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| 11.10.2007 |
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क्या आप
ग्रेसी राफेल से मिलना चाहेंगे? |
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जब तक
बाई वहाँ से वापिस नहीं आ गयी,
ग्रेसी का मन तरह तरह की आशंकाओं से घिरा रहा। वे लगातार अंदर बाहर
होती रहीं। बाई जब वापिस आयी तो उसके चेहरे का रंग उड़ा हुआ था। हाथ
में कुछ कागज़ और पैसे थे। बताने लगी -
“साब
की हालत को बहुत खराब है। डाक्टर ने पता नहीं क्यों अस्पताल से घर भेज
दिया। न कोई देखने वाला,
न दवा
देने वाला। घर में खाने को भी कुछ नहीं। ये पैसे दिये हैं दवा और कुछ
संतरे वगैरह लाने को। मेम साब क्या करूँ मैं?
मुझे
तो पता नहीं,
कौन
सी दवा लानी है और कितनी लानी है। इत्ते सारे कागज़ दे दिये मुझे।”
“दरवाज़ा
खुला था क्या?”
“नहीं,
बड़ी
मुश्किल से दरवाज़े तक चल के आये।”
“फिर”
“मैंने
सहारा देकर बिस्तर पर लिटाया,
पानी
पिलाया और तब वो बोले कि किसने भेजा है।”
“तो
क्या बोली तू?”
“क्या
बोलती मैं,
मैं
यही बोली कि टैक्सी वाले ने बताया था कि आपको दवा ला के देनी है।”
“ठीक
किया तूने। चल एक काम करती हूँ। मैं तेरे साथ चल कर ये दवाएँ दिलवा
देती हूँ। तू जा कर दे देना और पूछ भी लेना अगर उन्हें और कोई काम हो
या किसी काम वाली बाई की जरूरत हो तो।”
“मैं
पूछूँगी।”
तब
ग्रेसी बाई के साथ कैमिस्ट के पास गयी थी। जब सारी दवाएँ मिल गयीं तो
पैसे देते समय ग्रेसी ने कैमिस्ट से यूँ
ही
पूछ लिया था कि ये सब किस बीमारी की दवाएँ हैं।
“कैंसर
की। क्यों,
आप
दवा लेने आयी हैं और आप ही को पता नहीं।”
ग्रेसी का कलेजा मुँह को आ गया था। वे बड़ी मुश्किल से अपनी भावनाओं को
बाई और कैमिस्ट से छुपा पायी थीं। उस दिन बेशक बाई ही जा कर दवाएँ दे
आयी थी और कमरा वगैरह भी साफ कर आयी थी,
उसका
बिस्तर ठीक से लगा आयी थी,
लेकिन
घर आते आते ग्रेसी की बुरी हालत हो गयी थी। अब उन्हें समझ में आ रहा था
कि वे अब तक एक बीमार,
मरते
हुए आदमी की हँसी ही देखती आ रहीं थीं। चुक रहे आदमी की हँसी,
जिसका
मन की खुशी से कोई नाता नहीं होता।
ग्रेसी की बाई ने वहाँ का काम हाथ में ले लिया था। सफाई,
खाना
बनाना और जूस वगैरह बना देना,
पीने
के लिए पानी उबाल देना,
दवा
दे देना,
और
जरूरत पड़ने पर दूसरे काम कर देना। उस आदमी ने अपने घर की एक चाबी बाई
को ही दे दी थी ताकि उसे बार बार उठने की जहमत न उठानी पड़े। बाई चूँकि
ग्रेसी के घर काम करने के बाद वहाँ जाती इसलिए चाबी उसने ग्रेसी के पास
ही रखवा दी थी। बताती थी बाई ग्रेसी को उसके बारे में-
“साब
बहोत शरीफ़
है।
सारा दिन लेटा रहता है। किताबें पढ़ता रहता है। मुझे इतने पैसे दे देता
है कि कहीं और काम करने की जरूरत ही न पड़े। कहता है,
आज तक
उसकी किसी ने इतनी सेवा नहीं की जितनी मैं करती हूँ।”?
