अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
04.01.2015


यथार्थ

भागती है दूर परछाई मेरी मुझसे
चाहता हूँ
पकड़ना जब भी उसे
बोली मुझसे एक दिन -

काम हो,
तुम्हें छू नहीं सकती।

क्रोध हो,
तुझे सह नहीं सकती।

लोभ हो,
तुम्हे पा नहीं सकती।

मोह हो,
तुम्हे अपना नहीं सकती।

तुम आदमी हो,
तुझे मैं जी नहीं सकती ......


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें