अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
02.23.2008
 

अमरीका, खुली हवा में
सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’


कोलम्बस की भूल सही, पर सत्य यही
गये खोजने ऋषि- देश भारत भूमि।
कितनों ने खोजा नहीं मिला जितना चाहा,
स्कन्ध देश से आया पहले लाइफ़ एरिकसेन।
प्रवासी पंक्षियों ने बिखराये बीज यहाँ।
मानसून ने दिया उसे फिर नवजीवन।

अमरीका! तुम देश नहीं महादीप हो।
उदार तुम्हारा सीना सागर सा गहरा
जहाँ रात दिन कुबेर देते हैं पहरा।
कभी पूछने आयेगा ना क्षेम तुम्हारा,
यहाँ सदा बहती रहती अमृत की धारा।
दिनरात जहाँ चलते रहते हैं समय के पहिये?
दिन में दूध पिलाती है जो बच्चों को,
रातों को बन रात की रानी देती पहरे।

न्यूयार्क के वक्षस्थल पर
पेन्सस्टेशन के निकट बसा फैशन संस्थान,
जहाँ निवस्त्र सुन्दरियों के निकले जुलूस,
मध्य रात्रि को जैसे तारे भू पर टपक पड़े हों।
हाथों में खोये के लड्डू सा कोमल
मन में कौतूहल के रसगुल्ले फूट रहे हों।


वहाँ हुआ था आठवाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन,
सवा करोड़ भारतवासी की फिल्मी भाषा,
जिन्हें बोलने से कतराते है नेता-अफ़सर!
उस हिन्दी का जयगान करेगें उनके बच्चे!
संयुक्त राष्ट्र संघ के मन्त्री मून बोले थे हिन्दी,
भारत के राष्ट्रपति हिन्दी क्यों बोले,
क्या शर्म न आयेगी?
जो हिन्दीका विरोध कर रहे दक्षिणवासी
वही पढ़ाते फिरते हिन्दी मक्का काशी?
हिन्दी दिवस स्वीकार किया अमरीका ने,
हे धन्य धर्म के रक्षक भारतीय प्रवासी।
सदा रहे आधार उसी का, मानवता जिसकी साक्षी?
वहाँ देवेन्द्र और शेर बहादुर के आँगन में
तुलसी चौरे पर दीप जलाये जाते
शरद नार्वे में हिन्दी का ध्वज फहराते।
संस्कृति की मानवता के संग माँ भारती,
विदेशों में हमको दिशा दिखाती है।
माँ का स्मरण आते ही
दुख के पहाड़ ढह जाते हैं।
जैसे माँ सारे दुख बाँट रही हो
सपनो में भी कुशल क्षेम पूछ रही हो।
आदान-प्रदान संस्कृति का वैश्विकरण हुआ,
यहाँ तुलसी सूर मीरा की वाणी रस घोल रही,
यहाँ वैदिक योग चलाते स्वास्थ्य आन्दोलन
रामदेव जी स्वस्थ रहने का योग सिखाते हैं।
वहाँ नगर में बढ़े सदा संगीत(डिस्को) सिंघासन
स्वस्थ तन मन ही देंगे हमको संजीवन।

यदि नैतिक आदर्शों का गला घुटे
बेटी, बहुओं की लज्जा घर की लाज धरे।
बंधाकर रक्षा धागे, मनाते रक्षाबंधन,
राष्ट्र पर्व सा सदा मनाते होली-दीवाली।
डांडिया में झूमती मस्त गुजराती छोरियाँ!
गिद्दा करती मतवाली पंजाबी गोरियाँ!
तीज-लोरी में सब मिल नाचे गायें,
हर प्रदेश के वासी उत्सव साथ मनाये।
न्यूजर्सी में हिन्दी महोत्सव मनाये जाते,
कनाडा में गुरुपर्व मनाये जाते हैं।
वैंकूवर बैसाखी की धूमधाम,
टोरन्टो में हर शाम दीवाली है।
हम घर में डिस्को, बार सजाते हैं?
हम भारत में वैलेनटाइन दिवस मनाते हैं।।