अब
खिड़की खुलती तो थी,
लेकिन
वह चेहरा नजर नहीं आता था। अब ग्रेसी के घर की तरफ कोई नहीं देखता था
लेकिन ग्रेसी जानती थीं कि वह शख़्स सारा दिन लेटे लेटे जरूर उनका
इंतज़ार करता होगा। लेकिन वे सब कुछ जानते हुए भी वहाँ जाने की हिम्मत
नहीं जुटा पाती थीं। एकाध बार उनके मन में आया कि मिस्टर राफेल को बाई
के हवाले से उस आदमी की बीमारी के बारे में बतायें और उन्हें वहाँ जा
कर उसे देख आने के लिए कहें लेकिन वे राफेल को जानती थीं। किसी भी बात
का गलत अर्थ
लगाने
में उसे जरा भी देन न लगती और मुसीबत उन्हीं की होती। बेशक बाई से उसकी
सेहत के बारे में,
दिनचर्या
के
बारे में जानने को बेचैन रहतीं। बाई भी बिला नागा उसकी सेहत का बुलेटिन
प्रसारित कर जाती।
उस
दिन बाई काफी देर तक नहीं आयी थी। रोजाना आठ बजे आ कर पहले उसके नाश्ते
पानी का इंतजाम करती और बाद में ग्रेसी के घर का काम करती। ग्रेसी ने
अपने घर का काम तो निपटा लिया था लेकिन उन्हें लगातार इस बात की चिंता
लगी हुई थी कि उसने अब तक नाश्ता भी नहीं किया होगा,
पता
नहीं,
खाली
पेट दवा कैसे लेगा। ग्रेसी
का मन बहुत बेचैन था लेकिन कुछ भी
सूझ नहीं रहा था कि वे क्या करें। बच्चे स्कूल जा चुके थे नहीं
तो उनके हाथ ही कुछ खाने के लिए भिजवा देतीं। बच्चे दो बजे लौटते थे और
अभी सिर्फ
ग्यारह ही बजे थे। बेचारा सुबह से भूखा होगा। पता नहीं बाई को भी आज
क्या हो गया।
जब
ग्रेसी से और नहीं रहा गया तो उन्होंने एक गिलास गाजर का जूस तैयार
किया,
हलका
सा नाश्ता बनाया,
हिम्मत करके चाबी उठायी और चल दीं - जो भी होगा देखा जायेगा। आखिर किसी
के जीवन मरण का प्रश्न है। सिर्फ़
खाने
की बात नहीं है,
दवा
की भी बात है। वे मन कड़ा करके उसके दरवाज़े पर पहुँचीं,
दरवाजे में चाबी घुमायी ओर हलके से दरवाज़ा धकेला।
वह
सामने ही लेटा हुआ था। आँखें बंद। दाढ़ी कई दिन से बढ़ी हुई और चेहरा
एकदम निस्तेज। बहुत कमजोर हो गया था वह। दरवाज़ा खुलने की आवाज़ से उसकी
नींद खुली और उसने मुड़ कर देखा - उन्हें देख कर चेहरे पर फीकी चमक
आयी। कुछ कहना चाहा उसने लेकिन खुश्क होंठों से कोई शब्द बाहर नहीं
आये। और वह सूनी आँखों से अपने मेहमान को देखता रह गया। उसने जीभ अपने
पपड़ाये होंठों पर फिरायी। ग्रेसी समझा गयी कि उसे प्यास लगी है।
ग्रेसी ने सामान एक तिपाई पर रखा और एक गिलास पानी भर कर उसके पास
लायीं। उसने उठने की कोशिश की,
लेकिन
उठ नहीं पाया। ग्रेसी थोड़ी देर तक संकोच में खड़ी रहीं फिर सहारा देकर
उसे बिठाया,
पानी
पिलाया और तौलिये से उसका मुँह पोंछा।
पानी
पीकर उसे थोड़ी राहत मिली। दोनों की आँखें मिलीं। उसकी आँखों में बहुत
डरावना सन्नाटा था जिसे देख कर ग्रेसी एक बारगी तो डर ही गयी थीं। वे
एक मरते हुए आदमी की आँखें थीं जिनमें बेपनाह मुहब्बत की भीख थी। उसे
नाश्ता पानी कराके,
दवा
दे कर और पानी का गिलास सिरहाने रख कर जब ग्रेसी लौटने लगीं तो उस आदमी
की निगाहों में जो चमक ग्रेसी ने देखी तो उन्हें लगा उन्हें बहुत पहले
उसके पास आना चाहिये था और कुछ दिन उसकी सेवा करनी चाहिये थी।
जब वे
लौटीं तो उन्हें बहुत संतोष था। अपनी ज़िन्दगी में उन्होंने
पहली बार कई चीज़ें एक साथ देखी थी। तिल तिल मरता हुआ आदमी,
उन
मरती हुई आँखों में भी बेपनाह मुहब्बत थी और शायद पहली बार हो रहा था
कि किसी अनजान आदमी की पहली ही मुलाकात में उन्होंने इतनी सेवा की थी
और संतोष अनुभव किया था। बेशक दोनों में एक भी संवाद का आदान प्रदान
नहीं हुआ था और दोनों ही एक दूसरे का नाम भी नहीं जानते थे। वे खुद
उसके लिए दवाएँ लायी थीं लेकिन पर्ची
पर
उसका नाम देखने की जरूरत महसूस नहीं हुई थी उन्हें।
उसके
बाद वे कई बार उसके कमरे में गयी थीं। उसे चुपचाप खाना खिलाया था,
दवा
दी थी और...धीरे धीरे उसे ठीक होते देखा था। संवाद अभी भी दोनों ओर से
एक बार भी नहीं हुआ था।
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तभी
एक दिन हंगामा हो गया था। मिस्टर राफेल ने उन्हें उसकी दलहीज से बाहर
निकलते देख लिया था। उनके हाथ में खाने के बरतन थे। वे उसे खाना खिला
कर आ रहीं थीं। घर पहुँचते ही कड़े स्वर में पूछा था राफेल ने -
“कब
से चल रहा है ये चक्कर?”
“कौन
सा चक्कर?”,
मिसेज़
राफेल ने पलट कर पूछा था।
“ये
रंगरेलियाँ मनाने का चक्कर और कौन सा चक्कर,
साली
बदज़ात,
एक तो
दिन दहाड़े अपने यार से मिलने उसके घर पर जाती है और पूछती है कौन सा
चक्कर?”
“आप
यह क्या कह रहे हैं।”,
ग्रेसी ने दबी जबान में विरोध किया था-
”उसे
कैंसर है और उसे दवा देने वाला भी कोई नहीं है। बेचारा..”
राफेल
ने उसे बात पूरी नहीं करने दी थी और बिना सोचे समझे उन पर लात घूँसों
की बरसात शुरू कर दी थी। ग्रेसी को मालूम या,
एक न
एक दिन ये नौबत आनी ही थी,
इसलिए
बे बिना उफ भी किये पिटती रहीं। उन्हें पिटते हुए भी इस बात का संतोष
या कि वे किसी के काम आ सकीं थीं। वे गालियाँ बके जा रहे थे और उन पर
ऐसे ऐसे आरोप लगा रहे थे जिनके बारे में व कभी सोच भी नहीं सकती थीं।
उन्हें पता था,
विरोध
का एक भी शब्द राफेल के गुस्से को और बढ़ायेगा और उनकी और ज्यादा पिटायी
होगी।
लेकिन
ग्रेसी ने ज़िद ठान ली थी कि जब तक वह आदमी पूरी तरह से चंगा नहीं हो
जाता,
वे
उसकी जितनी भी हो सके,
देख
भाल करती रहेंगी। राफेल से पिटने को बावजूद। राफेल ने इसी बात पर कई
बार उन्हें पीटा था। बच्चों के सामने और एक बार तो रात के वक्त घर से
बाहर भी निकाल दिया था। वे अब उनकी पूरी तरह से जासूसी करने लगे थे और
पता नहीं कहाँ कहाँ के पुराने बखेड़े ले कर बैठ गये थे। मिस्टर राफेल
ने एक बार भी इस बात की जरूरत नहीं समझी कि जिस आदमी के शक में वे इतने
दिनों से अपनी बीवी को पीटे जा रहे हैं और उसका जीना मुहाल किये हुए
हैं,
कम से
कम एक बार जा कर देख तो लें कि उसकी ऐसी हालत है भी या नहीं जिसके साथ
रंगरेलियाँ मनायी जा सकें। लेकिन राफेल अपना गुस्सा ग्रेसी पर ही
उतारते रहे। पता नहीं कितने दिनों का और किस किस बात का गुस्सा था कि
खत्म होने में ही नहीं आता था। वे इन दिनों जैसे पागलपन के दौर में थे
और बात बेबात ग्रेसी पर बरस पड़ते। घर पर ताला लगा कर जाते और उन्हें
भूखा रखते। इतने पर भी संातोष न होता तो घर से निकालने की धमकियाँ
देते।
तिलमिलायी थीं कि इससे ज्यादा पागलपन क्या हे सकता है कि एक मरते हुए
आदमी की दवा तक छीन कर नाली में फेंक दी जाये। उन्हें बहुत गुस्सा आया
था लेकिन वे खून के घूँट पी कर रह गयी थीं। राफेल के सामने विरोध करने
का कोई मतलब नहीं था।
ये कई
बरसों के बाद हो रहा या कि आजकल राफेल रोज शाम को ही आकर घर में जम
जाते और कई बार आफिस ही न जाते। सिर्फ
जासूसी करने को लिये।
तभी
बाई से उन्हें पता चला था कि उसकी तबीयत और खराब हो गयी थी। बाई ने
उसके पड़ोसियों को खबर कर दी थी कि उसकी हालत खराब है और वह दर्द से
बेहाल है।
ग्रेसी को पता नहीं चल पाया था कि उस आदमी को एक सुबह कहाँ ले जाया गया
था और क्यों ले जाया गया था। बाई बता रही थी कि जब वह हमेशा की तरह काम
करने गयी थी तो वहाँ ताला लगा हुआ था और किसी को पूरी तरह से पता नहीं
था कि उन्हें किधर ले जाया गया था। उसके बाद उन्हें उसकी कभी भी कोई भी
खबर नहीं मिल पायी थी। वे उसे आखरी बार देख नहीं पायीं थीं और उसकी
दवाएँ उस तक न पहुँचाने का मलाल उन्हें कई दिन तक सालता रहा था।
ग्रेसी ने तब सोचा था कि जितनी भी हो सकी,
उन्होंने अपनी तरफ से उसकी सेवा की थी और अब राफेल को कम से कम शक की
आग में और नहीं जलना पड़ेगा। ये कैसा नेह था जो ग्रेसी ने उस अनजान
आदमी को दिया था। न उसका नाम पूछा था न अपना नाम बताया था। वह क्या था
जिसने उन दोनों को जोड़ा था बिना एक भी संवाद बोले और उस मरते हुए आदमी
की आँखों में कुछ पलों के लिए उम्मीदों के चिराग जल उठे
थे।
ग्रेसी ने उस अरसे में एक भरपूर जीवन जी लिया था। बेशक वे उसके जीवन
में कुछ जोड़ नहीं पायीं थीं फिर भी यह अहसास तो था ही कि कुछ तो दिया
ही था।
तब
राफेल ने एक दूसरा खेल शुरू कर दिया था। पता नहीं इसमें बदले की भावना
काम कर रही थी या वे सचमुच उस छोकरी से प्यार करने लगे थे। जब राफेल ने
देखा कि वह आदमी अब यहाँ से जा चुका तो फिर से उन्होंने देर से आना
शुरू कर दिया था। ग्रेसी को कुछ लोगों ने बताया था कि आजकल उनका अपने
ऑफिस की किसी लड़की से अफ़ेयर चल रहा है। ग्रेसी इन सारी बातों की कभी
भी परवाह नहीं करती थीं। इस तरह के अफ़ेयर उनके अक्सर चलते ही रहते थे।
उनके हिस्से में उनका पूरा पति आज तक आया ही नहीं था कि उसे खोने से
