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05.17.2012


गीत तो हमने लिखे हैं हाशिये पर ज़िन्दगी के

तुम कहो कैसे भला ये गीत लायक हों तुम्हारे
वे तो माटी से सने हैं, घर-गृहस्थी की जमीं के।
ज़िन्दगी के पृष्ठ तो सब स्वेद-संघर्षों भरे हैं,
गीत तो हमने लिखे हैं, हाशिये पर ज़िन्दगी के।

कुछ हिमाला की जमीं के, चन्द आँखों की नमी के।
दर्द के, उल्लास के कुछ, हर कशिश की आदमी के।
गीत तो हमने लिखे हैं, हाशिये पर ज़िन्दगी के।

चूम कर तेरी लटों को आ रहीं पुरवाईयाँ जो
कसमासती या बहारों में युवा अंगड़ाइयाँ हों ।
हो सुबह की धूप या लहरों पे लेटी चाँदनी हो,
निविड़ तम में टिमटिमाती, या अकेली रोशनी हो।

मेरे छन्दों में समाहित रंग सारे ज़िन्दगी के,
कुछ अकेली रोशनी के, कुछ नशीली चाँदनी के
गीत तो हमने लिखे हैं, हाशिये पर ज़िन्दगी के।


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