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कुछ तो गाओ
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| (साभार "उठो पार्थ! गांडीव संभालो" काव्य संकलन से) |
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कुछ तो गाओ
गर गीतों में हो लोच न तो तुम
मैं तो कब से छंद रच रहा,
मेरी जड़ता इन अधरों को
कुछ तो गाओ
यह तो तेरा रूप रूपसी!
हर वंशी की लय में बजता,
अपनी इस नीरसा रसा में, |