अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
04.27.2016


संघर्ष "एक आवाज़"
प्राक्कथन

सत्य घटना पर आधारित

03

 सृष्टि का निर्माता जिसको हम परमात्मा, अल्ला, वाहेगुरू, भगवान न जाने कितने नामों से पुकारते हैं, जब उसने इस धरती का निर्माण किया, तब छोटे-बड़े का भेदभाव नहीं रखा था। उसने सब मनुष्य जाति को बराबर का अधिकार दिया। क्योंकि उसने मनुष्य बनाया था केवल मनुष्य। लेकिन मनुष्य की खोज, आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा ने मनुष्य को इतना दरिद्र बना दिया कि उसने मनुष्य जाति के विरुद्ध ही षड्यंत्र / चक्रव्यूह बनाने शुरू कर दिए।
विज्ञान के इस युग में मनुष्य जातिगत जिज्ञासु भाव से इतनी खोजों में लगा हुआ है कि वह इस सृष्टि के निर्माता के विरुद्ध भी जा रहा है। उन्हें यह तनिक भी स्मरण नहीं कि जब-जब भी हमने इस सृष्टि के निर्माता के विरुद्ध कार्य किया तो हमें मुँह की खानी पड़ी। आये दिन संसार के किसी न किसी कोने में तूफान, चक्रवात, भूकम्प, ज्वालामुखी आते रहते हैं। मनुष्य जाति इनसे न कुछ सीख लेकर अपितु इसके विरुद्ध ही कार्य करने में लगी हुई है।

दूसरा परिच्छेद

महाराजा गंगा सिंह के सफल प्रयासों से निर्मित राजस्थान के अन्न का भंडार कहलाने वाला श्रीगंगानगर की शोभा देखते ही बनती है। लम्बी सीधी सड़कें, सुन्दर इमारतें देखते ही दिल ख़ुश हो जाता है। श्रीगंगानगर की अपने आप में अनेकों विशेषताएँ हैं। पाकिस्तान के साथ लगती हुई सरहद के बावजूद भी जो तरक़्क़ी इस शहर ने की वह पूरे भारत देश में अपना अलग ही अस्त्तित्व रखता है। इस शहर की सड़कों की सफ़ाई देखते ही बनती है। इस शहर की अनुपम आभा को बिखेरने के पीछे जो कहानी जुड़ी है, वह सचमुच दिल को झकझोर देने वाली है। कहते हैं महाराजा गंगा सिंह के समय काल में श्रीगंगानगर का क्षेत्र टीलों से भरा हुआ था। वहाँ पर जीवन निर्वाह करना बहुत मुश्किल था। लोगों को अपनी (पानी) प्यास बुझाने के लिए भी सैंकड़ों मील दूर जाना पड़ता था। इतनी मुश्किलों के बाद भी लोगों में प्रेम-भाईचारा, धर्म, आदर सत्कार कूट-कूट कर भरा हुआ था। महाराजा के समय में एक लम्बा अकाल पड़ा। कहते हैं महाराजा बहुत भक्तिशील व्यक्ति था। उसने देवी की स्तुति की और ज्ञान प्राप्त किया। उस ज्ञान में उसे यह सूचना मिली कि सैंकड़ों मील की दूरी पर एक ब्यासा और सतलुज दरिया चल रहा है। वही इस क्षेत्र को आबाद करेगा। महाराजा एक क्षण भी गँवाये बग़ैर पानी की तलाश में निकल पड़े। जब महाराजा को दरिया का पता चला तो उन्होंने उसी क्षण नहर निकालने का प्रण किया। उन्होंने पंजाब रियासत के राजा से नहर निकालने का प्रस्ताव रखा। आगे से फ़रमान आया कि जितनी नहर आप को गहरी लेकर जानी है...उसकी गहराई जितना पैसा हमें देना होगा। वचन दिया कि यह नहर आजीवन इसी प्रकार से चलती रहेगी...।

महाराजा गंगासिंह जब गंभीर मुद्रा में सोचने लगे तो उनको केवल अपनी प्रजा का दुःख, त्रासदी, बिलखते बच्चे, करहाते बज़ुर्ग, का चेहरा सताने लगा। कहते हैं तब रुपये देते वक़्त पैसों की कमी हो गई थी, जिसकी पूर्ति एक वेश्या ने पूर्ण की थी।

महाराजा गंगा सिंह के कृत कर्मों से ही यह नहर जो आज श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ ज़िलों का जीवन बन चुकी है का आगमन हुआ।

वर्तमान में परिस्थितियाँ ऐसी बन गई हैं कि आज इस सुन्दर से क्षेत्र को दीमक लग चुकी है, जो इन्हें खोखला करने पर उतारू है। लेकिन जब तक इस क्षेत्र के आम निवासी, नागरिक ज़िन्दा हैं वह उन्हें ऐसा नहीं करने देंगे। क्योंकि आम आदमी में जाग्रति चाहे देरी से आए लेकिन जब आ जाती है तब राज्य क्या, केंद्र क्या, संसार को भी घुटने टेकने पड़ते हैं। वर्तमान में तो परिस्थितियाँ इतनी ख़राब हो चुकी हैं कि राज्य सरकार श्रीगंगानगर के लिए बजट भी पारित नहीं करती। बजट तो दूर श्रीगंगानगर का नाम तक नहीं आता। अगर ग़लती से आ भी गया तो उस बजट का पता नहीं चलता कब आया कब लग गया। मेरे भारत देश की यही विडंबना है कि जो भी अपने पद पर आसीन होता है वह अपनी शक्ति का वर्चस्व दिखाए बिना नहीं रह सकता। वह कार्य चाहे किता ही ग़लत क्यों न हो। जब यह क्षेत्र केवल कृषि पर चलता है तो किसानों के साथ इस प्रकार का व्यवहार क्यों? बल्कि किसानों से जुड़े हुए हर आम आदमी के साथ अन्याय क्यों...?

