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11.12.2007
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विषकन्या
सुषम बेदी


 

मेरे हाथ में ही सुई है, दवा भी। चाहूँ तो बहुत कुछ कर सकती हूँ। चाहती हूँ भी। फिर क्यों रुक जाती हूँ।

क्या सचमुच डाक्टर के हाथ में होता है मारना-जिलाना?

पर पापा तो डाक्टर नहीं थे। फिर भी मुझे मारना-जिलाना क्या उन्हीं के हाथ में नहीं था?

हो सकता है पापा को इस बात का अहसास ही न हो जबकि एक डाक्टर के रूप में मैं लगातार मारने-जिलाने की बात को लेकर अतिरिक्त सचेत रही हूँ। इसीलिये सोच-समझ कर कोई एक्शन लेती हूँ। मुझे मालूम है कि अंतत: जिम्मेदारी मेरी हो होगी।

जहाँ तक पापा का सवाल है उन्होंने शायद इस तरह से सोचा भी न हो! आखिर वे क्या कभी सोच सकते थे कि वे मुझे मार रहे थे! और क्या मैं भी कभी इस तरह सोच सकती थी? या अब सोच सकती हूँ।

अगर पापा को पता लगे कि मेरा दिमाग किस उल्टी दिशा में जा रहा है तो...

मारना सिर्फ़ दवा की गोली से ही तो नहीं होता..? बहुत कुछ और भी तो... बातें...दृष्टियाँ, और कितना-कुछ जिसे नाम भी नहीं दिया जा सकता।

क्या पापा सोच के इस तरीके को कभी समझ सकते हैं। कोई कह दे तो भड़क नहीं जायेंगे? फिर सिर्फ़ यही प्रस्फुटन - दिमाग खराब हो गया है”, “पागल हो गयी हो के इलावा और क्या हाथ में आयेगा?

ओह कितनी अजीब तरह से लिबड़ गयी हूँ पापा की दिनचर्या सें मैं। पैर की हड्डी न टूटी होती तो इस तरह मेरा घर पर पड़े रहना नामुमकिन हो जाता। तब मेरे जैसा पापा की सेवा के लिये भी यहाँ कौन बचता! करते अपने-आप मम्मी-पापा जैसे दूसरे माँ-बाप करते हैं या फिर नर्सिंग होममें दाखिल कर दिया जैसा.. जैसे और लोग होते हैं... मैं हूँ इसी से पापा का नखरा भी  है और अधिकार भी.. कम से कम वे तो अधिकार मानते ही हैं वर्ना क्योंकर मेरा इस तरह उनके आसपास रहना उनको स्वीकार होता.. या इसे हालात की मजबूरी कह दिया जाये...!

मेरे और उनके दोनों के हालात!

मेरा अकेलापन और मम्मी के रहते भी उनका बुझाबुझापन!

अपनी दशा के लिये तो मैं उन्हीं को जिम्मेदार ठहराती हूँ.. यहाँ तक कि यह एक्सिडेंट में हड्डी भी न टूटती अगर पापा ही ने मुझे दवा लाने बाहर न भेजा होता!

भेजते न अपने बेटे को? जिसकी अब तरफ़दारी कर रहे हैं...?

महक को बुला रहे थे पापा। मैं नहीं चाहती कि वह होमवर्क छोड़कर उनका मनोरंजन करने जाय। यूँ जरूरी नहीं कि पापा ने उसे मनोरंजन के लिये ही बुलाया हो पर मुझे यही लगता कि महक का उनसे बात करना जरूरी नहीं। वह क्यों अपना कीमती वक्त उनके लिये ज़ाया करती फिरे.. थोड़ी देर में ही उसे डाँस की क्लास के लिये जाना है। होमवर्क खत्म नहीं होगा तो स्कूल में मुसीबत!

इसीलिये मैंने आवाज़ लगाकर कहा-वह नहीं आ सकती। होमवर्क खत्म करना है।

पापा ने वापिस जवाब नहीं दिया। हो सकता है कि उनको अंदाज हो गया है कि सुरभि आजकल कुछ उदंड-सी हो रही है, आगे जवाब देती है। या फिर यही कि महक का स्कूल का काम आखिर सबसे जरूरी है।

पर जब से पापा की आवाज़ पड़ी है खुद महक ही उखड़ गयी है। पढ़ाई में मन नहीं लग रहा। हिसाब उल्टा-सीधा कर रही है। मैं जानती हूँ वह पापा के पास जाना चाहती है। पर जब तक मेरे बस में है मैं उसे पापा के पास नहीं जाने दूँगी।

क्यों ऐसी हो गयी हूँ? वर्ना मैं खुद भी तो महक की तरह ही थी। पापा की आवाज़ पड़ तो जाये, बस उनके सामने पहुँच जाती थी। न भी पड़े तो क्या! यूँ भी आगे-पीछे घूमती रहती थी।

पापा, पापा पा..पा..पा। यही नाम जुबान पर रहता। पापा की इतनी दीवानी कि मम्मी की भी पापा से चुगली करती। पापा मम्मी को गुस्सा होते तो मजा आता। मम्मी मुझसे डरने लग गयी थीं। पापा के माध्यम से मम्मी पर एक तरह पहरा लगा दिया था। मम्मी कहाँ जाती है, कब जाती है, क्या करती है... जितना कुछ मैं जान सकती थी, सब पापा के रिपोर्ट कर देती। पहले अनजाने में यह सब करती थी। फिर समझ आने पर जानबूझ कर।

मम्मी को सामने पापा और मैं एक हस्ती थे। यूँ भी चूँकि मैं घर में पहला बच्चा थी, मम्मी हर नये आनेवाले बच्चे के साथ मशगूल हो जातीं और मैं ज्यादा से ज्यादा वक्त पापा के साथ गुजारती। फिर तो बाहर भी मैं ही पापा के साथ जाने लगी थी। शापिंग, क्लब, टेनिस, बुआ के यहाँ। सब में पापा और मेरा साथ।

पापा जब अमरीका में माइग्रेट कर गये तो मेरा और पापा का नैकट्‌य और ज्यादा बढ़ गया। अंग्रेज़ी तो मुझी को सबसे अच्छी आती थी। सो जितने भी आवास संबंधी कागजात थे, या नौकरी के लिये अर्ज़ियाँ देनी होतीं वह सारी मैं ही लिखती। अमरीकी तौर तरीकों की सबसे ज्यादा मुझी को समझ थी। शायद इसीलिये कि मैं तब हाई स्कूल के आखिरी साल में थी और सोलह-सत्रह साल की उम्र में काफी परिपक्व थी। शायद यह भी था कि हालात ने मुझे और भी ज्यादा समझदार बना दिया। बाकी भाई-बहन छोटे थे सो उनका काम भी मुझी को संवारना पड़ता। उनके स्कूलों में दाखिले,  होमवर्क में मदद, आने-जाने की मुश्किलें...इन सब कामों का जिम्मा एक तरह से मुझ पर ही आ पड़ा था। क्योंकि मम्मी के लिये घर का काम ही बहुत हो गया था, उपर से घर की आर्थिक हालत ठीकठाक बनायी रखने के लिये उन्होंने ग्रोसरी स्टोर में सेल्सगर्ल की नौकरी कर ली थी। पापा को भी एक सिनेमा हाल के काऊँटर पर नौकरी मिल गयी थी।

पापा मुझे डाक्टर बनाना चाहते थे और मैं बनी भी। मैंने उनके सारे सपने पूरे किये। पापा सबके सामने मेरी तारीफ करते अघाते न थे। यह भी कि मैं किसी लड़के से कम नहीं जिस तरह से मैंने बड़े होने के नाते जिम्मेदारी निभायी है, छोटे भाई-बहनों का ख़्याल रखा है। सब कुछ!

यूँ मेरे छोटे भाई-बहन मेरी इज्जत करते थे तो मुझसे खार भी बहुत खाते थे। इन्हीं बातों पर कि मुझे खास अधिकार मिले हुए हैं जो उनको नहीं मिले। वह चाहे खाने-पीने-सोने, किसी भी महकमे में मनमानी करना हो या जब मर्जी आये छोटों को डाँट-डपट देना या उनसे जी चाहे जो भी काम करवाने की हुक्मबाज़ी हो। मम्मी से ज्यादा रौब मेरा था उन पर। मेरे खिलाफ़ वे मम्मी से ही शिकायतें करते। उनको पता था कि पापा के दरबार में मेरे खिलाफ़ कुछ भी नहीं सुना जायेगा। उल्टे पापा उन्हीं को डपट देंगे और साथ में जोड़ देंगे कि सुरभि जैसा समझदार और कोई नहीं। वह जो भी कहती या करती है, ठीक है।

पर पापा से ओहदा पाने के लिये मुझे भी वही करना पड़ता था यानि कि पापा जो कहें या फ़ैसला करें, वह मेरे लिये पत्थर की लकीर था।

यहाँ तक कि मैंने शादी भी उस व्यक्ति से की जिसे पापा ने मेरे लिये चुना, देखा-भाला और पास कर दिया। यूँ मेरी पूरी हामी थी उसमें। देखा जाये तो इस बारे में मेरी कोई साफ सोच ही नहीं थी। पापा जो करेंगे ठीक करेंगे.. इसी का भरोसा था।

पापा को यह लड़का भारत से लाना पड़ा था। यहाँ के लड़के या तो उनके लिये बहुत ज्यादा अमरीकीकृत थे, या अंग्रेज़दाँ।

देखा जाये तो जो लड़का पापा ने मेरे लिये चुना उसमें मेरे हिसाब से कोई भी कमी नहीं थी.. हैंडसम था, डाक्टर था, बहुत ही विनीत, शालीन। सचमुच कहीं भी कोई त्रुटि नहीं।

शादी भी खूब धूमधाम से की पापा ने।

फिर ऐसा क्या हुआ कि यहाँ आने के हफ़्ते भर बाद ही पहले वह पापा से फिर मुझसे नफ़रत करने लगा।

पापा ने हमारा आपसी रिश्ता सुधरवाने के लिये हमें अलग अपार्टमेंट भी लेकर दिया। पर एक बार बात बिगड़ी तो बिगड़ती ही चली गयी।

पहले उसने कहा-यूअर फादर इज़ वैरी डोमीनियिंग।

फिर अलग रहने लगे तो कहने लगा-यू आर लाइक योअर फादर।

प्यार पनपने से पहले ही नफ़रत का पानी हमारे रिश्ते को सींचने लगा। फिर कितनी दूर साथ जाया जा सकता था?

पापा ने हम दोनों को ही समझाने की कोशिश की। यूँ पापा की निगाह में मैं तो कुछ गलत कर ही नहीं सकती थी। ज्यादा समझाने का काम उसी को किया गया। पर मुझसे पापा भरसक यह ज़रूर कहते रहे कि कोशिश करूँ कि रिश्ता न टूटे तो भला है। पर मेरे बस में ही कहाँ था सब कुछ। अजय ने साल गुजरने से पहले ही मुझे तलाक देने का फैसला कर लिया था।

इस बीच मैं गर्भवती भी हो गयी थी पर आनेवाले में कहीं किसी तरह का मोह न पड़ जाये, उसने मेरे होनेवाले को किसी और का .. यहाँ तक कि मेरे पापा का बच्चा कह कर मुझसे तलाक ले लिया था।

अस्पताल में वह महक को देखने भी नहीं आया था।

क्या इतनी घृणा सचमुच उसे पापा की वजह से थी?

मैं आजतक इस बात का फैसला नहीं कर पायी।

वर्ना मैंने सचमुच उसे खुद को पूरी तरह समर्पित करने की कोशिश की थी।

यह सच है कि पापा का फोन भी आता तो मैं पूरी तरह से उसमें घुस जाती।

क्या मुझे पापा को दोष देना चाहिये या खुद को?

कि मैं पापा से कभी मुक्त नहीं हो पायी!

यह मेरा दोष है या पापा का?

और अब जब कि पापा उम्र के इस पड़ाव पर आकर पूरी तरह से मुझ पर निर्भर हैं तो मैं.....

हैरान तो मैं पापा पर हूँ।

जिस व्यक्ति को मैं समझती रही कि मुझे सबसे ज्यादा प्यार दिया है और जिसके लिये मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी ख़्वार की.. आज जब जायदाद का फ़ैसला करने की बात हुई है तो अपना इकलौता मकान बेटे के नाम किया जा रहा है....

क्यों?

पापा ने प्यार मुझी को दिया, मुझी से लिया.. फिर यह बेटा कहाँ से आ गया?

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