अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
02.13.2015


 मैं चाहूँ

जिसे पढ़कर आँखें नम हों,
और सुनकर दिल भर आए,
जिसे पढ़ने वाला चाहे,
और सुनने वाला सराहे,

मैं चाहूँ कुछ ऐसा लिखना!

अर्पण हो जिसमें यह तन-मन,
हो शब्दों की मधुर सी माला,
पन्नों को मुड़-मुड़ कर पलटे,
हर कोई पढ़ने वाला,

मैं चाहूँ कुछ ऐसा लिखना!

प्यार का रस भी भरा हो जिसमें,
ममता भी जिससे छलके,
देश प्रेम से भरी हो गाथा,
जिसे सुन कर अंग-अंग फड़के,

मैं चाहूँ कुछ ऐसा लिखना!

जिसमें सच हों सबके सपने,
बसा लूँ ऐसी प्रीत की नगरी,
हर राह पर बस फूल बीछे हों,
अल्लाह पूरी करदो ख़्वाइश मेरी,

मैं चाहूँ कुछ ऐसा लिखना!

नफ़रत ना अत्याचार हो जिसमें,
लालच ना भ्रष्टाचार हो जिसमें,
दुनिया एक सजाऊँ ऐसी,
हो बस केवल प्यार हो जिसमें,

मैं चाहूँ कुछ ऐसा लिखना!

दिल को जो झंझोड़ कर रख दे,
हर पंक्ति में हो ऐसी सिरहन,
जिसे पढ़ कर हो जाएँ खड़े रोंगटे,
थम जाए दिल की धड़कन,

मैं चाहूँ कुछ ऐसा लिखना!

मान सम्मान हो जहाँ बड़ों का,
और बच्चों की मीठी किलकारी,
नील गगन की एक छत के नीचे,
प्यार में सिमटे दुनिया सारी,

मैं चाहूँ कुछ ऐसा लिखना!

गुरु नानक जैसे पीर हों जिसमें,
लैला-मजनू,राँझा-हीर हों जिसमें,
भगत सिंह और शिवाजी जैसे वीर हों जिसमें,
भारत माँ जैसी सुंदर तस्वीर हो जिसमें,

मैं चाहूँ कुछ ऐसा लिखना!

बिन बोले जो सब कुछ बोले,
और महके चन्दन जैसी,
अक्षर-अक्षर रस प्यार भरा हो,
बस मेरी कविता हो कुछ ऐसी,

मैं चाहूँ कुछ ऐसा लिखना!


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें