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08.17.2008
 

मेरा बचपन
सुरेन्द्र कुमार 'अभिन्न'


कोई खिलौना सा टूट गया है मेरा बचपन
टूटे खिलौने सा कहीं छूट गया है मेरा बचपन

कितना खुश था कितना सुख था बचपन की उन बातों में
समय का ज़ालिम चेहरा आकर लूट गया मेरा बचपन

हँसता खिलता सबसे मिलता, एक ज़िद्दी बच्चे जैसा
जाने किस की नज़र लगी और रूठ गया मेरा बचपन

गुल्ली डंडा, गोली कंचा, डोर पतंग सी उमंग लिए
रंग बिरंगे गुब्बारों सा था, क्यूँ फूट गया मेरा बचपन


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