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11.10.2007
 

छूटे हुए घर
सूरज प्रकाश


वे महिलाएँ अपनी ज़िंदगी के सबसे कठिन दौर से गुज़र रही थीं। वे बेहद चिड़चिड़ी हो गयी थीं और हमेशा शिकायत के मूड में रहतीं। इन दिनों उनके पास बातचीत का सिर्फ एक ही टॉपिक था। इस विषय के अलावा वे न तो कुछ कहना चाहतीं, न सुनना। वे मौके या जगह की भी परवाह नहीं करती थीं, न यह देखतीं कि कोई उनका दुखड़ा सुनने के लिए तैयार भी है या नहीं। बस, उन्हें ज़रा-सी शह मिली नहीं कि उनके दर्द भरे गीत शुरू हो जाते। वे अपना दुखड़ा न भी सुना रही होतीं, तब भी लगता, वे बिसूर तो ज़रुर ही रही थीं।

इस रोने-धोने की वज़ह से उनकी सेहत खराब होने लगी थी। वे ज्यादा बूढ़ी, थकी-थकी-सी और चुक गई-सी लगने लगी थीं। उनके जीवन से बचा-खुचा रस भी विदा लेने लगा था और वे जैसे-तैसे दिन गुज़ार रही थीं। कुछ तो सचमुच ही बीमार हो गई थीं। अगर वे खुद बीमार नहीं थीं तो उनके परिवार का कोई न होई सदस्य बीमार हो गया था और वे उसी की चिंता में घुली जा रही थीं।

उनमें से अधिकतर की उम्र चालीस से पचास के बीच थी और वे मेनोपॉज के भीषण बेचैनी वाले कठिन दौर से गुज़र रही थीं, या किसी भी दिन उस दौर में जा सकती थीं। इस वज़ह से भी उनकी तकलीफें और बढ़ गई थीं। कुल मिलाकर उनके लिए ये बेहद तकलीफ  भरे दिन थे।

वैसे वे हमेशा से ऐसी नहीं थीं। वे सब की सब अच्छे घरों से आती थीं। पढ़ी-लिखी थीं। उनके स्कूल-कॉलेज जाने वाले बच्चे थे। रुतबे वाले पति थे। घर-बार थे। उनमें से कुछ के तो महानगर में खुद के फलैट्‌स भी थे। गाड़ियाँ थीं। उनके पास सुख-सुविधा का सारा सामान था। अच्छे-अच्छे गहने और ढेर सारी साड़ियाँ थीं। वे हर दृष्टि से भरपूर जीवन जी रही थीं। वे सब-की-सब अच्छा कमा रही थीं। कुछ का वेतन तो हाई फ़ोर फ़ीगर से बढ़कर फ़ाइव फ़ीगर तक पहुँचा था। और यही अच्छा कमाना उनके लिए अभिशाप बन गया था।

वैसे देखा जाए तो उनके साथ कोई ऐसी गंभीर बात नहीं हुई थी कि वे सब-की-सब सदमा लगा बैठतीं या ज़िंदगी से इतनी बेज़ार हो जातीं। लेकिन वे अपनी ज़िंदगी की पहली बड़ी परीक्षा में ही फेल हो गई थीं और उनकी यह हालत हो गई थी।

दरअसल वे सब-की-सब एक बहुत बड़े और महत्त्वपूर्ण संस्थान से जुड़ी हुई थीं। कुछ तो बहुत वरिष्ठ पदों पर भी कार्य कर रही थीं। इस संस्थान का प्रधान कार्यालय एक ऐसे महानगर में था, जिसमें वैसे तो ढेरों समस्याएँ थीं, लेकिन वहाँ रहने वाले उस महानगर को बेहद प्यार करते थे। यह महानगर उनकी शिराओं में बहता था। उनकी साँस-साँस में रचा-बसा था। इस संस्थान की शाखाएँ सभी प्रदेशों की राजधानियों में थीं। संस्थान में काम करना गर्व की बात माना जाता था, क्योंकि वहाँ बेतहाशा सुविधाएँ थीं और वहाँ नौकरी का मतलब सुखी जीवन की गारंटी हुआ करता था। महानगर में स्थापित इस प्रधान कार्यालय में काम करनेवाले कर्मचारियों में महिलाओं का अनुपात अन्य केंद्रों की तुलना में बहुत अधिक था। यह अनुपात भी एक मायने में उनके लिए अभिशाप बन गया था।

उनकी खुद की निगाह में, यह अभिशाप था - उनका ट्रांसफर। हालाँकि इस ट्रांसफर में कुछ भी नया या गलत नहीं था। संस्थान के नियम और ज़रुरतें ही ऐसी थीं। ये ट्रांसफर अरसे से होते आ रहे थे और हर बरस होते ही थे। जो अधिकारी सीधी भर्ती से आते थे, जिनमें अक्सर लड़कियाँ भी होती थीं, वे इन स्थानांतरणों को सहर्ष स्वीकार कर लेते थे, क्योंकि वे जानते थे, कैरियर की सीढ़ी लगातार चढ़ते रहने के लिए पाँच-सात ट्रांसफर तो देखने ही होंगे। फिर उनकी उम्र भी कम होती थी। वे कुछ भी कर गुज़रने के जोश से लबालब भरे होते। लेकिन समस्या उन अधिकारियों की होती जो संस्थान में ही पंद्रह-बीस बरस की नौकरी करने के बाद अधिकारी बनते थे। इनमें से भी महिलाओं के साथ ज्यादा समस्याएँ होतीं। ट्रांसफर की बारी आते-आते वे उम् के चार दशक पार कर चुकी होतीं। घर-बार सैटिल कर चुकी होतीं। जीवन में स्थायित्व आ चुका होता। बच्चे बड़ी कक्षाओं में पहुँचने को होते। लड़कियाँ होतीं तो वे अपनी उम्र के सबसे नाजुक मोड़ पर होतीं, जहाँ उन्हें पिता की नहीं, माँ की ही ज़रूरत होती। उम्र के ये दौर ही उनके लिए अभिशाप बन कर आए थे।

पिछले दो-तीन बरसों से संयोग कुछ ऐसा बन रहा था कि इन दिनों जितने भी ट्रांसफर हुए, हर सूची में इस महानगर की महिलाएँ ही अधिक रहीं, जिन्हें वरिष्ठता क्रम से बाहर भेजा जाना था। अलबत्ता, इन महिलाओं के साथ संस्थान ने इतना लिहाज ज़रुर किया था कि उन्हें निकटतम प्रदेश की राजधानी में ही भेजा था, जहाँ से वे रात भर की यात्रा करके आ-जा सकती थीं। उनकी तुलना में उनके पुरुष सहकर्मी दूर-दूर के केन्द्रों पर भेजे गए थे। इसके बावजूद ये महिलाएँ खुद को अभिशप्त मान रही थीं।

ये अभिशप्त महिलाएँ हर तरफ से घिर गई थीं। एक तरफ घर-बार था। पढ़ने और महंगी जींस पहनने वाले लड़के थे। सपने देखने वाली जवान होती लड़कियाँ थीं, जिन्हें लगातार अपनी माँओं की जरुरत थी और दूसरी तरफ इन सबकी बेतहाशा बढ़ चुकी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें नौकरी करते रहने की ज़रूरत थी। उनमें से कुछ की महिलाएँ ऐसी थीं जो, आदतवश, वक्त गुज़ारने के लिए नौकरी कर रही थीं। वे बहुत अच्छे घरों से थीं और नौकरी न करके भी अपना स्तर बनाए रख सकती थीं। बल्कि नौकरी करके वे जितना कमाती थीं, नौकरी के लिए खुद को सजाने-संवारने में उससे कहीं अधिक खर्च कर डालती थीं। कुछ ऐसी भी थीं, जिनके पति छोटी-मोटी या प्राइवेट नौकरी में थे और घर इन महिलाओं के वेतन से ही चल रहे थे। अगर नहीं भी चल रहे थे, तो भी उनकी अतिरिक्त और अच्छी-खासी आमदनी से उनके परिवार जिस तरह की सुख-सुविधाओं के आदी हो चुके थे, उन्हें त्यागने की वे लोग सोच भी नहीं सकते थे। कुछ महिलाओं ने कजे| लेकर मकान बनवा लिये थे, या गाड़ी वगैरह खरीद ली थी, जिसकी किस्तें चुकाने के लिए उनका नौकरी करते रहना ज़रूरी था। उनकी यह मज़बूरी थी कि वे अगर नौकरी छोड़ना भी चाहतीं तो भी उनका परिवार उन्हें ऐसा करने की इजाज़त नहीं देता था।

निश्चित तारीख को उन्हें रिलीव कर दिया गया था। जो हैसियत वाली थीं और शौकिया नौकरी कर रही थीं, उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी। कुछ ऐसी भी थीं जो इस उम्र में अकेली रहने की कल्पना भी नहीं कर सकती थीं, या जिन्हें डर था, उनके बिना उनका घर-बार टूट-बिखर जाएगा, उनके सामने भी नौकरी छोड़ने के अलावा और कोई रास्ता न था। कुछ घबरा कर बीमारी की छुट्टी पर चली गई थीं, तो कुछ सचमुच बीमार पड़ गई थीं। लेकिन उन्हें भी कभी न कभी तो ठीक होना ही था और नए केंद्रों पर ज्वाइन भी करना ही था।

अधिकतर महिलाओं के सामने समस्या यह थी कि वे कभी अकेली घर से बाहर निकली ही नहीं थीं। चार-पाँच साल तक घर से अलग रहने की सोच-सोच कर उनकी रुह काँप रही थी। अधिकतर परिवारों की हालत ऐसी थी कि वे बच्चों को, परिवार को, नौकरीशुदा पति को, सास-ससुर को अपने साथ नहीं ले जा सकती थीं, या वे खुद इस पक्ष में नहीं थीं कि उनकी वजह से चार-पाँच बरस के लिए पूरी गृहस्थी उजाड़ी जाये। वे गहरे असमंजस में थीं। कुछ भी तय नहीं कर पा रही थीं। ज्यादातर घरों में कई-कई दिन तक सलाह-मशविरे चलते रहे थे। आगा-पीछा सोचा गया थी और अंतत: नये केंद्र पर ड्‌यूटी ज्वाइन कर ली गई थी। उन्होंने सोचा था-पहले जाएँगी तो पहले लौटेंगी भी। रो-धो कर बाकी महिलाएँ भी वहाँ पहुँची ही थीं।

यहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई थी। वे एक तरह से बेघर हो गई थीं। यहाँ उन्हें नये सिरे से गृहस्थी जमानी थी। अपनी पहचान बनानी थी और अगले कई बरस तक अपने बिछड़े परिवार के लिए ऐशो-आराम जुटाते रहने के लिए अकेले खटना था। संस्थान उन्हें यह सुविधा देता था कि जब तक उन्हें नये केंद्र पर रहने की जगह उपलब्ध नहीं करा दी जाती, वे दो महीने तक संस्थान के खर्चे पर किसी स्तरीय होटल में ठहर सकती थीं, लेकिन उनमें से कोई भी होटल में नहीं ठहरी थी। अकेली कैसे ठहर सकती थीं। कभी ठहरी ही नहीं थीं। सबने उन्हीं महिलाओं के यहाँ डेरे डाले थे, जो उनसे पहले यहाँ आ चुकी थीं और जिन्हें फ़्लैट मिल चुके थे। दरअसल, वे आयी ही उनके सहारे थीं कि चलो, कोई तो है अपना कहने को।

वे शुरू-शुरू में आधी-अधूरी तैयारी के साथ आयी थीं। संस्थान ने फिलहाल कुछ को रहने के लिए सजे-सजाए सिंगल रूम दे दिये थे और कुछ के हिस्से में शेयरिंग आवास की सुविधा आई थी, जहाँ एक-एक फलैट में तीन-तीन, चार-चार महिलाएँ नाम-मात्र के किराये पर रह सकती थीं। तभी अचानक उन सबमें ह परिवर्तन आया था। इसे संयोग माना जाए या दुर्घटना, लेकिन जो कुछ हुआ था, उस पर विश्वास करने को जी नहीं चाहता था। ये मैच्योर और समझदार महिलाएँ, जो संस्थान में बड़े-बड़े फैसले लिया करती थीं, अकेले के बलबूते पर विभाग तक संभालती थीं, अचानक लड़ने लगी थीं। शिकायतें करने लगी थीं। जिन महिलाओं के हिस्से में सिंगल रूम आए थे, उन्हें शिकायत थी - हम कभी अकेली नहीं रही हैं। हमें डर लगता है। हमें शेयरिंग आवास दिया लाए। जिन्हें शेयरिंग आवास दिया गया था, उन्हें अपनी पार्टनर पसंद नहीं थीं। वे कभी एनसीसी के कैंपों में नहीं गई थीं। न कभी ट्रैकिंग वगैरह में ही गई थीं। उन्हें शेयर करने की आदत नहीं थी। न कमरा, न रोजमर्रा की चीज़ें और न ही प्रायवेसी। उन्होंने आज तक राज किया था अपने-अपने घरों में, बच्चों, पतियों पर, नौकरों पर। वहाँ वे मालकिन हुआ करती थीं और पूरी व्यवस्था, सेटिंग और मूवमेंट पर पूरा नियंत्रण रखती थीं। वहाँ सब कुछ उनकी इच्छानुसार हुआ करता था। लेकिन इस ट्रांसफर ने उनकी हैसियत, राजपाट और नियंत्रण का दायरा एक ही झटके में बिस्तर भर की जगह में सीमित कर दिया था। यहाँ उन्हें सब कुछ शेयर करते रहना था - किचन, ड्राइंगरूम, बाथरूम, यहाँ तक कि बर्तन भी। यहाँ हुकुम चलाने या सैट करने जैसा कुछ भी नहीं था। यहाँ न परिवार के साथ शाम की चाय थी, न पति के साथ खुसुर-पुसर। यहाँ कोई उनके आदेश पर एक गिलास पानी या चाय लाने वाला नहीं था, क्योंकि वे सब की सब वरिष्ठ अधिकारी थीं, सहकर्मी थीं। हम उम्र थीं। वे यहाँ एक-दूसरे के जूठे बर्तन माँजने तो कत्तई नहीं आई थीं।

शुरू-शुरू में उन्होंने कुछ समझौते भी किए। जिसके साथ भी ठहराया गया, ठहर गईं। मिल-जुलकर सामान भी ले आईं। एक सब्जी बना लेती, तो दूसरी फटाफट चपातियाँ बेल देती। तीसरी इस बीच सलाद बना देती। चाय के बर्तन धो देतीं। फिलहाल उनका पहला मकसद था-कम से कम खर्च में खुद गुज़ारा करके महानगर में अपने परिवार के लिए ज्यादा से ज्यादा पैसे भेजना। यहाँ आ जाने के बाद उन्हें बीच-बीच में की जाने वाली रेल यात्राओं और एसटीडी फोनों के लिए भी अतिरिक्त पैसे बचाने ही थे।

वैसे भी वे अकेले या बिना परिवार के होटलों में खाना खाने नहीं जाती थीं, बेशक शहर में अच्छे होटलों की कोई कमी नहीं थी और शहर में लोग बेहद शरीफ थे। वे अकेली औरत को देखकर लार नहीं टपकाते थे। अगर लोग शरीफ न भी होते तो भी कम से कम इन भद्र महिलाओं को, जिनकी उम्र चालीस से पचास के बीच थी और जो आजकल उदास-उदास रहा करती थीं, उनसे कोई खतरा नहीं हो सकता था। हालाँकि इन महिलाओं ने अपना सारा जीवन देश के आधुनिकतम कहे जाने वाले महानगर में बिताया था, फिर भी वे पहले घरेलू महिलाएँ थीं और बाद में आधुनिक। इसीलिए कभी-कभार होटल से खाना पैक करवा कर ले आती थीं। इसी में उन्हें सुभीता रहता था।

तो अभी जिक्र हुआ था इन महिलाओं का अचानक आम औरतों में बदल जाने का। अब सचमुच ये महिलाएँ शक्की, झगड़ालू और नाक-भौं सिकोड़ने वाली हो गई थीं, जिनकी नाक पर हर समय गुस्सा धरा रहता था। वैसे भी उन्होंने कभी ज़िंदगी में शेयर नहीं किया था, मिल-जुलकर नहीं थीं और कभी झुकी नहीं थीं। अब मामूली-सी बात को लेकर भी वे अपनी पार्टनरों से लड़ पड़तीं। बेशक यह लड़ना सार्वजनिक नल पर होनेवाले लड़ने के स्तर तक नहीं उतरा था फिर भी गुबार तो निकाला जाता ही था। वे अब इस बात पर भी आपस में बोलना छोड़ सकती थीं कि वे चप्पल पहन कर रसोई में चली आती हैं... जब मैं अखबार पढ़ रही होती हूँ तो जोर-ज़ोर से घंटी बज़ाकर आरती करती हैं... चाय के अपने जूठ कप कहीं भी छोड़ देती हैं... बाथरूम... गंदे बालों से भरी गंदी घी.. वाशबेसिन... वगैरह... वगैरह...। ऑफ़िस में बीसियों कर्मचारियों पर नियंत्रण करने वाली और महत्त्वपूर्ण फैसले लेने वाली महिलाएँ अब इस बात पर भी लड़ लेती थीं कि ड्राइंगरूम में घूम रहा तिलचट्टा कौन मारे या देर रात या अल सुबह दरवाजे की घंटी बजने पर दरवाजा कौन खोले, या फिर रोज सुबह दूध कौन ले। कई बार खर्च शेयर करने को लेकर भी पंजे लड़ जाते। ये और ऐसी ढेरों बातें थीं जिनकी वजह से इस खूबसूरत, हरे-भरे, शालीन लोगों वाले पॉश इलाके में रहने वाली ये भद्र महिलाएँ अपनी सुबह खराब करती थीं, दोपहर भर कुढ़ती रहती थीं। बेहद खूबसूरत शामों को, जब मौसम को देखकर किसी का भी मन खिल उठना चाहिए, वे या तो अपने डेरे पर आने से कतरातीं या साँझ ढले अपने-अपने दरवाजे बंद कर लेतीं। रात के वक्त जब सारा शहर उत्सव के मूड में होता, देर रात तक आवारागर्दी करता, खुशियाँ बाँटता रहता, वे बिसूरते हुए करवटें बदलती रहती थीं।

