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04.18.2014


इस पाप-पुण्य के मंथन में

इसा पाप-पुण्य के मंथन में,
मेरे मन मुक्त विहग बन रे।

पाटल के पल्लव-सा जीवन
शबनम भी जिसे लहरा जाती,
हर मलयानिल सहला जाता,
हर चंद्र-किरण दुलरा जाती।

घटती जाती डोर साँस की,
रिक्त हुआ जाता जीवन घट।
श्याम बिना सब सूना राधा,
तेरा आंगन, तेरा पनघट।

जीवन तो नाटक है केवल
सुख-दुख का, हँसने-रोने का।
सूत्रधार बस वही श्याम है,
इस जीवन के मृगछौने का।

इस विषाद, इस मृषा हर्ष के
शिखरों से ऊपर उठ रे।
इस पाप पुण्य के मंथन में,
मेरे मन मुक्त विहग बन रे।

कुछ अमृत-सा है अधरों में,
मदिरा-सी कुछ आलिंगन में।
यौवन में सीता का आंचल,
हर राम ढूँढते बन बन में।

पर जीवन करवट लेता है,
रह जाती राम की इच्छा भी।
हर प्रिया को देनी पड़ती है,
जीवन की अग्नि-परीक्षा भी।

जीवन के इस उद्वेलन से,
अपना कैसा अपनापन रे?
इस पाप पुण्य के मंथन में,
मेरे मन मुक्त विहग बन रे।


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