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05.17.2012


स्मृतियों के वातायन से
(साभार- उठो पार्थ! गाँडीव संभालो!)

जीवन के सूने क्षण में,
प्रिय तेरी याद सताती!
मादक पूनम में भीगी
जब रात रही शरमाती!
धरती में मौन गगन में,
जब वासंती लहराती!

स्मृतियों के दूर क्षितिज पर
प्रिय तुम आकर मंडराते।
इस शुष्क-तप्त उपवन में
कोकिला मत हो गाती।

जीवन के सूने क्षण में,
प्रिय तेरी याद सताती!

जब मौन गगन में शशि हँसता,
ग्रीवा में पूनम-पाश लिए
नन्हीं कलियाँ शरमा जातीं,
अधखुले अधर पर हास लिए!

मैं विकल सुना करता तट पर,
उस नन्हीं-सी सरिता का स्वर।
पागल हो जाता हूँ
जलता-सा अभिलाषा लिए।

कितनी मीठी, कितनी स्वप्निल,
हैं ये यादें मदमाती!
जीवन के सूने क्षण में,
प्रिय तेरी याद सताती!

इस अर्ध-निशा में, पूनम में,
मैं मत्त विकल होकर गाता!
मैं मौन सरित के तीरों पर
जब स्मृतियों में खो जाता।

मानस के दूर क्षितिज पर, तब
तुम विहंस-विहंस क्यों उठते हो
मैं विकल हुआ जाता हिय में,
उफ़! मादक दर्द उभर आता।

स्मृतियों के इस अवगुंठन में
तेरी वह स्मिति अवचेतन,
मन के सूखे पल्लव दल को
ज्यों मलय पवन दुलराती।

जीवन के सूने क्षण में,
प्रिय तेरी याद सताती!


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