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| 08.13.2007 |
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“
विवाह सार्वजनिक जीवन से निर्वासन न बने तो स्त्री इतनी दयनीय न रहेगी
”
--- –महादेवी वर्मा सुप्रणीति वरेण्या पिछले अंक से आगे (भाग-२) |
|
२
आधुनिक
वर्ग की नारियों को महादेवी तीन वर्गों में बाँटती हैं : पहली वे,
जिन्होंने राजनैतिक आंदोलनों को बढ़ाने के लिए पुरुषों की सहायता की, दूसरी
वे, जो समाज की त्रुटियों का समाधान न पाकर अपनी शिक्षा व जागृति को ही
आजीविका का साधन बना लेती हैं और तीसरी वे सम्पन्न महिलाएँ जो थोड़ी- सी
शिक्षा के रहते पाश्चात्य शैली की सहायता से अपने गृहजीवन को नवीन रंग देती
हैं।
आधुनिक
महिलाओं को प्राचीन विचारों में जकड़ा पुरुष अवहेलना की दृष्टि से देखता है
और जो आधुनिक सोच रखते हैं, वे
भी
समर्थन
करके कोई क्रियात्मक सहायता नहीं करते और उग्र विचारधारा रखने वाले
प्रोत्साहन देकर भी उन्हें अपने साथ ले चलने में झिझकते हैं। महादेवी के
अनुसार आधुनिक नारी जितनी अकेली है, उतनी प्राचीन नारी नहीं, क्योंकि
“उसके
पास निर्माण के उपकरण-मात्र हैं, कुछ भी निर्मित नहीं।“
जिन
महिलाओं ने राष्ट्रीय आंदोलनों में भाग लिया, बलिदान – त्याग किए, जागृति
की ओर बढ़ीं, उन्हें स्त्री के दुर्बल प्रतीत होते रूप को किसी सीमा तक
समाप्त करने में सफलता मिली। परंतु इन आंदोलनों में शिक्षिताओं के साथ अनेक
अशिक्षिताएँ भी थीं, जिनके बौद्धिक विकास पर किसी का ध्यान ही नहीं गया।
शायद यहीं जागृति फैलने से मिले मधुर फल में कड़वाहट भी आ गई क्योंकि इन
आंदोलनों से उपजी कठोरता उनके बाह्यजीवन के साथ उनके गृहजीवन को भी
प्रभावित करने लगी।
स्त्रियों
को कठोर परिस्थितियों का सामना करने के लिए कठोरता अपनानी पड़ी और इससे उनकी
कोमलता
नष्ट हो गई। जो स्त्रियाँ विचारशील न थीं उन्हें अपने स्त्रीत्व पर कम और
संघर्ष तथा विद्रोह पर अधिक भरोसा था। संघर्ष मानव के आदिकाल से ही चला आ
रहा है। इतने युगों में यदि मानव द्वारा कुछ सीखा न गया है, तो वह है जीने
की कला। जिसको सीखकर एक व्यक्ति का जीवन पूर्ण है, परंतु उसके बिना केवल एक
संघर्षपूर्ण जीवन अपूर्ण ही है। नाश करते संघर्ष से स्वयं को बचा, विकास के
लिए संघर्ष की ओर बढ़ना ही जीने की कला है।
प्रगति के
दौरान विपरीत परिस्थितियों को भी अपने अनुकूल बनाना पड़ता है, किंतु सामाजिक
जीवन में विविधताएँ हैं और इन्हीं के कारण महिला कभी समय-समय पर उन्हें
अपने अनुकूल नहीं बना पाई। इस युग की महिला की दृष्टि भी वातावरण तथा
परिस्थिति नहीं देख पा रही, जबकि मार्ग में कई बाधाएँ हैं। अपने गृह बंधनों
के विरुद्ध कदम उठाती आधुनिक महिलाएँ बाहर त्याग और बलिदान के लिए प्रस्तुत
थीं। घर में उनसे
त्याग की माँग भी हद पार कर गई और वे भी समझ गईं कि इस अस्वेच्छा से किए गए
त्याग को कभी दान का सम्मान नहीं मिलेगा।
स्त्री
समाज की
समस्याओं का हल निकालने की जिम्मेदारी आज की शिक्षित स्त्री पर है। स्त्री
द्वारा विरोध को भावी समाज के
बेहतर
अस्तित्व के लिए अपना लक्ष्य बनाना और पुरुष द्वारा समझौते
को
अपनी
पराजय समझना, दोनों ही हानिकारक हैं। नारी को क्रांति के लिए एक स्वस्थ
सृजन में अपनी ऊर्जा लगानी चाहिए, ध्वंस में नहीं।
’घर और
बाहर’ की समस्याओं और परिस्थितियों का अवलोकन करते हुए महादेवी समय के साथ
बदली स्थितियों पर नज़र डालती हैं। पहले घर की दीवारों में स्त्री का बंद
होना निश्वित था, आज वहाँ थोड़ा सुधार है। आज महिलाओं के लिए बाहर का
कार्यक्षेत्र भी उतना ही आवश्यक बन गया है। आज शिक्षित महिलाएँ घर और बाहर
के जीवन में सामंजस्य बिठाने का प्रयत्न कर रही हैं। ऐसी शिक्षित महिला का
मिलना आज दुर्लभ है जो केवल घर के कामकाज कर संतुष्ट हो। आज की युवा पीढ़ी
वर्षों से चले आ रहे रीति-रिवाज़ों पर भी प्रश्न उठाती है, तर्क और उपयोगिता
के संदर्भ में सफल प्रमाणित बात पर ही विश्वास करती है। इसी तरह सदा घर में
बैठकर काम करती महिला की छवि पर भी प्रश्नचिह्न लग गए हैं और शिक्षित
महिलाओं ने इसे अस्वीकार कर बाह्य जगत में भी अपनी कार्य कुशलता का सुंदर
परिचय दिया है। ऐसे समय में महिलाओं को इस घर-बाहर के द्वन्द्व में
सामंजस्य बिठाने में समय लगेगा।
घर के
वातवरण में ठहराव और निश्चयता तब है जब गृहिणी की परिस्थिति समझी जाए और
उसके साथ सहानुभूति रखी जाए। बाहर समाज के वातावरण में भी तभी तक सामंजस्य
है जब तक स्त्री-पुरुषों के कर्तव्यों में सामंजस्य है। वर्तमान काल में कई
क्षेत्र स्त्री-सहयोग की उतनी ही अपेक्षा
रखते हैं जितनी पुरुष के सहयोग की। कई
ऐसे भी क्षेत्र हैं जहाँ पुरुष के सहयोग से अधिक स्त्री की स्नेहपूर्ण
सहानुभूति की आवश्यकता है। उनमें से एक कार्यक्षेत्र शिक्षा का है जहाँ
कितने ही बच्चों को विद्यार्जन का सुअवसर मिलता है। विद्यालयों में कठोर और
निष्ठुर मास्टरों और अनुभवहीन कुमारियों के व्यवहार से बच्चों
के
सुकोमल मन पर जितना बुरा असर पड़ता है, वहीं एक समझदार सुलझी शिक्षित स्त्री
अपने स्नेह से उनके उज्ज्वल
भविष्य की नींव रख सकती है। बच्चों की मानसिक शक्तियाँ स्त्री के मातृत्व
स्नेह से अधिक परिपूर्ण होती हैं।
मनुष्य को
सामाजिक प्राणी होने के नाते, समय-समय पर अपने स्वार्थ को भुलाकर समाज के
लाभ के बारे में भी सोचना पड़ता है। समाज के प्रति सहयोगपूर्ण दृष्टिकोण
रखने का गुण बचपन में ही पैदा होता है। यदि बच्चे को अन्यों से अलग-थलग कर
रखा जाए तो वह अवश्य ही आगे चलकर स्वार्थी और आत्मकेंद्रित बन जाएगा। तभी
बड़े आदमियों के बच्चों में यह नैसर्गिक गुण नहीं पैदा होता। उन्होंने बचपन
में दूसरे बच्चों के साथ धूल-मिट्टी, हवा का आनंद ही नहीं लिया होता, फिर
उनमें वह भाव कैसे उत्पन्न हो जो सामान्य बच्चों में एक-दूसरे के लिए और
भविष्य में समाज के लिए पैदा होता है।
माता का
स्वाभाविक स्नेह भी सीमित नहीं होना चाहिए कि वह मात्र अपनी संतान के लिए
स्नेहमयी बनी रहे और दूसरी स्त्री की संतान के प्रति निष्ठुर।
किशोरावस्था में कदम रख चुकी कन्याओं की शिक्षा के लिए ऐसी अनुभवी महिलाओं
की आवश्यकता होगी जो उन्हें गृहस्थ जीवन और गृहिणी के गुणों के बारे में
उचित शिक्षा दे सकें। आजकल शिक्षा के क्षेत्र में अनेक ऐसी महिलाएँ उतर आयी
हैं जो अपनी संस्कृति और गृह-जीवन से अनभिज्ञ हैं। फलस्वरूप विद्यार्जन
करती युवतियों
को अविवाहित जीवन अधिक आकर्षक लगता है (जिसका आकर्षण असली रूप में उतना
सुंदर नहीं है)। वे अपने स्वच्छंदता के स्वप्न को समाप्त नहीं करना चाहतीं।
कोई भी पुस्तक उन्हें गृहस्थ जीवन के सच्चे रूप का उतना दर्शन नहीं करा
सकती जितना एक महिला का जीता-जागता उदाहरण।
आजकल ऐसी
शिक्षित महिलाएँ कम मिलती हैं जो घर के लिए उतनी ही उपयोगी सिद्ध हों जितना
