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| 11.10.2007 |
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क्या आप
ग्रेसी राफेल से मिलना चाहेंगे? |
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चर्चगेट। मुंबई में पश्चिमी रेलवे में उपनगरीय ट्रेनों का अंतिम पड़ाव।
आप जब वहाँ पहुँचेंगे तो स्टेशन के अहाते से बाहर निकलने के लिए तीन
तरफ के लिए तीन चार रास्ते मिलेंगे। दायीं तरफ,
बायीं
तरफ और सामने नाक की सीध में। सीधे चलने पर बायीं तरफ खुलने वाला
रास्ता पश्चिमी रेलवे के मुख्यालय और फ़ांउटेन की तरफ जाता है। वहीं एक
तरफ कैमिस्ट की दुकान है,
और
स्टेशन के अहाते से बाहर आने के लिए तीन चार चौड़ी सीढ़ियाँ उतरनी पड़ती
हैं। वहीं वे आपको नज़र आयेंगी। उम्र पचपन के आस पास। बिखर हुए,
खिचड़ी बाल। रंग गोरा और चेहरा साफ। कभी वे बहुत खूबसूरत रही होंगी
लेकिन अब उनके चेहरे पर और पूरे शरीर पर लम्बी थकान की भुतैली छाया है।
साड़ी पुरानी और अक्सर थिगलियाँ लगी हुई। पैरों में प्लास्टिक की
चप्पलें। सामान के नाम पर उनके पास दो बड़े बड़े झोले हैं जिनमें पता
नहीं क्या क्या अल्लम गल्लम भरा हुआ है। पास में एक मोटा सा सोंटा।
कुत्ते भगाने के लिए। यही उनकी पूरी गृहस्थी है। पिछले बीस बरस से। और
यही उनका ठीया भी है। इतने ही बरस से। सर्दी,
गरमी,
बरसात,
कोई
भी मौसम हो,
कोई
भी समय रहा हो,
दिन
रात,
आप
उन्हें यहीं पर,
हमेशा
यहीं पर पायेंगे। अगर वे वहाँ नहीं होती तो भी उनकी खाली जगह देख कर
साफ महसूस होता है कि वे कहीं आस पास ही हैं और दो चार मिनट में ही लौट
आयेंगी। अपने ठीये पर। वैसे भी उन्हें कहीं नहीं जाना होता। कहीं भी तो
नहीं। कई बार हमारी ग़ैर मौजूदगी ही हमारी मौजूदगी की चुगली खाने लगती
है। हम किसी बंद दरवाज़े की घंटी बजाते हैं तो घंटी की आवाज़ हमारे पास
जस की तस लौट आती है और हम समझ जाते हैं कि घर में कोई भी नहीं है। और
कई बार ऐसा भी होता है कि हम घंटी बजाते ही समझ जाते हैं कि अभी थोड़ी
देर में कोई जरूर ही दरवाज़े तक आयेगा और हमारे लिए दरवाज़ा खोलेगा। कई
बार ऐसा भी होता है कि हम किसी मरीज से तीसरी चौथी बार मिलने के लिए
अस्पताल जाते हैं और उसका खाली,
साफ़
सुथरा
बिस्तर देख कर एक पल के लिए चौंक जाते हैं और तय नहीं कर पाते कि हमारा
मरीज चंगा हो कर अस्पताल से रिलीव हो गया है या इस दुनिया से ही कूच कर
गया है। हमारी असमंजस की हालत देख कर साथ वाले बिस्तर पर लेटा मरीज
हमें संकट से उबारता है कि चिंता न करें,
मरीज
घर ही गया है। हमारी साँस में साँस आती है और हम वहाँ से लौट आते हैं।
तो
मैं बात कर रहा था मिसेज़ ग्रेसी राफेल की। मिसेज़ ग्रेसी राफेल लगभग बीस
बरस पहले जब पागल खाने से छूट कर आयीं थीं तो उनके सामने पूरी दुनिया
थी लेकिन ऐसी कोई भी जगह नहीं थी जिसे वे अपना घर कह कर साधिकार जा
सकतीं। रही भी होंगी ऐसी जगहें कभी,
तो वे
भी उनकी अपनी नहीं रही थीं। उनके दिमाग से सब नाम,
रिश्ते,
घर,
मकान,
शहर
धुल पुंछ चुके थे और जो बाकी बचे भी थे,
वहाँ
उन्हें जाना नहीं था। आखिर वहीं से तो वे पागल खानों में भेजी गयी थीं।
पता नहीं,
वे भी
बचे थे या नहीं। अब उनके सामने पूरी दुनिया थी और अपना कहने को कोई भी
नहीं था।
पागल
खाने से बाहर आयी ठीक ठाक औरत कहाँ जाती और किसके पास जाती। सचमुच पागल
होती तो सोचने की जरूरत ही नहीं थी,
लेकिन
वे पूरे होशो हवास में थीं और जानती थीं कि वे औरत हैं,
अकेली
हैं,
अभी
जवान हैं और बेसहारा हैं। शुरू शुरू में सुरक्षित और स्थायी ठीये की
तलाश में इधर उधर भटकती रहीं। उस समय उनकी उम्र पैंतीस के आस पास थी।
अलग अलग पागल खानों में सात आठ बरस गुजारने के बाद और तथाकथित रूप से
पागल करार दिये जाने के बावजूद उनमें इतनी समझ बाकी थी कि वे कहीं भी
रहें,
दिन
तो कैसे भी करके गुजारा जा सकता था लेकिन लावारिस,
अकेली
और जवान औरत के लिए घर से बाहर कहीं भी,
खुली
जगह में और सार्वजनिक जगह पर रात गुजारना कितना मुश्किल और संकटों से
भरा और असुरक्षित हो सकता है,
वे इस
बारे में सतर्क और सचेत होने के बावजूद भटकती रही थीं। सब जगह ए ही डर
था। वे कहीं भी सुरक्षित नहीं थीं। जुबान तो वे कब से खो चुकीं थीं। वे
अकेले के बल बूते पर इस मोर्च
पर
कुछ भी नहीं कर सकती थीं। वे कई दिन तक इधर उधर डरी सहमी बिल्ली की तरह
भटकती रहीं थीं। अलग अलग ठिकानों पर गयी थीं। धर्मशालाओं में,
स्टेशनों के प्लेटफार्मों
पर
लेकिन कहीं भी वे अपने आपको सुरक्षित नहीं पा सकी थीं। सब जगह देह
नोचने और फाड़ खाने वाले ही तो थे। मौका मिलते ही अपने और उनके कपड़े
उतारने लगते थे। ऐसे लोगों के लिए पागल,
गरीब,
बीमारी,
बच्ची,
बूढ़ी
किसी में तब तक फर्क नहीं था जब तक वह मादा हो नरपशु
को
तथाकथित यौन सुख देने कि स्थिति में हो। पागल और भूखी मादा तो उनके लिए
और भी बेहतर थी क्योंकि उसका विरोध का स्तर उसे दो रोटी देकर बंद किया
जा सकता था। जहाँ लोग बीमार,
अपने
तन की हालत से बेसुध नंगी घूम रही पागल औरत तक को नहीं बख़्शते थे और दो
रोटी के लालच में उनके साथ पशुवत कुकर्म
करके
उन्हें गर्भवती तक बना डालते थे,
मिसेज़
राफेल तो फिर भी जवान खूबसूरत थीं। लोग उनके पीछे कुत्तों की तरह जीभ
लपलपाते घूमते रहते। वे सुरक्षित नहीं थीं। कहीं भी नहीं। औरतों में
बेशक एक प्राकृतिक जन्मजात गुण होता है कि किसी भी तरह के शारीरिक यौन
हमले के संकेत उन्हें पहले से ही मिलने शुरू हो जाते हैं और वे सतर्क
हो जाती हैं। पागल की सी हालत में होने के बावजूद सबसे बड़ी खिलाफ सबसे
बड़ी बात यह थी कि वे औरत थीं,
जवान
थीं,
अकेली
थीं और हर समय घर से बाहर थीं,
असहाय
थीं,
और इन
सारी चीजों के चलते यह मान लिया जाता था कि वे पुलिसवालों के लिए,
चोर
उचक्कों के लिए,
प्लेटफार्मों
पर
सोने वालों के लिए,
कुलियों,
उठाईगीरों के लिए,
निट्ठलों के लिए सर्वसुलभ थीं। वे रात भर सहमी सहमी गठरी बनीं जगती
रहतीं और एक जगह से दूसरी जगह,
शहर
दर शहर भटकती फिरीं थीं।
और
आखिर उन्हें यही जगह मुफीद लगी थी। इसका कारण यह था कि चर्चगेट स्टेशन
लगभग रात एक डेढ़ वजे तक जागता रहता था और दो ढाई घंटे की कच्ची पक्की
नींद लेकर साढ़े
तीन
बजे तक सवेरे की सवारियाँ उठाने के लिए फिर जाग जाता और अपने काम धाम
पर लग जाता था। वे अपने आपको यहाँ काफी हद तक महफूज़ समझ सकती थीं। बेशक
शुरू शुरू के कई बरस तक वे यहाँ भी लगातार डरी हुई हालत में रात भर
दुबकी बैठी रहती थीं। उस पर भी उन्हें चैन न लेने दिया जाता। वहीं खुले