डरतीं। संकट तब शुरू हुआ जब उसे ले कर वे घर आने लगे और ग्रेसी से
उम्मीद करने लगे कि वे उसकी सेवा करें। वह अति साधारण लड़की थी और पता
नहीं किस लालच में राफेल से चिपकी हुई थी। सब कुछ जानते बूझते हुए भी।
ग्रेसी ने इस बात को भी स्वीकार कर लिया था। अगर उनके पति को ही अपने
बच्चों और बीवी का,
अपने
अड़ोसियों पड़ोसियों की आँखों का लिहाज नहीं है तो उन्हें क्या पड़ी
है। मरने दो। वैसे भी कौन सा सुख दे रहे थे जो छिन जाता और इस दुख के
लिए शिकायत करतीं।
लेकिन
हद तो तब हो गयी जब वे उसे सीधे बेडरूम में ले जाने लगे और ग्रेसी से
नौकरानी का सा व्यवहार करने लगे। यह उन्हें नागवार गुज़रा था। अब तक तो
सब सहती आयीं थीं,
ये
उनसे सहन नहीं हुआ। बेडरूम का दरवाज़ा खुला रहता,
बच्चे
आस-पास मंडराते रहते और राफेल कमरे में सारी सीमाएँ लाँघते नज़र आते।
ग्रेसी ने जब इसका दबे स्वरों में विरोध किया तो उन्हीं पर गुर्राने
लगे कि अब इस घर में तुम्हारी कोई ज़रूरत नहीं है। या तो खुद घर छोड़ कर
चली जाओ या मैं ही घर से निकाल दूँगा। अपने दिन भूल गयी जब दिन दहाड़े
अपने यार से मिलने जाती थी। तुझे जाना हो तो जा अपने यार के पास।
उस
रात पहली बार ग्रेसी अपने पति पर भड़की थीं। बहुत देर तक शोर मचाती रही
थीं। इतना कि राफेल दंग रह गये थे कि इस औरत में इतना ताप है। ग्रेसी
अपना आपा खो बैठी थीं। पता नहीं कब से घुटती आ रही थीं और अब मौका मिल
गया था अपनी बात कहने का। बदहवासी में उन्होंने अपने कपड़े फाड़ डाले
थे और सारा सामान बिखेर दिया था। उन्होंने बच्चों की भी परवाह नहीं की
थी और सारा घर सिर पर उठा लिया था। कहा था राफेल से -”मैं
भी देखती हूँ कि कैसे वह चुड़ैल इस घर में आती है।”
बच्चे
पहली बार माँ के इस रूप को देख रहे थे। वे डरे सहमे कोने में दुबके
खड़े थे।
लेकिन
आखिर हार ग्रेसी की ही हुई थी। राफेल उस लड़की को अगले दिन से हमेशा
हमेशा के लिए घर पर ले आये थे और ग्रेसी से साफ साफ कह दिया कि इस घर
में रहना है तो इसे
स्वीकार करना होगा। आखिर बच्चों को अपने घर को अपनी दुनिया को छोड़ कर
कहाँ जातीं। ग्रेसी बिस्तर पर पड़ गयी थीं और गहरे डिप्रेशन में चली
गयीं थीं। डॉक्टर लगातार आता रहा था और इंजेक्शन देता रहा था। कुछ दिन
के बाद बेशक ग्रेसी ठीक हो गयीं थीं लेकन उस लड़की को देखते ही उन पर
हिस्टीरिया के दौरे पड़ने लगते और फिर से उनकी तबीयत खराब होने लगती।
इंजेक्शनों और दवाओं के असर में वे घंटों सोयी रहतीं और घर के सारे काम
वैसे ही पड़े रहते। राफेल इस बात पर बिगड़ते और नित नये झगड़े होते।
ग्रेसी समझ नहीं पा रही थीं कि दवा लेते ही उन्हें क्या हो जाता है।
लेकिन जो कुछ सामने देखतीं उसे भी सहन करने की ताकत नहीं बची थी उनमें।
राफेल ने तो उन्से बात करना भी बंद कर दिया था। उन्हें अपना होश भी न
रहता। बच्चे क्या खाते हैं,
कोई
