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स्मृतियों के वातायन से
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| (साभार- उठो पार्थ! गाँडीव संभालो!) |
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जीवन के सूने क्षण में,
स्मृतियों के दूर क्षितिज पर
जीवन के सूने क्षण में,
जब मौन गगन में शशि हँसता,
मैं विकल सुना करता तट पर,
कितनी मीठी, कितनी स्वप्निल,
इस अर्ध-निशा में, पूनम में,
मानस के दूर क्षितिज पर, तब
स्मृतियों के इस अवगुंठन में
जीवन के सूने क्षण में, |