सतीश प्रकाश वैदिक विद्यालय खोल रहे
सूरीनाम-अमरीका-भारत के वैदिक प्रहरी
अमरीकी धरती पर मन्त्रोच्चारण बोल रहे,
ये वैदिक श्रद्धा के सुमन बाँट रहे,
हवनों में विश्व शान्ति की आहुति डाल रहे।
ॐ, ॐ बस मन्त्र नहीं जीवन का
यह ॐ सिखाता विवेक करे रक्षा कुल का।
हवनकुंड से वायु में चन्दन महक रही है।
कितने ही मन के हृदय पसीजा करते
हम तो ठहरे तूफानों के पहले शान्ति,
हम ही हैं जो धरती को माता कहते है।
ऋषि सन्तानें आदर्श हमारी नैतिकता
भूखे रहकर मेहमानों का आदर करते है।

बटुक हमारे दिनकर सा गरजें
सुधा ढींगरा काव्य सुधा बरसाती हैं।
उषादेवी, सुषम, पूर्णिमा, अंजना
बनी स्वयं कहानी की झंकारें।
कहीं टकराती है संस्कृति तलवारें,
भारत में दादी कथरी में टाँक रही है तारे।
आभा, करुणा, इला अनजान, श्याम अनीता होगी,
चाँद अब कभी न पागल होगा।
हम सब पात्रों का नाटक होगा पूरा,
ललित अब मौसम की राह न देखो
जीवन की दौड़, तुम्हारे पीछे,
कस्तूरी को कहीं और न ढूढो?
पाँवों मे पायल पहने अमरीकी छोरी,
पूर्वा सा बही चली आती है।
छूकर अहसास किया न तुमने?
कैसा कठोर हृदय है तेरा
मनहर अनभूति बना चित अपना
संगीत वही कर दे विवश नृत्य को
छू न सके चाहकर जिसको
नभ के तारे तोड़ोगे कैसे?
फिर आयेगी गोधूली बेला?
पर चाँद हो जायेगा बूढ़ा,
सूरज बाबा की धूप लगेगी धुँधली,
समय ने दिया सुअवसर तुमको
चूम लिया तो निखरेगी फिर
उन पीले हाथों की मेंहदी।

किसी का सुखचैन, किसी का सम्मोहन।
देना है दे दो तुम इतना थाह नहीं है।
लेना चाहो जितना अपने आसमान में,
सौदा नहीं, नहीं है वादा?
निश्छल प्रेम नहीं मिलता जब,
संग छल-छल प्रेम निभाना।

बूढ़े, बीमार एकाकी खिड़की से झाँक रहे
उनके मुंडेर पर कैसे कोई पंछी चहक उठे?
एकान्त टीसते, समय अकेले कहाँ कटे?
वृद्धागृह में -
अपने नाती-पोतों के चित्रों से जी बहलाते।
दूजों के चेहरों की खुशियाँ पढ़ते, आते-जाते।
जिन्हें कोसते रहे कभी वह जीवन में
वही प्रवासी देखभाल कर अपनापन देते।
संयुक्त परिवार को रोग बताने वालों,
वृद्धापन में दुआयें भी तुम ही देते हो!
हालैण्ड के ओरफन अमरीका में हिन्दी के गुरू
तोमियो मिजोकामि जापान में रामायण पाठ पढ़ाते हैं।
नार्वे में शरद आलोक, रूथ स्मिथ-संगीता-मीना
हिन्दी के पाठ नये पढ़ाते।
पोलैण्ड, रूस में हिन्दी भजन सिखाते है।
श्याम मनोहर इटली के ऋषि,
तेजेन्द्र –रविशर्मा ब्रिटेन में कथा नई सुनाते हैं।
नार्वे-स्वीडेन में करता हिन्दी की सेवा कोई,
पर ‘पुरस्कार’ बाप-बेटे दो बैलों सा ले जाते हैं।
अब बैले और सालसा से झूम उठेगा भारत,
जी टीवी करोडपतियों के समाचार दोहराता है।
कभी - कभी तो रोना-हँसना भी आया,
कि हम नकल करके केवल नकली कहलायेंगे!
यदि अपनी संस्कृति को स्वयं नहीं अपनाया,
अपनी संतानों से हम क्या आस लगायेंगे?


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें