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01.29.2008
 

वंशदीप
सुरेश कुमार गोयल


सालों के बाद मैं भारत जा रही थी। पिछली बार जब गयी थी तो पूरे दो महीने रही थी। वे दो महीने पता ही नहीं चले। मम्मी और डैडी मेरी शादी कराने के लिये मुझे भारत लाये थे। डैडी काफी अरसे से मेरी शादी के लिए कोशिश कर रहे थे। उस समय मम्मी और डैडी को बस मेरी शादी की ही समस्या थी। वैसे वे दोनों ही काफी आधुनिक विचारों के थे परन्तु शादी के मामले में पुराने ही ख़्यालों के थे। कैनेडा में तीस साल रहने के बाद भी वे यही चाहते थे कि मेरी शादी किसी हिन्दुस्तानी लड़के से ही हो। उन्होंने हमेशा ही मुझे अच्छे प्राईवेट स्कूलों में भेजा। अकेली संतान होने के कारण उनकी सारी सोच मेरे ही इर्द-गिर्द घूमती थी। उनकी सारी कामनायें मेरे से ही शुरू होती थीं और मेरे पर ही समाप्त हो जाती थीं।

हम उम्र की मेरी सहेलियाँ अजब लड़कों की बातें करती थीं तब मैं चुपचाप सुनती रहती थी। उनके माता-पिता उनको कितनी आज़ादी देते थे और कहाँ मेरे मम्मी डैडी। किसी लड़के के साथ डेट पर जाना तो दूर की बात थी, घर में कभी किसी लड़के को चाय पर बुलाने की भी इजाज़त नहीं थी। शायद भारत में रहने वाले माँ-बाप भी अपनी लड़कियों को ज़्यादा आज़ादी देते होंगे? मम्मी और डैडी की विचारधारा तीस साल पुरानी ही थी; जब वे भारत से पहली बार आए थे। उनके लिये शायद समय थम गया था। भारतीय सभ्यता और संस्कारों में कितनी तेज़ी से परिवर्तन हो रहा है; वे शायद अनजान ही थे।

मेरी शादी कराने में ताऊजी का काफी हाथ था। ताऊजी और ताईजी की अपनी कोई संतान तो थी नहीं, इसलिये वे मेरे पर ही अपना प्यार उड़ेलते थे। ताईजी के दूर के रिश्ते में ही मेरी शादी हुई थी। लड़का इंजीनियर था। कानपुर में नौकरी करता था। उसको भी विदेश में बसने की तीव्र इच्छा थी। इसलिये कोई दिक्कत नहीं हुई। शादी में उन्होंने दहेज कोई माँग नहीं की। मम्मी और डैडी को काफी अच्छा लगा कि मेरी ससुराल वाले दहेज के लोभी नहीं थे। शायद मम्मी और डैडी या तो काफी नासमझ थे या नासमझी का अभिनय करते थे। उनके जीवन की सारी जमा-पूँजी मेरी ही तो होनी थी कभी न कभी। दहेज माँग कर मेरी ससुराल वाले अपना ओछापन ही साबित कर देते।

मेरी शादी के कुछ सालों बाद ही ताऊजी और ताईजी चल बसे। मैं तो उस समय नहीं आ पाई। मम्मी और डैडी ही आये। ताऊजी अपनी सारी ज़मीन-जायदाद एक धार्मिक संस्था को दान कर गए थे। शायद डैडी को अच्छा नहीं लगा। ताऊजी की मौत के बाद डैडी फिर कभी भारत नहीं गये।

मम्मी और डैडी ने कभी मेरे सामने तो नहीं परन्तु अपने एकान्त क्षणों में हमेशा ही बेटे की कमी को महसूस किया था। जब भी कभी किसी के यहाँ बेटा होता था तो मम्मी और डैडी को खुशी होने की बजाय, रंज ही होता था। वे दोनों ही काफी गम्भीर हो जाते थे, किसी के बेटे होने की खबर सुनकर। शायद हमारे खानदान के ही ऊपर किसी की बद्‌दुआ लग गयी थी। बाबाजी के दो बेटे हुए। ताऊजी के यहाँ संतान हुई ही नहीं और मम्मी डैडी के पास केवल मैं ही थी। बाबाजी का वंश चलाने वाला अब कोई नहीं था। आजकल की विचारधारा में बेटे बेटी में चाहे कोई फ़र्क नहीं माना जाता परन्तु वंश को आगे बढ़ाने के मामले में बेटियाँ बेटों से मात खा जाती हैं।

मेरी कान्फ्रेंस देहली में ही थी। हमारे दूर के रिश्तेदार चाँदनी चौंक में रहते थे परन्तु मेरी कोई इच्छा उनके यहाँ रहने की नहीं थी। दिल्ली की आई.आई.टी. में मेरी एक जान-पहचान की प्रोफेसर थी। जोया सेन मेरी सीनियर थी यूनिवर्सिटी में। मैंने जब अपनी पी.एच.डी शुरू की थी, उसके चार-पाँच महीने बाद ही उन्होंने अपनी पी.एच.डी. खत्म कर ली थी। वे उस समय अपनी थीसिस लिखने में व्यस्त थी और मैं पी.एच.डी. के लिये कोर्स-वर्क कर रही थी। कभी-कभार ही आमना-सामना होता था। मुझे काफी गंभीर स्वभाव की लगती थी इसलिये मेरी उनसे बात करने की भी हिम्मत नहीं होती थी।

अचानक एक दिन हमारे विभाग के नोटिस बोर्ड पर उनकी थीसिस डिफ़ेन्स का नोटिस लगा था। हम विद्यार्थियों को भी थीसिस डिफ़ेन्स पर आने की अनुमति थी। मैं जोया जी की थीसिस डिफ़ेन्स पर गई थी। शायद मैं ही अकेली विद्यार्थी थी उस कमरे में उन पाँच थीसिस इग्ज़ैमिनर्ज़ के साथ। शुक्रवार के दोपहर के दो बजे कौन आयेगा थीसिस डिफ़ेन्स में अपना वक़्तग बरबाद करने?

जोया जी की थीसिस डिफ़ेन्स में तीन घंटे लग गये। पहले तो उन्होंने अपनी थीसिस के विषय पर लेक्चर दिया। उसके उपरान्त उन पाँच प्रोफेसरों ने उनसे अनगिनत प्रश्न किय। सवाल जवाब के लम्बे सिलसिले के पश्चात हम कमरे के बाहर आ गये। कमरे के अन्दर वे पाँच प्रोफेसर विचार विमर्श करते रहे, इस विषय में कि जोया जी को पी.एच.डी. मिलनी चाहिए कि नहीं। शाम के पाँच बज गये थे, घर पर मम्मी अवश्य ही मेरा इन्तज़ार कर रही होंगी, इसके बावजूद भी मैं जोया जी के साथ ही कमरे के बाहर खड़ी रही। जोया जी काफी तनाव-ग्रस्त लग रही थीं। उनकी पिछले तीन साल की मेहनत का आज निर्णय होने वाला है। मेरे और उनके बीच कोई बातचीत नहीं हुई, पहले भी वैसे कोई खास मौके पर ही उनके और मेरे बीच चन्द शब्दों का ही आदान-प्रदान होता था। जोया जी मुझसे उम्र में अवश्य ही आठ, दस साल बड़ी होंगी। मैंने पहली बार नोट किया उन्होंने अँगूठी नहीं पहन रखी थी बाँये हाथ की दूसरी उँगली में। कम से कम पैंतीस वर्ष की तो अवश्य होंगी। मैंने मन ही मन सोचा। तभी कमरे का दरवाज़ा खुला। जोया जी को अन्दर बुलाया गया। मैं कमरे के बाहर ही खड़ी थी। कुछ ही देर बाद जोया जी मुस्कुराती हुई कमरे से बाहर निकली। उनको पी.एच.डी. की डिग्रि के लिये स्वीकार कर लिया गया था। जोया जी ने मुझसे हाथ मिला और मेरा शुक्रिया अदा किया।

जोया जी की पी.एच.डी. की थीसिस की डिफ़ेन्स पर एक बाहर के प्रोफेसर भी आए थे। जोया जी और उनकी इग्ज़ामिनिंग कमेटी के प्रोफेसर शाम के खाने पर रेस्टोरंट जा रहे थे जोया जी की सफलता का जश्न मनाने। जोय जी ने मुझसे मेरे घर का फोन नंबर ले लिया। मुझे घर पहुँचते पहुँचते शाम के सात बज गए। मम्मी और डैडी कबसे मेरा खाने का इन्तज़ार कर रहे थे। हमारे घर में शाम का खाना हम सब लोग साथ ही खाते हैं। मैं चाहे कहीं पर भी हूँ शाम के खाने के समय पर घर पहुँच ही जाती थी।