आसमान के तले रहने को अभिशप्त बूट पालिश वाले,
निठल्ले सारी रात उन्हें परेशान करते,
उनका
सामान बिखेर देते,
लालच
देते,
धमकियाँ देते,
मारते,
उन पर
पानी गिरा देते,
उनका
सारा समान कई कई बार गायब कर देते,
इधर
उधर फेंक आते,
रेलवे
रिज़र्व पुलिस वाले उन्हें बचाने के बजाये आये दिन उन्हें वहाँ से खदेड़
देते,
या
थाने ले जाने के बहाने उन्हें अंधेरे कोनों में ले जाने की फ़िराक़ में
रहते ताकि बहती गंगा में
खुद भी हाथ धो सकें। वे अपना सारा का सारा ताम झाम उठाये अपने आपको
बचाने की हर चंद कोशिशें करतीं। उन्हें गालियाँ देतीं,
शोर
मचातीं और उनके आगे हाथ पैर जोड़तीं। सुनवायी कहीं नहीं थी। पुलिस
वालों के जाते ही हौले हौले वहीं आ बैठतीं। शुरू शुरू में उन्हें सताने
का आलम यह था कि उठाईगीरे उनका समान उठा न ले जायें
इस डर से उन्हें स्टेशन पर ही बने बाथरूम तक जाने के लिए दो चार
मिनट के लिए ही सही,
अपना
सारा सामान अपने साथ ढो कर बाथरूम तक ले जाना पड़ता। बेशक वे खुद भी
नहीं ही जानती होंगी कि इन बड़े बड़े थैलों में क्या भरा हुआ है और कब
से भरा हुआ है। काम का है भी या नहीं,
लेकिन
अब ये सब उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुका है।
बाद
में बाथरूम की भंगिनों ने जब उन्हें पहचान लिया और उनके अस्तित्व को
वहाँ स्वीकार भी कर लिया तभी जा कर उनकी समस्याएँ कुछ हद तक कम हुई
थीं। और इस बात में ही कई बरस बीत गये थे कि उन्हें चर्चगेट पर स्थायी
रूप से रहने वाले लोगों के बीच नागरिकता दे दी गयी थी और लोग बाग उनकी
मौजूदगी को सहज रूप से स्वीकार कर पाये थे। कई बार हमें पूर उम्र लग
जाती है अपने अस्तित्व को स्वीकार करवाने में। हम मौजूद होते हैं लेकिन
देखने,
जानने
और महसूस करने के बावजूद हमारी मौजूदगी को हमेशा नज़रअंदाज़ किया जाता
है। हम हैं या नहीं हैं लोग इस बात को अपनी सुविधा के अनुसार तय करते
हैं। हमारी सारी कोशिशों के बावजूद।
वैसे
तो वे हर समय ही फ़ुर्सत में होती हैं। कभी बैठती होती हैं तो कभी लेटी,
और कई
बार सचमुच सो भी रही होती हैं। लेकिन जब वे अच्छे मूड में होती हैं,
खास
कर शाम के वक्त तो आप उन्हें कस भी सुघड़ गृहिणी की तरह,
अपने
खुद के धोये कपड़ों की तह लगाते,
हौले
हौले कुछ गुनगुनाते देख सकते हैं। उनके सारे काम,
दिनचर्या
के
सारे के सारे काम स्टेशन पर,
यहीं
पर पूरे होते हैं। वे वहीं नहाती धोती,
खाती
पीती,
सोती
जागती और अपने नित्यकर्म
निपटाती हैं। इसके अलावा तो उन्हें और कोई काम होता ही नहीं है।
यह
मुबंई की ही खासियत है कि यहाँ सारी चीज़ें एक बार तय हो जायें तो हमेशा
वैसे ही चलती रहती हैं। बिना किसी व्यवधान के। बरसों बरस। भीख या दान
या ख़ैरात देने वाले और लेने वाले भी तय हैं। लोग बरसों बरस उन्हीं
भिखारियों को या जरूरतमंदों को भीख देते चले आते हैं। लगभग उसी समय के
आस पास आते हैं,
सवेरे
ऑफ़िस जाते समय या वापिस आते समय वे रुकते हैं या गाड़ी रोकते हैं,
और
अपने तयशुदा भिखारी या जरूरतमंद को खाने के पैकेट,
बिiस्कट
के पैकेट,
वड़ा
पाव या कुछ और चुपचाप देकर आगे बढ़ जाते हैं। बिना कुछ भी बोले। ऐसा
अरसे तक चलता ही रहता है।
ग्रेसी राफेल का गुजारा भी इसी तरह से चलता है। उन्हें चाय पिलाने वाले
