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04.05.2009
 

 हसरत
सूरज तिवारी ’मलय’


बनना चाहता हूँ
मैं भी, बारिश की
छोटी बूँद
ताकि बूझा सकूँ
सूखी हो रही
धरती की प्यास
बुझा सकूँ प्यास
उन किसानों की
जो आज भी आश्रित हैं
बारिश के मेघों पर।।

बूँद बन बरसने की
चाहत है
बंजर मरूभूमि पर भी
ताकि उग आएँ वहाँ भी
छोटे छोटे पौधे
बरसना चाहता हूँ
बूँद बनकर
उन खेतों में
जहाँ किसानों की
गिरती हैं श्रम की बूँदें।

जहाँ से उपजता है
अन्न, न सिर्फ़ अमीरों के लिए
बल्कि भारत के
उन गरीबों के लिए भी
जिनकी भूख मिट जाती है
सिर्फ रोटी और नमक खाकर।।
काश मैं ऐसा कर पाता।।


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