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द्वापर युग में
धरा धाम पर
धर्म की रक्षा को
अवतरित हुए
कृष्ण नर रूप में
जन्म के छठवें दिन से
नष्ट किया उन्होनें
पूतना राक्षसी को
बाद में आते गए
अधासुर, बकासुर,
धेनुकासुर आदि
एक एक कर
सब समाते गए
कृष्ण में।
द्वारका के राजा ने
स्वयं स्वीकार किया
सारथी बनना पार्थ का
कुरूक्षेत्र के मैदान में
दिया उपदेश गीता का
कर्तव्य निभाने की प्रेरणा दी
मोहग्रस्त अर्जुन को
दिया सांख्ययोग, कर्मयोग,
भक्तियोग का सुंदर उपदेश
धन्य हुआ भारत देश।।
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