सुबह उठते समय आम तौर पर सभी पार्टनरों के चेहरों पर मुर्दनगी छायी होती और उनके सामने मनहूस चेहरों को देखते हुए एक और मनहूस दिन काटने के लिए होता। वे भारी मन से ऑफ़िस पहुँचतीं। वहाँ मन की यह भड़ास लंच टाइम में दैनिक किस्तों में अलग-अलग मेजों पर निकलती। एक ही फलैट शेयर करने वाली महिलाएँ एक ही मेज पर कभी नहीं बैठतीं। कई बार वे पहले ही फोन पर तय कर लेतीं, आज किसे अपनी रामकहानी सुनानी है। हर महिला को ही कुछ न कुछ कहना होता। उनमें से हरेक को श्रोताओं की ज़रूरत होती। अजीब हालत हो जाती। सभी बोलना चाहतीं। सुने कौन। उन मेजों पर बैठे पुरुष सहकiर्मयों के सामने वे अपनी सखियों की, दिन-रात की, खाने-पीने की साथिनों की छीछालेदर करतीं। उनके बखिए उधेड़तीं। सब की सब कोई माकूल सा कंधा तलाशते ही रोने लगती।

कई बार ऐसा भी होता कि वे आपस में सलाह-मशविरा करके अपने पार्टनर बदलने का फैसला कर लेतीं। ऑफ़िस में कह-सुनकर कागज़ी कार्रवाई करवा लेतीं। कुछ दिन तो नयी पार्टनरों के साथी ठीक-ठाक चलता, फिर वहाँ भी कही पुरानी रागिनी छिड़ जाती। फलैट बदले जा सकते थे। पार्टनर बदले जा सकते थे, लेकिन जो चीज़ कोई नहीं बदल सकता था, वह था उनका खुद का स्वभाव, जिसके बारे में उनमें से कोई भी नहीं जानता था कि उसे बदल देने भर से सारी समस्याएँ खुद-ब-खुद सुलझ जाया करती हैं। वे खुद को बदलने के बारे में सोच भी नहीं सकती थीं।

इनकी तुलना में कुछ सौभाग्यशाली महिलाएँ ऐसी भी थीं जिन्हें वरिष्ठता क्रम से पूरा फलैट मिल गया था। लेकिन खुश वे भी नहीं थीं। जिन्हें ये फलैट लीज़ पर लेकर दिए गए थे, उन्हें भी ढेरों शिकायतें थीं - फलैट दूर है... गंदा है... पड़ोस खराब है... धूप बहुत आती है... धूप नहीं आती... फलैट ग्राऊँड फ्लोर पर है.. नहीं है... सुरक्षित नहीं है। लड़-झगड़ कर अपने लिए अलग फलैट ले लेने के बाद भी वे वहाँ अकेली नहीं रहती थीं। उन्हें डर लगता था, महंगा भी पड़ता था। अकेले वक्त भी नहीं गुज़रता था। यहाँ उन्हें एक सुविधा ज़रुर थी कि अपनी मर्जी से पार्टनर रख और बदल सकती थीं। इसके बावजूद खुश वे भी नहीं थीं।

इनकी तुलना में कुछेक महिलाओं ने इन सारी समस्याओं का एक अलग ही हल खोज लिया था। वे अपने एकाध बच्चे को अपने साथ ले आई थीं और वहीं उसका एडमिशन करवा दिया था। उनके लिए कुछ हद तक जीवन सार्थक बन गया था। वक्त तो अच्छी तरह गुज़रता ही था, यह तसल्ली भी रहती कि बच्चे को अपनी निगरानी में पाल-पोस रही हैं।

ये अकेली, परिवार से बिछुड़ी महिलाएँ महानगर जाने का कोई मौका नहीं छोड़ती थीं। छुट्टियों की सूची मिलते ही वे साल भर का शेड्‌यूल बना लेतीं, कब-कब जाया जा सकता है। किसी नेता वगैरह के मरने पर होने वाली छुट्टी उनके लिए बोनस की तरह होती। कुछ तो बिला नागा हर शनिवार की रात की गाड़ी से जातीं, दिन भर वहाँ खटतीं, घर-परिवार की पटरी से उतरी गाड़ी संवारतीं और रात की  ट्रेन से लौट आतीं। उनके पास हर वक्त अगले कई हफ़्तों के आने-जाने के कन्फ़र्म टिकट होते।

कई बार वे एक दिन के लिए जातीं और महीनों नहीं लौटती थीं। बीमार पड़ जातीं या बीमारी की छुट्टी ले लेतीं। ऐसे में उनकी कन्फ़र्म टिकटों पर उनकी हमउम्र सहेलियाँ यात्रा करतीं। उनके छुट्टी पर बैठ जाने से ऑफ़िस के कामकाज का नुकसान होता था, लेकिन वे परवाह नहीं करती थीं। उनका कहना था-हमारी ही कौन परवाह करता है। इन महिलाओं में कुछ ऐसी भी थीं जिन्होंने विवाह नहीं किया था और महानगर में अकेली रहती आई थीं। वे भी बिला नागा महानगर आती-जाती रहतीं, क्योंकि महानगर उनकी हर धड़कन में इतना रचा-बसा था कि उसे बार-बार देखे बिना उन्हें चैन नहीं पड़ता था। जब तक वे वहाँ जाकर वहाँ की हवा की साँस नहीं ले लेतीं थीं, उन्हें ऊर्जा नहीं मिलती थी।

कुछ ऐसी भी रहीं जिन्होंने यहाँ आने के बाद परिस्थितियों से घबरा कर नौकरी छोड़ दी थी, जबकि कुछ इस इंतजार में थीं कि कब वे स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवश्यक वर्ष पूरे करें और घर बैठें। जो यहाँ कई बरस पहले आई थीं, वे किसी भी दिन लौटने की आस लगाए बैठी थीं। वे हर दिन प्रधान कार्यालय से आने वाली डाक का इंतज़ार करतीं। उनकी हालत लेट चल रही ट्रेन के इंतज़ार में प्लेटफार्म पर बैठे यात्रियों जैसी थी। वे अरसे से आधे घंटे के नोटिस पर शहर छोड़ने की तैयारी किए बैठी थीं। इंतज़ार था कि खत्म नहीं होता था।

उधर कुछ महिलाओं के यहाँ ले आने से उनके घर-परिवार वाले गंभीर रूप से बीमार हो गए थे या दिल हार बैठे थे। ऐसी महिलाओं को एक विशेष मामले के रूप मे, एक वर्ष के लिए उन्हीं के खर्च पर वापस भिजवा दिया जाता था। यह अवधि बढ़ाई नहीं जाती थी, अलबत्ता, उस हालत में कम ज़रुर कर दी जाती थी, जब मरीज ही उससे पहले चल दे। यानी महिलाओं का विशेष मामले पर लौटने का आधार ही न रहे। संस्थान इसी लिखित शर्त पर उन्हें भेजता था। इसी के साथ एक और शर्त नत्थी कर दी जाती थी कि साल भर बाद, या उससे पहले, जैसी भी स्थिति हो, उन्हें किसी और केंद्र पर भी भेजा जा सकता था। सशर्त वापसी का लाभ उठाने में आमतौर पर महिलाएँ डरती थीं। हाँ, अगर उन्होंने ठान ही लिया हो कि साल भर बाद नौकरी छोड़नी है, तो वे किसी न किसी तिकड़म से किसी की बीमारी का बहाना लेकर एक बरस के लिए लौट आतीं और जब बाद में उन्हें कहीं और भेजा जाता तो वे नौकरी छोड़ देती थीं। इस तरह वे अपने परिवार के पास एक बरस पहले पहुँच जाती थीं।

कुल मिलाकर ये सारी भद्र महिलाएँ बहुत मुश्किल से अपने दिन गुजार रही थीं। यह शहर बेहद खूबसूरत था, सांस्कृतिक गतिविधियों की कोई कमी नहीं थी। अच्छे पुस्तकालय थे, घूमने-फिरने की जगहें थीं, लेकिन चूँकि उन्हें लगातार अपने बिछुड़े घर की याद आती रहती थी, उन्हें यहाँ कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी सिर्फ घर और परिवार ही जाना था, इसलिए वे लिखने, पढ़ने, घूमने या जीने जैसा कुछ सोच ही नहीं पाती थीं। उन्होंने इतने बरसों में इस शहर को ढंग से देखा भी नहीं था, क्योंकि उनकी आँखों के आगे हर वक्त महानगर और उसमें अपना परिवार झिलमिलाता नज़र आता रहता था। वैसे तो इस बात पर भी बहस की जा सकती थी कि उन्होंने अपना महानगर ही कितना देखा या जाना था। छुट्टी के दिन उनके लिए बहुत भारी गुज़रते थे। कुछ भी तो करने के लिए नहीं होता था। अगर शेयरिंग पार्टनरों से बातचीत बंद हो तो और भी तकलीफ़ होती थी। दिन गुज़रे नहीं गुज़रता था। कभी-कभार ही ऐसा हो पाता था कि वे मनमुटाव भुलाकर, मिलजुल कर खाने का प्रोग्राम बनाएँ, या कहीं शॉपिंग पर जाएँ। वैसे वे एक-दूसरे से मिलने दूसरे फलैटों में भी चली जाती थीं।

