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ISSN 2292-9754

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12.18.2018


ये जो ज़िंदगी है

नया कहने से पहले कुछ कही हुई सी
ये जो ज़िंदगी है
आज के आदमी की
कभी भागती हुई
कभी तूफ़ान आने से की पूर्व
की ख़ामोशी की तरह
बिलकुल स्थिर समाधिष्ट
उलझनों की अंधी सुरंग में
भटकती हुई भी
कहीं भावनाओं की लहरों में
बहती हुयी भी
कहीं आस्था और प्रतिबद्धत्ता में
ठहरी हई भी
प्रेम हिंसा शांति अशांति के संगम में
डूबी हुयी भी
ये जो ज़िंदगी है
आज के आदमी की
ज़िंदगी जिसकी एक दुनिया है
एक सिमित परिधि तक
ज़िंदगी जिसका एक सफ़र है
एक सीमित अंत तक
ज़िंदगी गुज़रती है
किलकारी से कयामत तक
अपने अपने अंदाज में
और जब कभी ऐसा हो
ऐसा हो की
ज़िंदगी गुज़र जाये और
कयामत न हो
तो समझो ज़िंदगी पहुँची है
उस मुक़ाम तक
जहाँ कयामत ही ज़िंदगी है
ये जो ज़िंदगी है
आज के आदमी की
उसकी एक दुनिया है।


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