दोस्तो समय की पुकार ने आज हमसे यह प्रश्न किए हैं..., हर आम आदमी को इनकी समस्याओं को समझना होगा। इनको दूर करना होगा। क्योंकि अगर हम ऐसा करने में नकामयाब रहे तो वह दिन दूर नहीं जब हमें रोटी तक नसीब नहीं होगी। हमारे बच्चे किसी कोने में पड़े भीख माँग रहे होंगे क्योंकि यहाँ जिसके पास शक्ति है तख़्ते वही पलटता है। हम सब को वही प्रेम, आदर-सत्कार और शक्ति अपने अन्दर पैदा करनी होगी जो महाराजा गंगासिंह के समय-काल में थी।

आज की ताज़ा ख़बर....आज की ताज़ा ख़बर ....

....श्रीगंगानगर में दिन-दिहाड़े जो हत्या हुई, प्रशासन उसकी छानबीन में पूर्णतया असफल...पुलिस की कड़ी नाकाबंदी के बाद भी हत्यारे ग़ायब।

...हज़ारों लोगों ने यह ख़बर ख़रीदी...।

"यह देखो देव ‘प्रशासन’ की नाटकबाज़ी....मैं पूछती हूँ?...क्या इनको पता नहीं दिन-दिहाड़े हत्या करने वाला कौन है...? आपके शहर में दिन-दिहाड़े हत्या हो जाए और प्रशासन की कड़ी नाकाबंदी के बाद हत्यारे भाग जाएँ यह कभी हुआ है...?" मधु की मधुर आवाज़ ने मानों देव को सोचने पर मजबूर कर दिया हो...

"मधु ...यह सब बकवास है..."

"क्या बकवास है...?"

"....यही कि प्रशासन को इस हत्या के हत्यारे का पता न हो, मधु इनको सब पता होता है। यह इन्हीं नेता और ऊँचे पद पर आसीन व्यक्तियों के पालतू कुत्ते होते हैं (जिन्हें आज हम वी.आई.पी. की संज्ञा से विभूषित करते हैं) जब यह लोग इनको भौंकने के लिए बोलते हैं...भौंकते हैं..,जब काटने के लिए बोलते हैं...तो नोचते है ...काटते हैं।...इनका कोई अस्तित्व नहीं।"

मधु देव की बातों में ...खो गई थी।

"....मधु सुनो..?"

मधु चुप-चाप जैसे देव की बातों को सुनकर जैसे किसी गंभीर चिंता में डुबकी लगा रही हो....चिंताएँ माथे की सिलवटों से स्पष्ट हो रही थीं।

"मधु...मधु..मधु..."

"हाँ माफ़ करना मैं सुन नहीं पाई, यार देव एक बात बताओ जब प्रशासन इनको सज़ा नहीं दे पाता तो इनको सज़ा कौन देगा...?"

"मधु सज़ा भी यही देंगे....।"

"वो कैसे...?"

"मधु तुम तो जानती ही हो कि इस सिस्टम ने हर आम व्यक्ति को झूठा आश्वासन देकर, अपनी नीतियों से मतलब ही निकाले हैं। जब मतलब निकल गया तब उन्हें फालतू समझ कर बाहर फेंक दिया।"

"....देव यह तो वह नीति अपनाते है कि साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।"

"...मधु तुमको पता है इस बार अपने कालेज के इलेक्शन में जीत किसकी होगी?"

"...क्या बताऊँ देव एक तरफ मंत्री का बेटा खड़ा है, और दूसरी तरफ अपना केशव। उसके पास तो केवल प्रतिभा है। स्टूडेंटस वाकिफ़ हैं उसके व्यवहार से। मंत्री के बेटे के पास तो अपने बाप की स्पोर्ट, पैसा, और प्रशासन तीनों हैं। लेकिन फिर भी देव पता नहीं क्या मुझे ऐसा लगता है जीत केशव की ही होगी। क्योंकि उसके पास वह है जो मंत्री के बेटे के पास नहीं।"

"ऐसा क्या है...? जो मंत्री के बेटे के पास नहीं...?"

"देव... बताऊँगी समय आने पर!"

देव और मधु दोनों अपने तेज़ क़दमों से बस स्टेंड से डॉ. बी.आर. अम्बेडकर कॉलेज की तरफ़ चलते हैं ...। नहर की पटरी पर चलते हुए दोनों नहर के पानी के वेग को देखते हैं ....जैसी किसी बवंडर में खो गए हों ....।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें