अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
04.18.2014


चलो, चलें अब शाम हो गई

चलो, चलें अब शाम हो गई।
जीवन के पत्थर पर मैंन, जिस तूली से चित्र उकेरे,
कुछ आँसू से, मुस्कानों से जिन पन्नों पर रंग बिखेरे।
सुनता हूँ वह पृष्ठ खॊ गया,
वह तूली निलाम हो गई।
चलो, चलें अब शाम हो गई।

जिन कूचों पर छिपकर, हमने पहली प्रणय कथा लिखी थी,
जिन लड़कों के साथा टाट पर हमने रामायण सीखी थी।
गुल्ली-डंडा, धमाचौकड़ी में भी राम नहीं भूलें हम,
क्योंकि गली के हर पत्थर पर, ईश्वर की मूर्ति रखी थी।
सुनता हूँ वे कूछे ढह गये,
वे लड़के सब नेता बन गये,
वे गलियाँ बदनाम हो गईं।
चलो, चलें अब शाम हो गई।

जिन साँसों के बल पर हमने, कभी बजाई रण्भेरी थी,
जिनमें भर कर प्यास रास की, राधा को बंशी टेरी थी।
जिनमें थी भंगिमा गीत की, ह्स्व दीर्घ थे उठते-गिरते।
लोच भरी सरगम बन जातीं, जिनसे कवितायें मेरी थीं।
वही अनवरत चलने वाली
साँसें पूर्ण विराम हो गईं।
चलो, चलें अब शाम हो गई।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें