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| 11.10.2007 |
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क्या आप ग्रेसी राफेल से मिलना चाहेंगे? |
|
लेकिन
वे हमेशा से ऐसी नहीं थीं। उनका भी घर बार था,
उनकी
ज़िन्दगी में भी कई लोग थे और वे भी कई रिश्ते जी रही थीं। पत्नी,
माँ,
बेटी,
बहन
सब के सब रिश्ते उन्होंने भी जीये हैं। और खूब जीये हैं। वे भी एक
सम्मानजनक जीवन जी रही थीं और उनका भी अच्छा खासा घर-बार था,
सामाजिक दायरा था और वे एक सुघड़ गृहणी के रूप में,
एक
सफल पत्नी के रूप में और एक आदर्श माँ के रूप में पूरे सात आठ बरस तक
रहीं थीं।
उनका
नाम था,
अपना
सर्किल था और पहचान थी। ये सब आगे भी बने रहते अगर...। अगर...। बहुत
सारे अगर मगर हैं। कहाँ तक गिनायें। एक कारण से दूसरा जुड़ता चला गया
और वे अकेली,
असहाय
और निरुपाय होती चली गयीं। काश,
उनके
पिता की असमय मौत न हुई होती,
काश,
उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में न छोड़नी पड़ती। काश,
उन्हें हैदराबाद न जाना पड़ता,
न
उन्होंने टाइपिंग सीखी होती और न उन्हें मिस्टर राफेल के ऑफिस में
नौकरी करनी पड़ती और न ही मिस्टर राफेल पसंद करके ब्याह करके घर ले आते
और न ही वे मिस्टर राफेल के शक की शिकार न हो गयी होतीं। इस शक ने एक
हँसता खेलता परिवार हमेशा हमेशा के लिए खत्म कर दिया था और वे अपना घर
बार होते हुए भी न केवल बेघर बार हो गयीं थीं बल्कि एक ऐसा अभिशप्त
जीवन जीने के लिए मजबूर हो गयीं थीं जिसके बारे में वे कभी सोच भी नहीं
सकतीं थीं कि चेरियन परिवार की यह होनहार लड़की एक दिन चर्चगेट स्टेशन
पर इस हालत में बीस बरस कर लम्बे अरसे तक रहने को मजबूर होगी और उससे
पहले उसे सात आठ बरस बिना पागल हुए भी पागल बन कर दूसरी पगली औरतों के
बीच अलग अलग पागल खानों में गुजारने पड़ेंगे। कब सोचा था उन्होंने कि
उनके लिए पूरी दुनिया ही अपरिचित हो जायेगी और उनका किसी से भी,
यहाँ
तक कि अपने बच्चों से भी हमेशा हमेशा के लिए नाता टूट जायेगा। वे एक
ऐसी गुमनाम और बेरहम ज़िन्दगी जीने को अभिशप्त हो जायेंगी जिसमें कभी
किसीसे भी एक भी संवाद की गुंजाइश ही न बचे। पता नहीं,
उन्होंने आखिरी बार किससे,
कब और
क्या बात की होगी।
आज की
ग्रेसी राफेल चेरियन हुआ करती थीं। वे कई बार अपने स्कूल की बेस्ट
स्टूडेंट का खिताब पा चुकी थीं और स्कूल के स्पोट्र्स
डे पर
सबसे ज्यादा ईनाम बटोर कर लाना उनके लिए बायें हाथ का खेल था। वे स्कूल
की शान थीं और तय था,
अपने
घर में,
रिश्तेदारी में और अपने समाज में उन्हें हमेशा एक ऐसी लड़की के रूप में
देखा और सराहा जाता था जो चेरियन परिवार का नाम खूब रौशन करेगी। वे कर
ही रही थीं और आगे भी तरक्की की सीढ़ियाँ चढ़तीं। बचपन में वे खूब हँसती
थीं। खुद भी हँसती और सारे घर में हँसी बिखेरती रहतीं। उनकी हँसने की
आदत का यह आलम था कि बात बेबात पर जब देखो खिड़खिड़ कर रही हैं। घर
वाले उनकी हँसी से परेशान हो कर कोसते कि जब ससुराल जायेगी तो सारी
हँसी धरी की धरी रह जायेगी। वे जवाब देतीं कि तब की तब देखी जायेगी। कई
बार मज़ाक में कही गयी बातें भी किस तरह से भविष्यवाणियाँ बन जाया करती
हैं। उनकी हँसी पर भी नज़र लग गयी और वह हमेशा के लिए थम गयी।
अभी
वे ग्यारहवीं में ही पढ़ रही थीं कि उनके पिता को व्यापार में घाटा होने
लगा। घर का आर्थिक ग्राफ एकदम नीचे आ गया और घर में खाने के भी लाले
पड़ने लगे। एक दिन अचानक उनके पिता नींद में ही चल बसे और किसी को कुछ
करने या सोचने का मौका ही न मिला। ग्रेसी भाई बहनों में सबसे बड़ी थी
इसलिए उसी को अपनी पढ़ाई अधबीच में ही छोड़ देनी पड़ी। एक बसा-बसाया घर
देखते ही देखते भुखमरी के कगार पर आ गया।
घर
में कोई भी कमाने वाला नहीं बचा था। नारियल और रबड़ की थोड़ी बहुत खेती
थी लेकिन उससे न तो कर्ज़
पट
सकते थे और न ही घर का खर्च
ही चल
सकता था। जैसे-तैसे घर की गाड़ी खींची जा रही थी। कुछ दिन वे हैदराबाद
में अपनी चचेरी बहन के पास भी रहीं थीं। उनकी चचेरी बहन और जीजा दोनों
ही एक सरकारी संस्थान में काम करते थे और उनकी बहन की डिलीवरी होने
वाली थी। डिलीवरी से पहले बहन की सेवा करने और बाद में नवजात बच्चे की
देखभाल करने के लिए किसी की जरूरत थी। ग्रेसी की पढ़ाई वैसे भी छूट चुकी
थी और यही उचित समझा गया क उन्हें वहाँ भेज दिया जाये। उनका दिल भी
लगा रहेगा और वे कुछ न कुछ सीख कर ही लौटेंगी। निश्चित ही इसके पीछे
आर्थिक समीकरण भी काम कर ही रहे थे। और इस तरह ग्रेसी को हैदराबाद भेज
दिया गया था। उस समय उनकी उम्र मात्र सत्रह बरस थी और हैदराबाद जाने के
साथ ही उनका घर हमेशा के लिए छूट गया था।
हैदराबाद में दीदी के घर रहते हुए ही उन्होंने टाइपिंग सीखी थी और जीजा
जी ने उन्हें अपने एक परिचित मिस्टर राफेल के ऑफिस में टाइपिस्ट की
नौकरी दिलवा दी थी। ग्रेसी ने अपनी मेहनत के बल पर ऑफिस में एक खास जगह
बना ली थी और वे खासी लोकप्रिय हो गयी थीं। और यही मेहनत और लोकप्रियता
उनके लिए जी का जंजाल बन गयी थी। आर्थिक मोर्चे
पर
आत्म निर्भर हो जाने को बाद उनका आत्म विश्वास भी बढ़ा था और वे घर पर
भी पैसे भेजने लगीं थीं ताकि भाई बहनों की पढ़ाई का कोई सिलसिला बन सके।
कम्पनी के मैनेजर मिस्टर राफेल के टी राफेल अक्सर उन्हें अपने केबिन
में बुलवाने लगे थे और ऑफिस के बाद भी देर तक किसी न किसी काम में
उलझाये रहते। इधर उधर की बातें करते और किसी न किसी बहाने ग्रेसी के
पहनावे की,
काम
की और खूबसूरती की तारीफें
किया
करते। वे इन तारीफ़ों का मतलब खूब समझती थीं और उनकी आँखों में लपलपाती
काम वासना को साफ साफ पढ़ सकती थीं। वे शर्म
से
लाल हो जातीं लेकिन जानते बूझते हुए भी कुछ न कह पातीं। एक तो वे अपने
खुद के घर पर नहीं थीं और दूसरे कम्पनी के मैनेजर उनके जीजा के दोस्त
थे। वे किसी को भी नाराज़ करने की स्थिति में नहीं थीं और कुल मिला कर
उनकी उम्र अभी उन्नीस बरस भी नहीं हुई थी,
जबकि
राफेल कम से कम पैंतीस बरस के थे। वे उनके और उनकी पारिवारिक स्थिति के
बारे में कुछ भी नहीं जानती थीं। वे अपना काम खत्म करके जितनी जल्दी हो
सके,
केबिन
से बाहर आने की कोशिश करतीं।
तभी
एक दिन मिस्टर राफेल ने खुद उनके घर आ कर ग्रेसी के जीजा जी से ग्रेसी
का हाथ माँग लिया था। भला जीजा को क्या एतराज़ हो सकता था। उन्होंने
अपनी ड्यूटी पूरी कर दी थी। ग्रेसी को काम धंधे से लगा ही दिया था।
ग्रेसी की मम्मी से औपचारिक सहमति ले ली गयी थी और इस तरह ग्रेसी
चेरियन स्टार एंटरप्राइजेज की मामूली टाइपिस्ट से रातों रात मैनेजर की
ब्याहता बन गयी थीं।
वे
समझ नहीं पायी थीं कि उन्हें इस तरक्की पर खुश होना चाहिये या अफ़सोस
मनाना चाहिये। उनके बस में है ही क्या कि चीजों का विरोध कर सकें। उनका
बस चलता तो वे खूब पढ़ना चाहतीं,
राष्ट्रीय स्तर की एथलीट बनना चाहतीं और एक शानदार ज़िन्दगी जीना
चाहतीं। अब उनके हिस्से में अपनी पसंद का कुछ भी नहीं रहा था। हँसना तो
वे कब से भूल चुकी थीं अब बोलना भी छूटने लगा था। घर छूट चुका था और वे
अब वही कुछ स्वीकार करने को मजबूर थीं जो दूसरे उनके लिए तय करें।
उन्होंने इस शादी के लिए एक ही शर्त रखी कि उन्हें कुछ दिन अपनी पगार
का कुछ हिस्सा घर पर भेजने की अनुमति दी जाये ताकि भाई बहन अपनी पढ़ाई
पूरी कर सकें। बाकी जो जैसा हो रहा है होने दो। लेकिन वायदे का भी कुछ
मतलब नहीं रहा था क्योंकि जल्दी ही उनकी नौकरी छुड़वा दी गयी थी। लड़ने
का सबसे बड़ा हथियार आर्थिक आधार होता है और इसी मामले में उन्हें
कमजोर कर दिया गया था।
शादी
के बाद ही उन्हें पता चला था कि
उनके पति हद दरजे के शराबी आदमी हैं और चरित्र के भी कमजोर हैं।
उनकी ज़िन्दगी में अक्सर लड़कियाँ आती जाती रहती हैं। ग्रेसी ने तब यही
सोचा था कि शादी से पहले वे जैसे भी रहें हों,
अब तो
घर बार बस जाने के बाद उनकी जीवन शैली बदलेगी ही और उनका भटकाव कम
होगा। लेकिन ये उनका भ्रम था। शादी के बाद भी उनकी जीवन शैली में कोई
भी फर्क नहीं आया था। वे खूब पीते थे और कोई शाम ऐसी नहीं गुजरती थी जब
वे धुत्त होने के स्तर तक न पी लेते हों। शुरू शुरू के कुछ दिन तक तो
वे बिलकुल ठीक रहे और वक्त पर घर आते रहे लेकिन जल्दी ही वे अपने रंग
में आ गये थे। वे बाहर से भी पी कर आते थे और घर पर फिर से बोतल खोल कर
बैठ जाते। अकेले ही। बेशक ग्रेसी की अब तक खूब तारीफ़
करते
रहे थे और उन्हें खुद पसंद करके लाये थे फिर भी कुछ ऐसा था कि जिसे
भीतरी खुशी नहीं कहा जा सकता था। कोई उमंग नहीं,
खुशी
नहीं और नयापन नहीं। जैसे वे ग्रेसी को घर लाने के बाद उन्हें भूल ही
गये थे। घर में लाये किसी भी सामान की तरह। नौकरी तो उनकी तुरंत ही
छुड़वा दी गयी थी। ग्रेसी उनकी शराब की आदत को ले कर या देर रात घर आने
को लेकर कुछ कहना चाहतीं तो वे झिड़क देते कि मुझे किसी की भी कोई भी
बात सुनने की आदत नहीं है। मैं अपना काम कर रहा हूँ और तुम अपना काम
करो। घर संभालो।
ग्रेसी सारा दिन खाली बैठी बैठी बोर होतीं। दीदी जीजा भी ऑफिस गये होते
इसलिए उनके घर जाने का भी मतलब न होता। उन्होँने अपने आपके पूरी तरह घर
के लिए समiप्¥त
कर दिया था लेकिन घर की जरूरतें इतनी कम थीं कि उनके पास सारा दिन बोर
होने के अलावा कुछ भी न होता। उन्होंने एक बार दबी ज़बान में राफेल से
कहा था कि वे आगे पढ़ना चाहती हैं और हो सके तो काम भी करना चाहती है,
लेकिन
राफेल को दोनों ही बातें मंजूर नहीं थीं। एक बार फिर झिड़क कर मना कर
दिया। वे कट कर रह गयीं। ऐसी शादी क्या कि पति से कोई संवाद ही नहीं।
वे कब जाते हैं,
कब
आते हैं और कितना घर पर रहते हैं और जब घर पर रहते हैं तो बीवी से
कितनी देर बात करते हैं इस बारे में ग्रेसी को न कुछ कहने का हक था न
सवाल करने का। कई बार वे सोचतीं कि इससे तो अच्छा वे कुँवारी ही थीं।
कम से कम जीवन अपने तरीके से जीने का हक होता था। यहाँ तो वे उनकी कीमत
राफेल के घर में एक सामान से ज्यादा नहीं थी। बस,
राफेल
की जरूरतें पूरी करते रहो और घर में सारा दिन बन्द हो कर घुटते रहो।
बेकार दिन गुजारने के बाद बेकार रातों का इंतज़ार करो।
इस
बीच उनके दो बच्चे हुए थे। दोनों लड़के सिर्फ
दो
बरस के अंतराल पर। तेईस बरस की उम्र में वे दो छोटे छोटे बच्चों की माँ
बन चुकी थी। इससे उनके जीवन में बदलाव भी आया था और ठहराव भी। समय भी
बेहतर गुजरने लगा था। सारा दिन बच्चों की देखभाल में कब गुज़र जाता,
पता
ही न चलता।
तभी
राफेल का दिल्ली ट्रांसफर हो गया था। ग्रेसी को लगा था कि शायद यहाँ आ
कर उनके जीवन में बदलाव आयेगा लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था,
बल्कि
वे पहले की तुलना में और अकेली हो गयीं थीं। हैदराबाद में कम से कम
आसपास मलयालम या अंग्रेजी बोलने समझने वाले कुछ तो लोग थे,
कुछ
रिश्तेदार और दीदी,
जीजा
वगैरह तो थे ही,
यहाँ
वे बिल्कुल अकेली पड़ गयी थीं। कोई बात करने वाला नहीं था। दिल्ली आने
को बाद राफेल की दिनचर्या
और
व्यस्त हो गयी थी और उनका समय और ज्यादा बाहर गुज़रने लगा था। वे सारा
दिन अपने आपको बच्चों में उलझाये रहतीं। बहुत हुआ तो कभी बाल्कनी में
आकर खड़ी हो जातीं और नीचे सड़क पर चल रहे ट्रैफिक को देखती रहतीं।
तभी
उन्होंने पाया था कि जब भी वे बाल्कनी में खड़ी होती हैं,
उनके
ठीक सामने वाले घर में खिड़की में परदे के पीछे से एक चेहरा छुप कर
उन्हें देखता रहता है। स्मार्ट
सा,
गोरा
चिट्टा आदमी। उम्र चालीस के आस पास। वे लज्जावश अंदर आ जातीं और जब वे
दोबारा किसी काम से या यूँ
ही
वहाँ खड़े होने के मकसद से बाल्कनी में जातीं तो पातीं कि वह तब भी
उन्हीं की तरफ देख रहा होता। वे समझ न पातीं कि वह लगातार उन्हीं के घर