दो दिन के बाद घर पर ही जोया जी का फोन आया। जोया जी पन्द्रह जुलाई को भारत वापिस जा रहीं थी। परन्तु उनके सामने एक सम्स्या आ गयी थी। उनके अपार्टमेंट की लीज़ तीस जून को खत्म हो रही थी। उस अपार्टमेंट में नया किरायेदार एक जुलाई को आ रहा था। इसलिये उनको अपार्टमेंट तीस जून को खाली करना पड़ रहा था। तीस जून से पन्द्रह जुलाई तक कहाँ रहें यह समस्या थी। होटल में रहना काफी महंगा पड़ता।  शहर से दूर किसी साधारण मोटल में भी पचास-साठ डालर हर दिन के लग जाते। मैंने ही जोया जी कि सुझाया कि क्यों न हमारे घर पर ही वे दो हफ़्ते के लिये आ जायें। अन्धा क्या चाहे; बस दो आँखें। जोया जी तुरन्त हमारे यहाँ आने के लिये मान गयीं। उनके अपार्टमेंट में बस थोड़ा सा ही फर्नीचर था जो उन्होंने एक विद्यार्थी को ही बेच दिया। काफी सारी किताबें उन्होंने पार्सल कर ही दी थीं। बस दो बड़ी अटैचियों में उनका सारा सामान था। मैं ही उनको कार से अपने घर ले आयी। जोया जी के आने से मम्मी डैडी भी खुश थ। जोया जी मेरे से काफी सीनियर थी हीं, उनके साथ रहने से मुझे कुछ अक्ल ही आयेगी। पी.एच.डी. कैसे की जाय? कुछ शायद ट्रिक्स ही पता चला जायें रिसर्च करने की।

दो हफ़्ते कैसे बीत गये पता भी नहीं चला। सारा दिन तो जोया जी यूनिवर्सिटी में ही रहती थीं। शाम को ही खाने पर उनसे मुलाकात होती थी, मम्मी को फुलका बनाने में जोया जी मदद करती थी और खाने के पश्चात मम्मी के लाख मना करने पर भी जोया जी खाने की प्लेटें धोने के लिये जुट जाती थीं। खाने के बाद जोया जी कुछ देर टी.वी. देखकर गेस्ट रूम में चली जाती थीं। वे अपनी पी.एच.डी. की थीसिस में से किसी जरनल के लिये शोध पत्र लिख रही थीं अपने थीसिस सुपरवाईज़र के साथ। भारत जाने से पहले शोध पत्र का पहला ड्राफ़्ट तैयार हो जाये, यही उनका लक्ष्य था।

मम्मी जोया जी से बहुत प्रभावित थी। कितनी पढ़ी लिखी है परन्तु जरा भी अकड़ या दिखावा और शान रत्ती भर नहीं। डैडी के सम्पर्क में शायद ही कभी कोई पी.एच.डी. महिला आई होगी। उनका तो यही ख़्वाब था कि मैं ज़िन्दगी में जोया जी जैसी बन जाऊँ।

हमारे घर में बेडरूम ऊपर की मंज़िल पर हैं। दूसरी मंज़िल पर तीन कमरे हैं। मास्टर बेडरूम तो मम्मी डैडी का है, दूसरा कमरा मेरा है और तीसरा बेडरूम हम गेस्टरूम की तरह इस्तेमाल करते हैं। तीनों ही कमरों में अटैच्ड बाथरूम हैं जिसके कारण काफी सुविधा रहतीहै। नीचए की मंज़िल पर रसोई, ड्राईंगरूम, खाने का कमरा और फ़ेमिली रूम है, जिसमें टी.वी. रखा है। डैडी को हमेशा से ही जल्दी सोने की आदत है। वे दस बजते ही ऊपर सोने चले जाते हैं। मैं और मम्मी तो कभी बारह से पहले सोने जाते ही नहीं। जोया जी को हवाई अड्डे पर छोड़ने मैं ही गयी। दिल्ली पहुँच कर जोया जी ने एक धन्यवाद का पत्र भेजा था। फिर धीरे धीरे समय बीतता गया। मैं अपने काम और रिसर्च में व्यस्त हो गयी। जोया जी आई.आई.टी. में भी काफी व्यस्त हो गयी होंगी क्योंकि उनके पत्र फिर नहीं आये। उनके कभी कभी शोध पत्र रिसर्च की पत्रिकाओं में पढ़ने को मिल जाते थे।

पिछले साल एक शोध पत्र में जोया जी का इ-मेल का पता भी था। मैंने उनको इ-मेल भेजी जिसका उत्तर उन्होंने दे दिया। वे अब अपने विभाग में असिटेंट प्रोफेसर हो गयी थीं। मैंने भि अपनी पी.एच.डी. खत्म कर ली थी। मान्ट्रियाल्में कॉनकॉर्डिया यूनिवर्सिटी में असिटेंट प्रोफेसर के पद पर काम कर रही थी। हमारे विभाग में साल में एक बार कहीं भी किसी भी कान्प्रेंस में शोध पढ़ने के लिए पूरा खर्चा मिलता है, इसलिये सोचा क्यों ना दिल्ली की कान्फ्रेंस में शोध पत्र पढ़ कर बाद में भारत भ्रमण किया जाय! मेरी इच्छा दक्षिण घूमने की थी। सौभाग्य से कान्फ्रेंस आई.आई.टी. में ही थी और आई.आई.टी. के केम्पस में ही जोया जी रहती थीं इसलिये उनके साथ रहने में ही बहुत सुविधा थी। जोया जी से जब मैंने उनके घर चार दिन ठहरने की बात की तो वे तुरन्त ही मान गयीं। पिछले दो महीने में मैंने न जाने कितने इ-मेल संदेश जोया जी के पास भेजे थे और हर बार इ-मेल का तुरन्त ही उत्तर दिया था।

एअर कैनेडा की सीधी उड़ान टोरोंटो से दिल्ली की थी। शाम को आठ बजे दिल्ली पहुँच रही थी। जोया जी मुझे लेने के लिये कार से आयी थीं हवाई अड्डे पर। कस्टम से निकलते निकलते दस बज गये। जोया जी मेरी प्रतीक्षा कर रही थीं। जोया जी से सालों बाद मिल रही थी। कोई खास परिवर्तन नहीं आया था उनमें। मैंने कनखियों से देखा उनके बायें हाथ की दूसरी उंगली में अभी भी कोई अँगूठी नहीं थी। जोया जी कार ड्राईव कर रहीं थी, इसलिये चुप थी या फिर उनकी कम बोलने की पुरानी आदत अभी तक नहीं बदली थी, यही सोच रही थी मैं। आई.आई.टी. के केम्पस में पहुँचते पहुँचते ग्यारह बज गये। जोया जी ने ज़िद्द करके मुझे खाना खिला दिया। मुझे नींद आ रही थी। पिछले चौबीस घंटों में मैं मुश्किल से चार घंटे ही सोयी होऊँगी क्योंकि मुझे हवाई उड़ान में नींद नहीं आती है।

उस रात मुझे नींद बहुत ही अच्छी आयी। कान्फ्रेंस का उद्‌घाटन नौ बजे था। मैं तो नौ बजे ही सोकर उठी थी। घर पर नौकरानी ही थी। जोया जी आई.आई.टी. काम पर गयी थीं। नौकरानी मेरे लिये चाय बना कर ले आई थी।

मैडम तो बारह बजे आयेंगी। आप नाश्ते पर जो भी खाना चाहें मैं बना दूँगी नौकरानी ने कहा।

चाय के बजाय मेरे लिये कॉफ़ी बना सकती हो तो अच्छा होगा। मैं नाश्ता नहीं करती। बस एक कप जाने से पहले कॉफ़ी पीयूँगी।