उनमें से कुछ को संस्थान के काम से आसपास के शहरों में निरीक्षण के लिए जाने की ज़रूरत पड़ती थी। कभी-कभी ये निरीक्षण इस तरह के पिछड़े या दूरदराज के इलाकों में होते, जहाँ रहने-खाने की तकलीफ होती। ऐसे निरीक्षणों पर जाने से वे भरसक बचतीं। कभी पूरी टीम में अकेली महिला होने के बहाने से, तो कभी किसी अन्य कारण से। ऐन वक्त पर उनके मना कर देने से या बीमारी की छुट्टी लेकर बैठ जाने से निरीक्षण का सारा शेड्‌यूल बिगड़ जाता। लेकिन अगर निरीक्षण के लिए महानगर की दिशा में जाना होता तो वे हर हाल में टीम में अपना नाम शामिल करवाने की जुगत भिड़ातीं। लल्लो-चप्पो करतीं। अगर निरीक्षण लंबा हुआ तो बीच की छुट्टियों में या रविवार को, दो-तीन घंटे की यात्रा करके चुपचाप महानगर होकर आया जा सकता था। विपरीत दिशा में कोई जाना न चाहती और महानगर की दिशा के लिए मारा-मारी होती।

वे हमेशा अफवाहों से घिरी रहतीं, एक-एक से उनकी सच्चाई के बारे में पूछती फिरतीं। कभी खबर उड़ा देतीं-नयी ट्रांसफर पालिसी आ रही है तो कभी कहतीं-गोल्डन हैंड शेक स्कीम आ रही है, जिसमें संस्थान इच्छुक कर्मचारियों को ढेर सारा रुपया देकर सेवानिवृति करेगा। महानगर के प्रधान कार्यालय से कोई भी वरिष्ठ अधिकारी आता तो वे उससे मुलाकात के लिए समय जरुर माँगतीं। अपने दुखड़े रोतीं... जवान लड़कियाँ... बिगड़ते बच्चे... पति बीमार... शादियाँ... पढ़ाई .. खुद की बीमारी... मेनोपॉज। ज्यादा रोना वे इसी का रोतीं। एक बार तो एक वरिष्ठ अधिकारी ने उन्हें मुलाकात का समय तो दिया, लेकिन साफ-साफ कह दिया था-आपके पास वापस जाने के लिए मेनोपॉज के अलावा और कोई कारण हो तो बताएँ। सिर्फ इसी वज़ह से तो आपको ट्रांसफर नहीं किया जा सकता।

यहाँ रहते हुए इन लोगों के साथ कुछ दुर्घटनाएँ भी हो गई थीं। इससे इनके हौसले और मंद हो गए थे। एक महिला कॉलेज जाने वाली अपनी अति सुंदर लड़की को साथ लेकर आयी थी कि कामकाजी पति अकेले उसका ख्याल नहीं रख पाएँगे। एक-दो साल तक सब ठीक चलता रहा था। माँ-बेटी एक दूसरे का सहारा बनी रही थीं। बेटी ने माँ से अपने से सहपाठी का जिक्र किया था। उससे मिलवाया भी था। लेकिन विजातीय और बेरोजगार लड़के को माँ ने पहली ही नज़र में ­ठुकरा दिया था। बेटी को चेताया भी था-उससे मेल-जोल न रखे।

इधर माँ एक ट्रेनिंग पर बाहर गई, उधर लड़की ने उसी लड़के से ब्याह रचाया, चाबी पड़ोस में दी और हनीमून पर निकल गई।

माँ को इतना सदमा लगा था कि वह नौकरी ही छोड़ गई थी। जिसके लिए सब कुछ कर रही थी वही दगा दे गई, अब किसके लिए कमाना-धमाना। पति की निगाहों में कसूरवार भी वही बनी थी कि लड़की को संभाल नहीं पाई।

एक अन्य महिला अधिकारी के पति का महानगर में चक्कर चलने लगा था। इससे पहले कि मामला कोई निर्णायक मोड़ लेता, वह बोरिया-बिस्तर समेट कर लौट गई थी और वहाँ से इस्तीफा भेज दिया था। इन दो-एक मामलों से ये महिलाएँ काफी विचलित हो गई थीं।