की तरफ क्यों देखता रहता है। एक बार निगाह में आ जाने के बाद तो जब वे
देखती,
उस
शख़्स को अपनी तरफ ही देखता पातीं। वे हैरान होतीं इस आदमी को और कोई
काम भी है या नहीं,
जब
देखो,
खिड़की पर ही टंगा रहता है। पहले तो वह उन्हें देखता ही रहता,
अब
कुछ दिन से उन्हें देख कर मुस्कुराने भी लगा था।
डर को
मारे उन्होंने बाल्कनी में जान ही कम कर दिया था लेकिन वे अपने कमरे के
भीतर से छुप कर भी देखतीं तो उस आदमी को अपने घर की तरफ ही देखता
पातीं। वे बहुत डर गयी थीं। कहीं राफेल ने उसे देख लिया तो उन्हें
कच्चा चबा ही जायेगा,
सामने
वाले को भी ज़िंदा नहीं छोड़ेगा। वैसे उन्हें यह देख कर मन ही मन अच्छा
भी लगता कि कोई तो है भले ही अनजान,
अपरिचित ही सही,
उनकी
तरफ तारीफ भरी निगाह से देखता तो है। राफेल ने तो शादी के छ: बरसों में
कभी भूले से भी उनकी तारीफ नहीं की थी। सोचा था ग्रेसी ने,
कुछ
माँगता थोड़े ही है,
बस इस
तरफ देखता ही रहता है। देखने दो। उस खिड़की में उनके अलावा और कोई
चेहरा कभी भी नज़र नहीं आता था।
लेकिन
यहीं उनसे चूक हो गयी
थी। हालाँकि अब वे उस चेहरे की तरफ से उदासीन हो गयी थीं और पहले की
तरह बाल्कनी में जाने लगी थीं,
लेकिन
यह इतना आसान नहीं था। उस तरफ न देखते हुए भी वे जानती थीं कि खुली
खिड़की में से या परदे के पीछे से एक जोड़ी आँखें उन्हीं की तरफ लगी
हुई हैं।
एकाध
दिन ऐसे ही चला था। वे बाल्कनी में जातीं,
उस
तरफ देखती भी नहीं और लगातार महसूस करती रहतीं कि उन आँखों की आँच बिन
देखे भी उन तक पहुँच रही है। तभी अचानक उस तरफ निगाह घूमाने पर
उन्होंने पाया था कि खिड़की तो बंद है।
पहले
तो उन्होंने इसकी तरफ़
ज्यादा ध्यान नहीं दिया लेकिन जब दिन में कई बार देखने पर भी जब
उन्होंने खिड़की को बंद ही पाया तो वे परेशान हो उठीं। कहाँ चला गया वो
शख़्स। बेशक कुछ कहता नहीं था लेकिन उसकी मौजूदगी ही एक सुखद अहसास देने
लगी थी। बेशक वे उसे जानती नहीं थी,
कौन
है,
क्या
करता है,
उसके
घर में और कौन कौन है,
उन्हें कुछ भी नहीं मालूम था फिर भी एक नामालूम सा खालीपन उन्हें महसूस
होने लगा था।
खिड़की पूरे सात दिन तक बंद रही थी। इस बीच ग्रेसी ने सैंकड़ों बार
बाल्कनी में आकर उस तरफ देखा होगा लेकिन हर बार खिड़की के पल्ले बंद पा
कर उनके दिल में एक हूक सी उठती। पता नहीं कहाँ गया वो आदमी। कहीं
बीमार वीमार तो नहीं हो गया।
आठवें
दिन ग्यारह बजे के आसपास का समय होगा। वे घर के कामकाज निपटा कर गीले
कपड़े धूप में डालने के लिए बाल्कनी में आयी ही थीं कि उन्होंने
बिल्डिंग के नीचे एक टैक्सी को रुकते देखा। तभी उन्होंने देखा कि
टैक्सी वाला एक आदमी को सहारा दे कर टैक्सी से बाहर निकाल रहा है और
हौले हौले सहारा देता हुआ इमारत के अंदर ला रहा है। उस आदमी ने ऊपर
उनके घर की तरफ देखा। वे देख कर हैरान रह गयीं। वही आदमी था। बीमार,
थका