उन्हें खाना देने वाला भी है या नहीं,
या
स्कूल जाते हैं या नहीं,
उन्हें पता न रहता। जब तबीयत ठीक होती तो थोड़ा बहुत काम कर लेतीं वरना
लेटी रहती और अपनी किस्मत को कोसती रहतीं। धीरे धीरे उनकी सेहत खराब
होती चली गयी थीं और एक दिन राफेल के डॉक्टरों की सलाह पर उन्हें पागल
खाने पहुँचा दिया गया था।
वैसे
देखा जाये तो वे पागल कहाँ हुई थीं। उनके सामने हालात ही ऐसे बना दिये
गये थे कि भला चंगा आदमी पागल हो जाये। उन्होंने तो फिर भी पूरे छ:
महीने तक सारी स्थितियों को सहन किया था और चूँ
तक
नहीं की थी और उस लड़की को पूरे छ: महीने तक अपनी छाती पर झेलती रहीं।
जब भी उन्होंने विरोध किया या करने की कोशिश की,
हिस्से में मार ही आयी और आखिर पागल बना कर उन्हें घर से निकाल ही दिया
गया।
उन्हें नहीं पता कि वे कितने अरसे पागलखानों में रहीं और कहाँ कहाँ
भटकती रहीं। एक बार जब वे ठीक होकर बाहर आयीं भी,
तो उस
वक्त राफेल दिल्ली छोड़ कर जा चुके थे। उनके लिए अतीत के सारे दरवाज़े
बंद हो चुके थे। वे बहुत छटपटायीं थीं अपने बच्चों से मिलने के लिए।
पागलों की हालत में एक शहर से दूसरे शहर में भटकती रही थीं लेकिन उनके
शरीर पर दवाओं का इतना गहरा असर था कि बहुत कोशिश करने पर भी पिछली
बातें याद न आतीं। शहर याद आता तो कॉलोनी भूल जातीं और कॉलोनी याद आने
पर घर का पता भूल चुकी होतीं। थक हार कर उन्होंने कोशिश ही छोड़ दी थी
और भटकते भटकते आखिर मुंबई पहुँची थीं और यहाँ,
चर्चगेट के इस कोने में अपना डेरा डाल दिया था। तब से यही उनका स्थायी
पता है। ऐसा पता,
जिस
पर न कोई आता है न आना चाहेगा।
आज
अगर वे अपने परिवार में होतीं तो उनका बड़ा बेटा
33
बरस का और छोटा बेटा लगभग
31
बरस का होता। वो तो अब भी इसी उम्र के होंगे,
बस,
उन्हें ही नहीं पता,
कहाँ
होंगे वे। राफेल को गुज़रे अरसा हो गया है।
कोई
बड़ी बात नहीं,
उनके
दोनों बेटे यहीं मुंबई में ही हों और रोजाना अपने काम पर यहीं से गुज़र
कर जाते हैं। होने को तो यह भी हो सकता है कि रोजाना दस बजे के करीब एक
लम्बी सी कार में वह जो साँवला सा आदमी आ कर खाने का पैकेट उन्हें दे
जाता है और कभी कभी कपड़े भी दे जाता है,
मिसेज
ग्रेसी राफेल का ही बड़ा या छोटा बेटा हो और अपने परिवार के डर से
उन्हें घर ले जाने की हिम्मत न जुटा पाता हो। होने को तो बहुत कुछ हो
सकता है मेरे प्रिय पाठक,
लेकिन
अगर आप कभी चर्चगेट से गुज़रें और आपको मिसेज राफेल से बात करने की
इच्छा हो और मौका भी मिल जाये तो वे आपको यही बतायेंगी कि उन्हें कुछ
भी याद नहीं है कि उनका कोई बेटा भी था या उनका कभी कोई घर बार भी था।
निश्चित ही वे अपने अतीत के बारे में कोई भी बात नहीं करना चाहतीं।
वे
आपसे इस बारे में कोई बात नहीं करेंगी।
मुझसे
भी नहीं!!
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