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ISSN 2292-9754

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10.16.2016


 यथार्थ

खुली हुयी आँखों से
दिखते ये नज़ारे
और उनका प्रवाह
साथ में तुम्हारी मुस्कराहट
ठहर सी गयी हैं पलकें
सोच रहे हैं हम
थोड़ा सा पलकें गिराएँ
पता है और आनंद आएगा
डर है एक पल का
कहीं तुम्हारी मुस्कराहट
खो न जाएँ
वादा करो मुस्कराते रहने का
तो
थोड़ा सा पलकें झपकाऊँ
और और सुंदर नज़ारों की
दुनिया में चलूँ
ज़िंदगी है यार
पाते रहने का एक अवसर
एक बार मिला हुआ है
यक़ीनन


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