हुआ और एकदम कमजोर। चलने में भी उसे तकलीफ़
हो
रही थी। लेकिन उनसे आँखें मिलते ही उसके चेहरे पर फीकी सी हँसी आयी थी।
वे
लपक कर भीतर आ गयी थीं। इसका मतलब उनका शक सही निकला। वह आदमी जरूर
बीमार रहा होगा तभी तो टैक्सी वाला उसे सहारा दे कर भीतर ला रहा था।
काफी देर तक बा्कनी में जाने की हिम्मत नहीं हुई। उन्हें धुकधुकी लगी
हुई थी मानों उन्हें ही कुछ हो गया हो। टैक्सी जा चुकी थी।
काफी
देर को बाद जब वे बाल्कनी में गयी थीं तो खिड़की हमेशा की तरह खुली हुई
थी और वह वहाँ खड़ा था। बेहद कमजोर,
दाढ़ी
बढ़ी हुई और चेहरे पर थकान। वह उन्हें देखते ही मुस्कुराया। वे एकदम
चौंक गयीं। वह उन्हें इशारा करके बुला रहा था। उनकी साँस फूल गयी और वे
अचानक तय नहीं कर पायीं कि वे कैसे रिएक्ट करें। यह आदमी तो शराफत की
सारी सीमाएँ लाँघ रहा है। दिन दहाड़े उन्हें अपने घर में बुला रहा है।
बीमार है तो क्या हुआ,
आदमी
को शर्म
लिहाज
तो होनी चाहिए,
न जान
न पहचान,
अपने
घर में इस तरह से इशारे करके बुलाने का क्या मतलब।
वे
बाल्कनी से वापिस लौट आयीं और कमरे में आकर लेट गयीं लेकिन भीतर आने के
बाद भी उन्हें चैन नहीं था। लगता,
बेचारा बीमार है,
अस्पताल वगैरह से आया होगा,
घर
में खाने को कुछ नहीं होगा या दवा वगैरह की जरूरत हो सकती है। जा कर
देखने में कोई हर्ज
नहीं
है। वे काफी देर तक इसी उथल पुथल में अंदर बाहर होती रहीं कि क्या
करें। लेकिन हिम्मत न जुटा पायीं। वे फिर बाहर बाल्कनी में आयीं तो
देखा,
खिड़की बंद हो चुकी थी और फिर वह शाम तीन चार बजे तक न खुली। अब ग्रेसी
की बेचैनी बहुत बढ़ गयी कि वे करें तो क्या करें। वहाँ जाने की हिम्मत
तो नहीं थी उनकी लेकिन चैन भी नहीं आ रहा था कि शायद बेचारे को दवा की
ही जरूरत होगी इसीलिए बुलवा रहा होगा। अकेला ही रहता है। पता नही घर
में पीने का पानी भी हो या नहीं।
जब
दोपहर के वक्त काम वाली बाई आयी तो तभी उन्हें सूझा कि इसे भेज कर सही
बात का पता लगाया जा सकता है। लेकिन इसे विश्वास में कैसे लिया जाये।
कैसे बताया जाये कि सामने की बाल्कनी वाला आदमी आज बीमारी की हालत में
अस्पताल से वापिस आया है और उसे मदद की जरूरत है। काफी उधेड़बुन के बाद
जब उनसे रहा नहीं गया तो आखिर उन्हें बाई को विश्वास में लेना ही पड़ा।
एक मनगढ़ंत किस्सा बताया कि जब टैक्सी वाला उन्हें ऊपर छोड़ कर वापिस आ
रहा था तो वे उस वक्त बाजार से लौट रही थीं। टैक्सी वाल किसी को बता
रहा था कि साहब बहुत बीमार हैं और उनकी देखभाल करने वाला कोई भी नहीं
है। तू जा कर देख कर आ ना बेचारे को,
शायद
दवा वगैरह की जरूरत हे। बाकी बात बाई ने खुद ही संभाल ली -
“हमें
मालूम है मेमसाब,
वो
बहुत शरीफ़
आदमी
है। कई दिन से बहुत बीमार है बेचारा। अकेला रहता है। कोई नहीं है
दुनिया में उसका। खाना भी होटल में खाता है। मैं जा के देखती हूँ।”
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