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04.18.2014


अमीरों के कपड़े

हम अमीरों के कपड़े हैं...।
हम तालाब के पत्थरों पर या
आँगन की ईंटों पर नहीं,
’वासर’ में धुलते हैं।
आँगन की तुलसी की महक
हमारे तंतुओं से समाप्त हो चुकी है।
हमें अब लज्जानत गृह-लक्ष्मी की
रंग-बिरंगी चुड़ियों की खनक नहीं सुनाई देती।
वे हमें अब अपने हाथों से निचोड़कर नहीं धोती।
बीती रात के प्रेमालिंगन को याद कर,
उसने जो लज्जा से अपना निचला होंठ काट लिया था
और,
नज़रें और नीची झुक गईं थी।
वह हम अब नहीं देख पाते।
या फिर तालाब के पत्थरों पर,
हमें एक लय से फींचते
धोबियों का बिरहा भी अब,
लगता है,
उसी तालाब में डूभ गया है।
और तालाब का वह पत्थर भी
जाने कहाँ खो गया है।
वह पत्थर जो "पत्थर" होकर भी
अपना लगता था....।
याद है?
पिटने के उस दर्द में भी हम
उन्मुक्त हो हवा में लहराते थे।
और तालाब के उस हिलते दर्पण में,
अपने रंग, अपनी खूबसूरती देख पाते थे।
वह तालाब
जो हमारा सारा मल आत्मसात कर भी
सदा निर्मल बना रहता था,
विषपायी शिव की तरह।
अब
हम न सुनते हैं,
चूड़ियों की खनक
या धोबी का बिरहा।
अब तो कान पक चुके,
"वासर" के मोटर की कर्कश घर्घर से।

अब तो हम
सर झुकाये,
गुड़मुड़ाये,
"वासर" की कैद में,
उसकी धूरी के गोलगोल चक्कर काटते हैं,
और इतने सिकुड़ गये हैं कि
एक दूसरे के इनते नज़दीक होते हुए भी,
एक दूसरे का सुख-दुख नहीं बाँटते हैं।

और भई,
सूखने की तो बात ही मत पूछो।
याद है जब हम आँगन की अलगनी पर टंगे,
पुरवैया में रंग-बिरंगी बाहें फैलाते थे,
तो आँगन में जैसे रंगों का इन्द्रधनुष बिखर जाता था।
ननदें हमारी ओट में छिप
भाभियों से ठिठोलियाँ करतीं।
बच्चे उसी ओट में, हमें थोड़ा नीचे खींच,
अलगनी को झुका,
लुकाछिपी खेलते।

या फिर,
ससुर को आँगन में आते देख,
बहू, शरमाकर,
हमरी ओट में छिप
एक तरफ हो जाती थी।
सचमुच समय कितना बदल गया है।

या फिर,
तालाब वाली परती पर,
धोबी जब थक कर हमें पसारने आता,
हम पसर कर भरी दुपहरिया में
सो जाते थे।
हवा धीमे धीमें हमें दुलराती सुखाती रहती
हम परती की हरी दूब पर.
पीली साड़ी, लाल पगड़ी
सुर्ख अंगिया, उजली धोती,
के कई रंगों का कोलाज़ बना,
धरती को, परती को, रंग देते थे।
और बेचारा धोबी,
थककर, सामने की बरगद की जड़ पर बैठ,
अपनी प्रिया की प्रतीक्षा करता,
उसके हाथों की
मकई की रोटियाँ और सरसों का साग खा,
एक लोटा पानी पी, तृप्त हो,
प्रिया के सौन्दर्य को एकटक निहारता रहता।
राधा-कान्या के इस अनूठे प्रणय से,
बरगद कदम्ब बन जाता, और पुष्कर कालिन्दी।
मुझे याद है
धोबी के आग्रह पर,
अपने हाथों एक रोटी खिलाने की बरजोरी के कारण
धोबिन की लज्जानत आँखों की ललाई।
और उसके डरे-डरे, प्यार भरे शब्द...
"कोई देख लेगा तो?"
"अरे यहाँ कौन देखेगा?
यहाँ धोतियों, साड़ियों और
इस फुदकती गौरेया के सिवा कौन है?"
और वह शर्म से आँखें गड़ाये,
एक निवाल ले लेती।
हम मूक गवाह हैं, उस राधा-कान्हा के प्रणय के
और हाँ,
वह फुदकती गौरेया।
जो उड़-उड़ कर हमें जगाने की कोशिश करती
और हम जैसे महुआ पीकर पसर कर पड़े रहते।
हाँ हाँ वही गौरेया,
जो फुदक फुदक कर
हमारे टूटे धागों को बटोरती
और फुर्र उड़कर बरगद में छुपकर
उन्हीं टूटे धागों से
अपना घोसला बनाती।
कितना सार्थक था टूटना बिखरना।

मैंने देखे थे, उसके नन्हे चूजे।
विशाल बरगद के उस छोटे नीड़ में,
चुन-मुन चूँ-चूँ करते।
वे भी देखते देखते बड़ हो गये थे
और फिए एक दिन
फुर्र से उड़ गये थे।

आज तो बस शेष है,
"ड्रायर" की गर्म उमस-भरी गैस
जो इस छोटे दायरे में
हमें झुलसा के जल्दी जल्दी सुखाने में लगी है।
अब हमें पुरवैया नहीं दुलराती,
अब हम पसर कर नहीं सो पाते।
अब हमारे धागे चिड़ियों के नीड़ नहीं बनते।
अब तो टूटे धागे
"ड्रायर" की "ट्रैप" में कैच हो
कूड़ों में फेंक दिये जाते हैं।
और बेचारी चिड़िया टुकुर-टुकुर ताकती रह जाती है।

कोई प्रेम-कथा नहीं, कोई घोसला नहीं।
सोने को परती नहीं, उड़ने को आकाश नहीं।
हम अमीरों के कपड़े जो हैं।


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