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11.12.2007
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विषकन्या
सुषम बेदी


 संजय तो घर में सबसे छोटा था। उसकी पढ़ाई-लिखाई सबकी देखभाल मैंने ही की। आज अगर वह कुछ बना है तो मेरी ही भागदौड़ से..वर्ना और कौन था उसे दिशा दिखानेवाला..

और अब किस परंपरा की.. किस भारतीयता की बात करते हैं पापा कि मकान बेटे को ही दिया जाता है... मैं तलाकशुदा...जिसने पूरी ज़िंदगी पापा के नाम लगा दी। अब चालीस साल की तो हो ही चुकी हूँ...ज़िंदगी का खूबसूरत पासा तो पलट ही चुका..

क्यों कर रहे हैं पापा ऐसा...?

मम्मी के मुँह में कभी जबान थी ही नहीं जो अब होगी। फिर भी क्यों चाहती हूँ कि मम्मी पापा को समझाये...मुझसे ऐसा बर्ताव क्यों...

मैं बड़ी हूँ..

मैंने बेटे की तरह सब निभाया है..

मुझे क्यों नहीं मिल सकता मकान?

अभी भी बिमारी में पापा की कौन देखभाल कर रहा है? मैं ही न...

मैं चाहूँ तो आज भी...अगर छोड़छाड़ के ही चली जाऊँ तो देखती हूँ कितने दिन और पापा ज़िंदा रह सकते हैं...

अपना काम-धंधा छोड़ के मैं ही बैठी हूँ उनकी सेवा करने वर्ना दूसरी दोनों बेटियाँ तो शादी करके रफादफा...और बेटा भी नौकरी के नाम पर कभी एक शहर में तो कभी दूसरे...सिर्फ़ सुरभि से ही उम्मीद कि वह अपना सब छोड़छाड़ पापा की सेवा में निवृत्त हो...भला क्यों...

पर यह भी शायद मेरी अपनी मजबूरी है...हड्डी न टूटती तो मैं भी लाचार क्योंकर होती...फिर डिसेबिलिटि तो मिल ही रही है...काम पर फिलहाल लौटने की ज़रूरत ही नहीं...शायद सालों साल तक न लौटना पड़े...खैर वह तो डाक्टरों की रिपोर्ट पर मुनस्सर करेगा।

बाकी दो चार दिन लिये आते हैं और पापा को देखदाख कर लौट जाते हैं...मम्मी भी कभी कमर दर्द तो कभी सर दर्द को लेकर पड़ी जाती है...एक मैं ही तो हूँ जो पापा को रोज देखे बिना रह भी नहीं सकती..

और सोचती हूँ कि पापा भी नहीं रह सकते...

शायद इसीलिये भीतर कहीं यह भी चाहती हूँ कि पापा सचमुच न हों, तो कितना सही हो जाये सब...मेरी मुक्ति...मेरा त्राण...मेरी अपनी ज़िंदगी...एक नयी ज़िंदगी की शुरूआत...!

क्या उसी में है मेरी मुक्ति...? मेरी नयी ज़िंदगी...सचमुच...क्या ऐसा है? हो सकता है?

कैसे होगी नयी शुरूआत....कोई ढंग का पुरुष तो कभी मिलता नहीं...अब जैसे-जैसे उम्र की ओर बढ़ रही हूँ..क्या उम्मीदें और भी कम नहीं हो जायेंगी?

शायद पापा को भी कष्ट होता है मुझे घर में देख....उनको भी यही सही लगता कि मैं भी पति के घर में बसूँ...पर अब...शायद उसके लिये बहुत देर हो चुकी....नहीं यहाँ तो सब कहते हैं..शादी के लिये कोई भी उम्र सही है...पर मेरा मन कहीं अंटे ...तब न...पापा की देखभाल से ही फुरसत मिले...तब न...?

और अब यह कर क्या रही हूँ मैं...? देखभाल भी कहाँ ठीक से कर पाती हूँ...मन तो इतना जला-जला है....

नहीं पापा से महक का लगाव नहीं होने दूँगी।...देते रहें आवाज़ें..। नहीं जायेगी महक उनके पास....

 

पर ज्यों ही मैं गुसलखाने गयी..वह उठकर पहुँच गयी पापा के पास...। मैंने पापा के सामने ही जोर से थप्पड़ जड़ा था उसे...खबरदार जो खेलने का नाम लिया...पहले अपना काम्पोज़िशन लिखो....