वे बाहर कार्यक्षेत्र में होती हैं, लेकिन यह कथन सत्य है कि समाज ने उनकी
शक्तियों को नष्ट करने की भरपूर कोशिश की है। यदि शिक्षा जैसे विभिन्न
विषयों में वे कार्यरत हैं तो घर उन्हें स्वीकार नहीं करता। वे कार्य तभी
कर सकती हैं जब आजीवन संतान और गृहस्थी के सुख के बारे में
सोचें तक नहीं। विवाह के बाद पुरुष की प्रतिष्ठा की दर्शिनी बनने वाली
महिला अपनी इस बेढंगी छवि से आहत है, यह स्वाभाविक भी है। इसी तरह के कितने
ही कारणों का परिणाम है कि आज की युवतियाँ विवाह से विरक्त हो रही हैं।
आधुनिक और
शिक्षित महिला अच्छी गृहिणी नहीं बन सकती, यह एक ऐसी धारणा है जो पुरुष ने
स्वयं को केंद्र में रख कर बना दी है, स्त्री की कठिनाइयों पर ध्यान देकर
नहीं। पुरुष के जीवन में विवाह के बाद भी कोई परिवर्तन नहीं आता, उसकी
दिनचर्या, घर, मित्र सभी कुछ पूर्ववत् रहता है। किंतु इन सबके विपरीत
स्त्री को अपना सब कुछ छोड़ यहाँ तक कि पैतृक निवास भी, अपने आपको पुरुष की
इच्छानुसार उसकी दिनचर्या में ढालना पड़ता है। शिक्षित स्त्री को मैत्री के
लिए भी
शिक्षित
स्त्रियाँ कम मिलती हैं और इस तरह उनके जीवन में एक अभाव-सा रह जाता है।
अच्छी गृहिणी बनने के लिए उसे कुछ नहीं करना, बस, पति की इच्छानुसार काम
करना है और जब पति खाली हो तो उसे खुश रखना है, लेकिन क्या इससे उस स्त्री
का अभाव पूरा किया जा सकता है?
ऐसी
पढ़ी-लिखी महिलाओं के अभावों को पूरा करने के लिए उन्हें बाहर भी काम करने
की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। इस घर-बाहर की समस्या का समाधान निकालना आवश्यक
है, अन्यथा उसके मन की उथल-पुथल घर की शांति और समाज का स्वस्थ वातावरण ही
नष्ट कर देगी। स्त्रियों की उपस्थिति बाहर भी उतनी ही आवश्यक है जितनी घर
में और इसलिए उन्हें एक ही सीमा में नहीं बाँधा जा सकता।
शिक्षा के
क्षेत्र के बाद महादेवी चिकित्सा के क्षेत्र में स्त्रियों की आवश्यकता का
अवलोकन करती हैं। पुरुष यदि चिकित्सक हो तो उसकी व्यावसायिक बुद्धि ही काम
करेगी, लेकिन यदि महिलाएँ इस क्षेत्र में उतरें तो रोगियों को आधे से
अधिक
मर्जों की दवा मिल जाएगी। उन्हें स्नेह और सहानुभूति महिलाएँ ही दे सकती
हैं। कानून जैसे विषय में भी महिलाओं की स्थिति अनिवार्य ही है। यदि वे इस
क्षेत्र में बढ़ें तो समाज में महिलाओं की स्थिति और आवश्यकताओं पर भी ध्यान
दिया जा सकेगा। इतनी संख्या के वकीलों-बैरिस्टरों से जो संभव नहीं है, वह
स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती चंद महिलाओं से संभव है।
पुरुषों
का यह कथन कि अधिक पढ़ी-लिखी महिलाओं से उन्हें विवाह करते डर लगता है,
हास्यास्पद होने के साथ-साथ उनके अहम् और स्वार्थ का दर्पण है। यदि अनपढ़
या पुरुष के कार्यक्षेत्र के विषय में जरा भी जानकारी न रखने वाली महिला
उसी पढ़े-लिखे, ऊँची पदवी के पुरुष से विवाह करने में बिल्कुल नहीं
हिचकिचाती तो पुरुष को क्यों डर लगता है? इसका कारण यह है कि उसे सदा भय
रहता है कि भावी पत्नी मूकभाव से उसका अनुसरण नहीं करेगी, शिक्षित और
आवश्यक जानकारी रखती महिला उसके आचरण पर प्रश्न उठा सकती है। तभी पुरुषों
का मन उस कल्पना से ही सिहरता है और उनका अहम् डरता है।
बालकों की
प्रगति में संलग्न संस्थाएँ चलाने, स्त्री संगठन बनाने और स्त्रियों को
