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ISSN 2292-9754

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05.20.2017


शाम जब भी ढलती है

शाम जब भी ढलती है
मैं डूब जाता हूँ अतीत की
गहराईओं में
शांतचित्त हो जाता हूँ मैं
पलकों को बन्द कर
चित्रपट सी तैरने लगती हैं
अतीत की परछाइयाँ
कभी हँसता हँसता कोई
ज़िंदादिल गीत गाता हूँ
कभी तितली सी कोई परी
अपने इंद्रधनुषी पंखों से हवा देती है मुझे

गुदगुदाती कल्पनाओं के ज्वार के बीच
उठती हुयी चुम्बकीय लहरें
समेट लेती हैं मुझे अपनी बाँहो में।

गलियों से चौबारे तक
बदनामी के शोर गुल
फिर भी मस्ती
बेफ़िक्री का आलम
सपाट रस्ते पर फिसलती हुई
प्रेम की गागर
मुस्कराहटें
कहकशें
पिघलती कड़ुआहटें
मौसम का दर्द
ज़िन्दगी की हलचलों में
घुलता विषदन्तों का ज़हर
कभी शरमाते हुए
कोई प्यारा सा गीत गाता हूँ मैं।

माँ की यादें
पत्नी की भीगी हुयी आँखें
प्रेयसी की हिदायतें
मानवीय मूल्यों का बोध
एहसासों की पराकाष्ठा
अजीबो-ग़रीब विसंगतियों का
पर्याय बन जाता हूँ मैं।

कभी एक दुष्चक्र
मुस्करा के मिलनेवालों की इनायतें
खा जाने वाली लाल लाल आँखें
ख़ुदा सा दिखने वालों की काली करतूत
आडम्बर भरी जीवन शैली
रिश्तों की वास्तविकता
दोस्तों के गुलदस्ते
तमाम मानसिक परिदृश्यों
की उलझनों में उलझ जाता हूँ मैं

शाम जब ढलती है
अतीत की गहराइयों में डूबा हुआ
मेरा मन
एक अदद सपना देखता है


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