ईंट में तो मेरी साँसे बसी हैं। कल को संजय की बहू मुझे निकाल दे तो मेरा क्या होगा? क्या पापा को इस बात का ख्याल नहीं आता? क्या वे सोचते हैं कि उनके न होने पर भी मेरा अधिकार बना रहेगा?

ये सच है कि तलाक लेने के बाद मुझी को घर रहने के लिये चाहिये था और पापा ने मेहरबान हो कर अपना घर हवाले कर दिया। मैं अपार्टमेंट छोड़ स्थायी तौर पर उन्हीं के साथ रहने लगी।

गर्भवती भी तो थी। अकेली रहती भी कैसे? मम्मी ने जी भर के मेरी सेवा की। महक को मम्मी पापा ने ही पाला। मैं नौकरी भला कैसे चलाती अगर माँ न पालतीं।

पर मैं ने भी तो कुछ कम नहीं किया। पापा की भयंकर बीमारियों में मैंने ही बचाया। रात-दिन सेवा की। संजय तो हमेशा बाहर ही रहा। अब जब मकान देने की बात आयी तो सारा मकान उसके नाम। भला क्यों?

बराबर बाँटे न?

मैं भी वकील करूँगी। पता चले इनको। इतना अन्याय?

माँ को तरसाया दबाया पर मेरे साथ ऐसा नहीं कर पाओगे। जबकि अब समझ में आता है कि मेरा तलाक क्यों हुआ। ऐसे बाप के साथ अजय कैसे निभाता- लव मी लव माई डाग...सो वो पहले ही भाग गया।

जिस पापा का होना हमेशा मेरा सौभाग्य या अब वैसा क्यों नहीं लगता?

मेरे मौजूदा रवैये पर मम्मी, भाई-बहन सब मुझी को बुरा-भला कहते हैं। मेरे त्याग को कोई नहीं देखता। छुटकी बोलती है- अब तेरा तलाक हो गया तो हम या मम्मी-पापा उसके जिम्मेवार थोड़े न हैं। अपनी करनी सबको खुद भुगतनी पड़ती है। मैं तो अपने पति से खूब बना कर रखती हूँ। तुझे भी चाहिये था।

मैं सर से पाँव तक सूखी लकड़ी की तरह जलने लगती हूँ।

गुस्से में मैंने धमकी दी थी नालिश करने की तो पापा ने भभक के कहा था- जिस थाली में खाना उसी में छेद,  आगे जोड़ा- खाती है और भौंकती भी।

यही नहीं...पापा चाहते हैं मैं उनका कुत्ता बन कर रहूँ...जो जूतियाँ खा कर भी दुत्कारे नहीं...दुम हिलाता रहे। भौंकनेवाला कुत्ता कैसे बन गयी मैं?

पर वैसा नहीं होगा।

अगर पापा को मुझसे प्यार है तो साबित करना होगा...कथनी ही नहीं ..करनी में भी...है हिम्मत तो कर दें घर को सुरभि के नाम।

वर्ना मैं भी वंचित कर दूँगी पापा को अपने साथ से...अपने प्यार से...अपनी बात से...अपने साये तक से...हाँ कर सकती हूँ ऐसा। जानती हूँ पापा तब खूब तड़पेंगे...

बस यही एक हथियार बचा है न मेरे पास?

मुझे मालूम भी है कि मैं क्या कर रही हूँ और नहीं भी मालूम...पल में तोला पल में मासा चलता रहता है हिसाब-किताब....

क्या पापा से मुक्ति पीड़ा से मुक्ति हो सकती है? क्या मेरे लिए वहाँ और भी ज्यादा अंधेरा नहीं? और भी ज्यादा शीशे के चूर...काँटों के सलीब?

पापा के बिना कोई हस्ती हो सकती है मेरी?

पर उससे भी बड़ी है यह जलन...अवहेलना की मार...मेरी सारी अस्मिता को फूँक की तरह उड़ा देने की उनकी जुर्रत?

क्यों????...आखिर क्यों?

मैं क्या कोई राह का पत्थर हूँ कि यूँ ही ठोकर मारकर हटा दो?

पता तो लगे किससे वास्ता पड़ा है...

जो पलटकर लगे वही तीर हूँ मैं...

 

जिस धातु ने पापा को गड्ढा है...उसी से गढ़ी हूँ मैं भी...

एक बार नश्तर चुभोया तो घाव कभी भरेगा नहीं!

पापा को कैसे समझाऊँ...मेरे क्रोध की आग कभी बुझने नहीं वाली।

बेहोश कर देनेवाली दवाई से भरा यह इंजेक्शन पापा के दर्द को कम करेगा पर मैं ..एनीस्थीज़ीआलोजिस्ट..डा. सुरभि पाँडे- यह भी जानती हूँ कि दवा की कितनी मात्रा पापा को हमेशा के लिये मुझसे और अपने-आप से मुक्ति दिला सकती है?

क्या मेरे भीतर लगा हुआ यह दावानल मेरे हाथ पर काबू पा सकेगा...या...क्या पापा के प्यार का भरोसा कहीं बचा है मुझमें? नहीं जो प्यार करता है वह रीति-रिवाज की बात नहीं करता। प्यार में रीतियों को तोड़ना होता है....लेकिन पापा ने तो ऐसा कभी कहा नहीं?

वे तो रीति-रिवाज के हमेशा मानते रहे। सब कुछ किया- बच्चों को पाला-पोसा। शादियाँ कीं। पत्नी को घर की सेवा में लगा रखना भी रीति के खिलाफ नहीं। देखा जाये तो पापा ने सभी कुछ रीतियों के मुताबिक ही किया।

सिर्फ़ मुझसे प्यार ...हाँ मुझसे इतना ज्यादा प्यार...यही शायद रीति के खिलाफ़ होगा...!

तो मुझे कोई उम्मीद नहीं होनी चाहिये कि पापा किसी नियम के खिलाफ़ जाकर मुझे वे सौंपेंगे जो मेरा प्राप्य नहीं।

तो फिर क्या है मेरा देय?

लेकिन क्या मैं पापा को वैसे ही नहीं मार रही जैसे उन्होंने मुझे पाला...यानि कि मारा...?  आज मैं उन्हें खुद से पूरी तरह वंचित कर देना चाहती हूँ...अपनी बेटी से भी। प्यार का कोई स्रोत न रहे...सुनीता, संजय का प्यार मिले भी तो उसकी वह कीमत नहीं जो मेरे प्यार की है। यह मैं जानती हूँ इसीसे उस प्यार को लौटा लेना चाहती हूँ...

क्या यही कहलाती थीं विषकन्या जिन्हें पाला-पोसा जाता था..दूसरों की हत्या करने के लिये। क्या ऐसी विषकन्यायें भी होती होंगी जिन्हें अपनी हत्या के लिये भी पाला जा सकता होगा?

क्या मेरे हाथ की यह सूई वक्त के साथ बलात्कार करेगी या यूँ ही धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा ज़हर....यह क्या? मेरा हाथ क्यों काँप रहा है...? जैसे कोई भूचाल मच गया हो मेरी हथेलियों में...मेरी उंगलियों में......!

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