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ISSN 2292-9754

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05.09.2016


ख़ामोशी

 ख़ामोशी
जो भी हो
जो भी हो उसका स्वरूप
एक दबाव तो है
उसके ऊपर आवाज़ का
शोर का

जैसे शांति का शोर
ज्ञान का शोर
सभ्यता का शोर
और लोकतान्त्रिक निजाम में
बहस का शोर

अब आवाज
और उसके शोर के नीचे
दबी ख़ामोशी
बोले न बोले तुमसे
सुने न सुने तुम्हारी
देखती तो है हवा में
उड़ती हई आवाज
और उससे
आवाज देने वाले के रिश्ते

यानी तुम्हें
अब बोले भी तो क्या
सिवाय इसके कि
रुको यार
हमारी तरह।


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