मेरा उत्तर सुनकर नौकरानी चौंक गयी, “आपको तो डायटिंग करने की कोई ज़रूरत नहीं है मेमसाहब। मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किये वगैर ही नौकरानी कॉफ़ी बनाने चली गयी। मैं बेडरूम से ड्राईंग रूम में आ गयी। ड्राईंग रूम में एक टी.वी. था। सोफा-सेट था और दीवार पर कुछ फोटोग्राफ़ थे। उन फोटोग्राफ़ों में एक फोटो जोया जी का हम तीनों के साथ का भी था। जोया जी कुछ फोटोग्राफ़ में एक बच्चे को गोद में लिये थी। उस बच्चे के कुछ फोटो भी थे। शायद जोया जी का भतीजा या भान्जा होगा। जोया जी की नौकरानी मेरे लिये कॉफ़ी बना कर ले आयी।

यह बच्चा कौन है?” मैंने उस बच्चे के फोटो की ओर इशारा करके पूछा।

यह अपना राहुल बाबा है। मेम साहब का बेटा। नौकरानी ने कहा। उसका उत्तर सुनकर मैं चौंक गयी। राहुल जोया जी का बेटा है? कुछ ठीक से समझ में नहीं आया।

राहुल के डैडी यहाँ नहीं रहते क्या?” मेरा सवाल काफी अटपटा लगा नौकरानी को। उसने कोई उत्तर नहीं दिया। शायद उसकी ख़ामोशी ने ही मुझको झकझोर दिया। शादी के दायरे के बाहर रहकर भी माँ बना जा सकता है। कैनेडा में तो ऐसा होता ही रहता है परन्तु भारत में ऐसा हो सकता है इसकी शायद मैंने कभी कल्पना नहीं की थी। मैं सोफे पर बैठकर कॉफ़ी पीती रही। राहुल की फोटो देखने की मेरी हिम्मत नहीं थी। अगर मुझे मालूम होता कि जोया जी के एक बेटा भी है तो उसके लिये कुछ ना कुछ अवश्य ही उपहार लाती मान्ट्रियाल से। खैर यहाँ से खरीद कर दे दूँगी। मैंने सोचा।

बारह बज गये थे। शायद जोया जी आती होंगी। मैंने सोचा इतनी दूर से आयी हूँ। कम से कम एक चक्कर तो कान्फ्रेंस का लगा ही आऊँ। मेरा शोधपत्र तो तीसरे दिन था इसलिए मुझे कोई खास जल्दी नहीं थी। सोच रही थी कि शायद राहुल को लेकर जोया जी को मुझसे कोई संकोच भी हो। यह बात भी कुछ नाज़ुक सी थी। मैं कान्फ्रेंस का चक्कर लगाकर डेढ़ बजे आ गयी। जोया जी मेरी खाने पर प्रतीक्षा कर रही थी।

कैसा लगा आई.आई.टी. का केम्पस?” जोया जी ने पूछा, “तुम अभी राहुल से नहीं मिली भी नहीं। वह स्कूल से आया था, अपनी आँटी से मिलने को काफी उतावला था।

जोया जी मुझे आपसे बहुत शिकायत है। आपने राहुल के बारे में लिखा ही नहीं। पता होता तो मान्ट्रियाल से ही उसके लिये उपहार लाती,” मैंने कहा, “खैर मैं अपने शोध-पत्र के बाद कनॉटप्लेस जाकर कुछ लाये वगैर नहीं रहने वाली!

नौकरानी ने खाना लगा दिया। हम खाना खा रहे थे।

अगर अगले हफ्ते तक रह सको तो अच्छा होगा। दस अप्रेल को राहुल का बर्थ-डे है। जोया जी ने कहा।

मेरे लिए तब तक रुकना तो मुश्किल है चेन्नई की उड़ान पाँच अप्रेल की है। मेरा सारा प्रोग्राम गड़बड़ा जाएगा। मैंने अपनी विवशता ज़ाहिर की। हम दोनों के बीच फिर कोई बात-चीत नहीं हुई। राहुल का परिचय इतनी अच्छी तरह से स्वाभाविक तौर से हो जायेगा यह सोचकर मन को तसल्ली हुई। शायद जोया जी ने भी चैन की साँस ली होगी कि राहुल के बारे में उनको कोई विसेष सफाई नहीं देनी पड़ी। वैसे भी वे अब तक तो राहुल को लेकर उठे हुए अटपटे, तीखे सवालों का उत्तर देने में माहिर हो गयी होंगी।

खाने के बाद मैं और जोया जी साथ-साथ ही आई.आई.टी. के केम्पस में चली गयीं। जोया जी ने मेरा परिचय विभाग के अन्य सदस्यों से कराया। वहाँ पर कुछ ऐसे लोग भी थे जिनके शोध-पत्र मैं अपनी पी.एच.डी. की पढ़ाई के समय काफी गहराई से पढ़ चुकी थी। ऐसे दिग्गज विद्वानों से मुलाकात होगी, यह तो मेरे लिये भारत-भ्रमण का एक बोनस ही था।

शाम को कान्फ्रेंस वालों ने एक डिनर का आयोजन कर रखा था परन्तु मुझे नींद आ रही थी। जोया जी ने भी ज़िद की कि शाम का खाना घर पर ही खाया जाय। वे घर लौटने के लिये शायद उतावली थीं क्योंकि घड़ी को बार-बार देख रही थीं। राहुल भी कभी का स्कूल से वापिस आ गया होगा। दिल के किसी कोने में मुझे भी राहुल को देखने की काफी तीव्र इच्छा थी।

राहुल अपने कमरे में बैठा अपना होमवर्क कर रहा था। जोया जी की नौकरानी मेरे लिए कॉफ़ी और जोया जी के लिए चाय बना कर ले आयी। टी.वी. पर खबरें आ रही थीं। मुझे तो भारत की खबरों में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। तभी राहुल ड्राईंग रूम में आया। हलो आँटी, नमस्ते! छोटे से राहुल ने दोनों हाथ जोड़ कर नमस्ते की।

यहाँ पर पैदा हुए बच्चों में कितनी तहज़ीब होती है। मैंने मन ही मन सोचा। मैंने उठकर राहुल को चूम लिया। राहुल बड़ा ही प्यारा बच्चा था ठीक वैसा ही जैसा की फोटोग्राफ़ में लगता है। काले घुंघराले बाल थे उसके, बड़ी-बड़ी आँखें। उसने अपना प्यारा सा छोटा सा हाथ बढ़ाया मुझसे मिलाने को। उसके नन्हे से हाथ को अपने हाथ में लेकर मुझे ऐसा लगा जैसे की बिजली के नंगे तार को हाथ में ले लिया हो। सारे बदन में जैसे करेंट दौड़ गया।

राहुल के हाथ बिल्कुल मेरे हाथों की तरह थे। मोटी मोटी उंगलियाँ, छोटी सी हथेली से जुड़ी हुईं। उस समय राहुल ने मोजे भी नहीं पहन रखे थे। उसके पाँवों के पंजे भी मुझे अपने जैसे ही लगे। एक नज़र मैंने जोया के हाथों पर भी डाली। आर्टिस्टों की तरह के हाथ थे उसके, पतली-पतली उंगलियाँ। मेरे चेहरे के ख्यालों को उतार-चढ़ाव शायद जोया से छिपे नहीं रह सके। कोई बच्ची तो नहीं थी वो।

हमेशा से ही मम्मी डैडी के हाथ पाँवों को लेकर उनका मज़ाक उड़ाया करती थी। आपके हाथ-पाँव भगवान ने शायद बनाये नहीं बल्कि गोबर के उपलों की तरह थाप दिये लगते हैं। मम्मी की इस बात का ध्यान आते ही मेरे दिमाग में एक विचार कौंध गया कि हो ना हो डैडी के हाथ-पाँवों का ताल्लुक राहुल के हाथ-पाँवों से अवश्य है। जोया हमारे यहाँ बरसों पहले तीस जून से लेकर पन्द्रह जुलाई तक रही थी और राहुल का जन्म दस अप्रैल का है तो इसका पूरा चांस है कि राहुल डैडी का ही बेटा है। अगर मेरी याददाश्त कम नहीं हुई है तो उन दिनों डैडी सिर-दर्द का बहाना करके शाम होते ही खाना खाकर बेडरूम में ऊपर सोने चले जाते थे। जोया भी तो खाने के बाद अपने शोध-पत्र पर काम करने ऊपर बेडरूम में चलई जाती थी।

जबसे होश संभाला था मैंने अपने मन में डैडी को ऊँचे आदर्शों के सिंहासन पर ही बैठा पाया था। डैडी के वंश दीप को जोया जी के घर देखकर डैडी मेरी नज़रों से ऊँचे आदर्शों के सिंहासन से गिअर कर ज़मीन पर धूल चाट रहे थे।


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