सुरेन्द्रनाथ तिवारी

कविता
अमीरों के कपड़े
आज जब गूँगा हृदय है, ...
आज फिर ढलने लगी है शाम
आओ, लौट चलें अब घर को
इस पाप-पुण्य के मंथन में
एक गीत लिखने का मन है
एक मीठे गीत-सी तुम
कुछ तो गाओ
गीत क्या मैं गा सकूँगा
गीत ढूँढें उस अधर को...
गीत तो हमने लिखे हैं ...
गीत मैं गढ़ता रहा हूँ
चलो, चलें अब शाम हो गई
वह कविता है
स्वागत है नई सदी का
स्मृतियों के वातायन से
संस्मरण
फुटपाथ और पगडण्डी
संउसे सहरिया रंगऽ से भरी,
बनाम भोजपुरी अंचल की होली
कहानी
उपलब्धियाँ
आलेख