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ISSN 2292-9754

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05.20.2017


ख़ामोशी बोलती है

कभी-कभी घनघोर काली रात भी
प्रेम की तरह बरसती है
और अँधेरे के नन्हे कण भी
चाँदनी की तरह चमकते हैं
हर चीज़ अपनी अपनी जगह
दिखती है जैसे कि होती है
और दिलचस्प ये होता है
वो अपनी बाँहें फैलाये
पुकारती अपने साये में ही
खोये लोगों को।
यक़ीनन जैसे कि ख़ामोशी बोलती है
वो भी चहक उठती है कभी-कभी।


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