तय हैं। खाना खिलाने वाले तय हैं और उन्हें कपड़े लत्ते देने वाले भी
तय हैं। कुछ लोग उन्हें नकद पैसे भी दे जाते हैं। वे बरसों से वहाँ
हैं। लाखों लोग स्टेशन से रोजाना दोनों वक्त गुज़रते हैं,
उन्हें वहाँ देखते हैं। बिना आँख मिलाये या बात किये भी उनकी मौजूदगी
स्वीकार करते हैं तय यह अहसास पनपने लगता है कि हम चीजों को एक समय के
बाद जस का तस स्वीकार कर लेते हैं। ऑफ़िस जाने वाली
महिलाएँ जाते समय पुरानी साड़ियाँ,
पुराने कपड़ों,
शालों,
या
अंडर गार्मेंट्स के पैकेट उन्हें चुपचाप थमा कर आगे बढ़ जाती हैं। कोई
उनके जीवन में नहीं झाँकता और न ही किसी किस्म का सवाल ही पूछा जाता
है। बस,
मौन
की भाषा और इतना सा लेनदेन। यही सिलसिला शाम के वक्त भी चलता है।
महिलाएँ अक्सर उन्हें त्यौहार के दिनों में कोई पकवान या खाने की दूसरी
चीज़ें भी दे जाती हैं। वे ये सारी चीज़ें चुपचाप अपने पास रख लेती हैं
और देने वाले की तरफ देखती भी नहीं। किसी किस्म कोई प्रतिक्रिया नहीं।
कई बार देर रात तक उनके ठीये के पास पाव भाजी के स्टाल लगाने वाले
उन्हें पाव भाजी या वड़ा पाव वगैरह दे देते हैं या कोई ग्राहक ही उनके
लिए पाव भाजी खरीद देता है और वे खा लेती हैं। लेकिन वे न तो किसी से
कुछ माँगती हैं और न ही किसी की दी हुई चीज को ठुकराती ही हैं।
और
इसी तरह से चल रही है ज़िन्दगी ग्रेसी राफेल की। अरसे से,
निरुद्देश्य,
अर्थहीन। खाली खाली दिन,
खाली
खाली रातें,
किसी
से कोई भी संवाद नहीं,
सम्पर्क नहीं,
लेन-देन नहीं,
कहीं
आना जाना नहीं,
कोई
काम नहीं। शायद वे कभी किसी से बात करती हों,
या
कोई उनसे संवाद करता हो। वे किसी के सुख दुख में शामिल नहीं हैं और
उनके दुख?
वे तो
किसी ने जाने ही नहीं। वे कहीं भी किसी की ज़िन्दगी में नहीं हैं और न
ही उनकी ज़िन्दगी में ही कोई बचा है। वे बीस बरस से इसी तरह का जीवन
जीती चली आ रही हैं। आगे भी इसी तरह का निचाट जीवन उन्हें जीते जाना
है। बेकार सा,
बेमतलब सा और बेरौनक सा। उनकी स्मृति में कुछ भी बाकी नहीं बचा है। न
अच्छा न बुरा। जो था भी,
उसे
वे कब का भुला चुकी हैं। वे सिर्फ़
वर्तमान में जी रहीं हैं। वर्तमान भी कैसा?
जिसे
न ढोया जा सकता है न त्यागा। कितनी अजीब बात है कि दुनिया में करोड़ों
लोग बेकार की,
बेमतलब की कई बार बेहद तकलीफ भरी ज़िन्दगी जीते चले जाते हैं लेकिन जीना
छोड़ता कोई भी नहीं। जो जैसा चल रहा है,
चलने
दो,
जब तक
चलता है चलने दो। भविष्य कैसा है ये तो वे पिछले बीस बरस से देख रही
हैं। जो है,
उसमें
बेहतरी की गुंजाइश ही कहाँ बची है। उन्हें पता है कि किसी सुबह वे यहीं इसी ठीये पर मरी हुई पायी जायेंगी। बेशक उनके ठीक पास से लाखों लोग रोजाना गुज़रते हैं, काफी देर तक लोगों को पता ही नहीं चलेगा कि लेटी नहीं, वे यहाँ से हमेशा के लिए जा चुकी हैं। उन्हें पता है उन्हें लावारिस मौत मरना है। और लावारिस मरने वालों का न कोई नाम होता है न धर्म या जाति ही। बीस बरस से उन्होंने जो जगह घेर रखी है, वह जरूर खाली हो जायेगी। शुरू शुरू में आने जाने वालों को अजीब लगेगा लेकिन कुछ दिन बाद वह जगह खाली देखने की लोगों को आदत पड़ जायेगी। |
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