यही महक जब नयी-नयी स्कूल पढ़ना शुरू हुई थी तो रोज़ पूछती थी-एवरीवन हैज़ ए फ़ादर। हू इज़ माई फ़ादर?”

मैं नहीं बता पायी थी कि तेरा बाप तो तुझे पैदा होने पर देखने तक नहीं आया। उसका दिल रखने के लिये बोली थी- पापा इज योअर फ़ादर।

नो ही इज माई नाना।

नाना इज आलसो ए फ़ादर। वो हम दोनों के पापा हैं।

 

महक यही सवाल पूछती रही थी। नाना-नानी का प्यार माँ के प्यार से भी ज्यादा लाड़ लड़ाता था। महक बिना ज्यादा विवाद किये मेरा सुझाव मान गयी थी।

अब खुद पछताती हूँ कि क्यों इस भुलेखे में रखा बच्ची को।

यह बात नहीं कि वक्त के साथ बच्ची सब जान-समझ नहीं जायेगी पर शायद इससे उसका प्यार उसके मन में और भी अधिकारिक, और भी पुष्ट हो गया होगा...आज जब मैं खुद को  पापा से तोड़ना चाह रही हूँ तो लगता है...कि महक के जरिये से जो पापा के साथ मैंने जो दोहरा रिश्ता कायम कर लिया था...उसका क्या होन वाला है...क्या सही होगा!

जो गुस्सा, आक्रोश अपने मन में है क्या महक के भीतर उगाया जा सकता है....उगाना सही होगा? क्या मैं महक को उसी तरह कंट्रोल करने की कोशिश नहीं कर रही जैसे कि पापा ने मेरे साथ किया..यहाँ तक कि मम्मी से भी मेरा प्यार नहीं पनपने दिया..?

 

दरअसल जिसे मैं पापा का प्यार मानती रही...जिसे पाकर हमेशा इतराती रही..अब जाकर लगता है कि वह प्यार नहीं ज़हर था...जिसे थोड़ा-थोड़ा पिलाकर पापा ने मुझमें एक विषकन्या रच दी थी। जिसमें औरों के लिये सिर्फ़ ज़हर था...अजय को तो मुझमें ज़हर ही दिखा न सिर्फ़...ऐसा ज़हर कि जो महक को भी पिता से तिरस्कार की मार दे गया..

और मेरा मन हर गलत होने के लिये पापा को ही जिम्मेदार ठहराता है...पापा जिन्होंने मेरा संसार रचा!

रचा या रचने से रोक दिया!

रोका ही या हमेशा के लिये तहस-नहस कर दिया। यहाँ तक कि मेरी आगे की पीढ़ी का भी सर्वनाश...

पर यह सब पहले तो नहीं सोच पायी थी? इधर कुछ अरसे से ही मन दूसरी दिशाओं में भटक गया है..?

पर मैं शायद यह बहुत घटिया बात सोच रही हूँ कि मकान पापा मेरे नाम पर क्यों नहीं करवाते। उनका तर्क है कि मुझे दें तो दूसरी बेटियों को भी।

पर दूसरी बेटियाँ क्या मेरी बराबरी कर सकती हैं जो मेरे बराबर उनको तौला जा रहा है? जिस तरह मैंने पापा के कंधे से कंधा मिलाकर घर भर का बोझ उठाया है क्या और कोई...? उनका चाहे बेटा ही...? कर पाया है? अगर रिटायर होने पर बेटे ने इनको पैसे भेजने शुरू कर दिये तो क्या घर पर सारा हक उसी को हो गया? मैं जो यहाँ मर-खप रही हूँ...पता नहीं कब से मरती-खपती रही। सारी ज़िंदगी पापा के नाम कर दी...कल को शादी हुई तो संजय बीवी का नहीं हो जायेगा...?

मैं सारा वक्त इनके साथ रहती हूँ तो मैं कैसे परायी हो गयी?

भला किस नजरिये से पराया धन हूँ मैं...पैदा हाने से अब तक तो माँ-बाप के साथ हूँ। पति से भी इसीलिए कुछ नहीं मिल कि पिता की बेटी है और अब पिता कुछ नहीं देना चाहता कि पराया धन है...?

यह कैसा रिवाज है...कैसी रीति है...?

किसने बनाये हैं ये नियम...?

घर बेटे के नाम और काम सारा बेटी से।

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