ऐसा नहीं था कि लगभग इन्हीं कारणों से अपना परिवार पीछे छोड़कर आए उनके पुरुष सहकर्मी उनसे कम परेशान थे। तकलीफें उन्हें भी होती थीं। लेकिन वे अपनी तकलीफों का इतना सार्वजनिक नहीं करते थे कि उनके प्रति बेचारगी का भाव उपजे। वैसे उनके पास खुद को भुलाए रखने या व्यस्त रहने के जरिए भी ज्यादा थे। उनके पास ताश थे, खाना और पीना था, फिल्में थीं। घूमना-फिरना था। किताबें थीं। ठहाके थे और बहसें थीं। वे कभी भी किसी भी दोस्त के घर जाकर महफ़िल जमा सकते थे। वहाँ रात गुज़ार सकते थे। देर तक सड़कों पर आवारागर्दी कर सकते थे। इन सब कामों में उनकी ईगो कभी आड़े नहीं आती थी।

कई बार वे अपनी महिला सहकiर्मयों को छेड़ते-जिन चीज़ों पर आपका बस नहीं है, उसके लिए क्यों अपनी सेहत खराब कर रही हैं। तनाव में रहने से क्या जल्दी ट्रांसफर हो जाएगा। वे उन्हें समझाते भी और उन पर हँसते भी थे- हमें ही देख लो। परिवार से अलग है तो भी खा-पी रहे हैं। हर वक्त मस्ती के मूड में रहते हैं। कभी चुपके से अपने घर जाकर तो देखो तुम्हारे पति और बच्चे तुम लोगों के बिना कितना सहज और खुला-खुला महसूस कर रहे होंगे, बल्कि आप लोगों के वहाँ पहुँचने पर बाल-बच्चे पूछते होंगे-आप कितने दिन की छुट्टी पर आई हैं, लेकिन उन पर इन सारी बातों का कोई असर नहीं होता था। उनका एक ही जवाब रहता-आप पुरुष हैं। हम लेडीज़ की तकलीफ कैसे समझेंगे। आपके साथ इतनी जिम्मेदारियाँ होतीं तो पता चलता।

बहरहाल ये बहसें चलती रहती थीं। एक के बाद एक बरस बीतते रहते थे। जैसे-जैसे उनके घर से दूर रहने की अवधि बढ़ती जा रही थी, ये महिलाएँ घर की चिंता में और दुबली होती जा रही थीं। घर जो पीछे छूट गया था, लेकिन दिलो-दिमाग में लगातार बना रहता था। वे उसे दूर से ही जकड़े हुए थीं। वे वहाँ जल्द-से-जल्द पहुँच कर उसे अपने नियंत्रण में ले लेना चाहती थीं। उनके लिए एक-एक पल भारी पड़ रहा था।

दूसरी तरफ, उनकी गैर-मौजूदगी में आमतौर पर घरों को कुछ भी नहीं हुआ था। न दीवारें दरकी थीं, न किसी के सिर पर छत ही गिरी थी। सभी घर जस के तस खड़े थे, बल्कि पहले की तुलना में आत्मनिर्भर और हर लिहाज से मजबूत। इन बरसों में पढ़ने वाले बच्चे कॉलेजों में जा पहुँचे थे या नौकरी वगैरह पर भी लग गए थे, शादियाँ भी कई बच्चों की हुई ही थीं इस बीच। अमूमन सभी घर इन महिलाओं की गैर-मौजूदगी में, लेकिन उनसे मिलने वाले पैसों की मदद से, कुछ भी मिस नहीं करते थे, वे परिस्थितियों के अनुकूल जीवन जीने लगे थे। उन घरों को इन महिलाओं-जो पत्नी, माँ, बेटी, बहन, कुछ भी हो सकती थीं, की ज़रूरत तो थी, लेकिन ये अब उन लोगों की दिनचर्या का, आदत का हिस्सा नहीं रही थीं। वे इनके लिए परेशान होते थे लेकिन व्याकुल नहीं होते थे।

वक्त गुज़रता रहा था।

तभी एक दिन दो समाचार सुनने को मिले थे। एक शुभ और दूसरा खराब। अच्छी खबर यह थी कि एक लंबे अरसे के बाद ये सारी महिलाएँ स्थानांतरित होकर महानगर वापस लौट रही थीं।

दूसरी, उदास कर देने वाली खबर यह थी कि उनके स्थान पर लगभग उतनी ही महिलाएँ स्थानांतरित होकर बाहर जा रही थीं। इस बार, पास और दूर के सभी केंद्रों पर।



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