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11.15.2008
 

ये आग
सुरेन्द्र कुमार 'अभिन्न'


 आँख भर आँसुओं से नहीं ये आग बुझने वाली
मोम की बनी है ये दुनिया जो जलने वाली

उठे सवालों की गर होती परवाह किसी को
तो बात करता हर शख़्स सँभलने वाली

जल रही किसी की ख़ुशी अरमान किसी के
तेरी सोच, तेरी ख़ुशी से नहीं ये दुनिया चलने वाली

अमन का पंछी उड़ कर कहाँ जाएगा इस से बच के
पर उसके भी जला देगी ये आग दहकने वाली

हमारी ही हवस से निकली चिंगारियों का असर
हम ही न बदले जब तक ये भी न बदलने वाली


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