स्थतियों से परिचित कराने के कार्य का भार आज स्त्री के ऊपर है और निश्चय
ही केवल वही इन्हें सुचारु रूप से पूरा कर सकती है। जब बाहर इतने आवश्यक
कार्यभार उसकी प्रतीक्षा कर रहे हों तब उससे घर में बैठे रहने की अपेक्षा
करना मूर्खता है। यह एक और मूर्खता है कि यह आशा रखी जाए कि बाहर काम करती
स्त्री घर से सन्यास ले ले। उन्हें घर-बाहर दोनों स्थानों पर कार्य करने की
स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
इस सोच को
कि संतान पालन के लिए स्त्री का घर होना आवश्यक है, महादेवी एक भ्रांति
सिद्ध करते हुए बताती हैं कि कार्यरत महिलाओं की संतान घर बैठी महिलाओं की
संतान से अधिक प्रखर हैं और साथ में कामकाजी महिलाएँ शाम को घर लौट कर
संतान को गोद में ले खेलती हैं, वहीं यह गुण थके माँदे घर लौटे एक पुरुष
में नहीं देखा जाता। मूलरूप में यदि
“विवाह
सार्वजनिक जीवन से निर्वासन न बने तो निश्चय ही स्त्री इतनी दयनीय न रह
सकेगी।“
साहित्य एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ स्त्री घर बैठे ही उन्नति कर सकती है। यह
बहुत चकित कर सकता है कि जहाँ पुरुषों के कमरे पुस्तकों से भरे होते हैं,
वहाँ महिला की अपनी दस पुस्तकें भी नहीं होतीं। संभवतः इसलिए कि उन्हें
पुस्तकों के लिए उचित नहीं माना जाता, फिर यह भी कि घर के कामकाज में जुटी
औरत की रुचि कभी इस ओर बढ़ी ही नहीं।
साहित्य जैसे क्षेत्र में घर बैठे स्त्रियाँ बालकों के लिए भी बहुत कुछ कर
सकती हैं। बाल-साहित्य में उनके हाथ अनुभवी प्रमाणित हो सकते हैं, क्योंकि
बच्चों के मनोविज्ञान को एक माता के अलावा शायद ही कोई ठीक से समझ पाए।
इन
क्षेत्रों में स्त्रियों को कुछ करने देने के लिए पुरुषों को उदार होना
पड़ेगा, क्योंकि इनमें स्त्रियों की आवश्यकता जब-तब पड़ती रहेगी और कदाचित्
स्त्री को भी पुरुष के समान सामाजिक कोण और आयाम स्थापित करने का पूरा
अधिकार है।
भारत में
नारी की स्थिति ने दयनीय रूप ले लिया है। यह एक ऐसा अजीब देश है, जहाँ इस
क्षेत्र में दूसरे देशों की तरह प्रगति नहीं पतन हुआ है। आज दूसरे देशों
में नारियों ने पुरानी रीतियों को तोड़ कर एक स्वतंत्र जीवन शुरू किया है,
जबकि भारत में वही स्थिति बरकरार है। घर के लोग पुत्री के विवाह की चिंता
उसके जन्म से ही करने लगते हैं, उसके विवाह के समय बड़ी से बड़ी रकम देते
हैं। यह समस्या भारत में इसलिए है क्योंकि यहाँ के लोगों को महिला की
आजीविका का इससे सरल उपाय नहीं मिलता। यदि विवाह के बाद स्त्री स्वावलंबी
बन कर रहे तो विवाह जीवन का सुंदर पड़ाव बन जाए। वैदिक काल की चर्चा करते
हुए महादेवी बताती हैं कि उस काल में आर्य-पुरुष ईश्वर से उत्तम संतान की
कामना करते थे और स्त्री उस समाज का एक बहुत सम्मानित और महत्वपूर्ण अंग
थी। हर स्त्री इतनी आदरणीय थी कि उँचे से ऊँचे कुल के पुरुष किसी भी वर्ण
या कुल की स्त्री को पत्नी स्वीकार कर सकते थे। समय के साथ नीचे कुल की
कन्याओं से विवाह के पश्चात् उनके परिवार से कुल में अंतर होने के कारण,
दूरी बनाने के लिए यह विधान उभरने लगा की माता-पिता पुत्री के विवाह के बाद
दामाद के घर जाना उचित न समझें। आज उसी का रूप हम एक विकृत प्रथा में देखते
हैं, जहाँ
“बेटी
के घर का पानी”
तक नहीं पिया जाता।
आज दूसरे
देशों में स्त्री-पुरुष दोनों ही जीवन-साथी चुनने में पूरी तरह से स्वतंत्र
हैं। भारत में भी प्राचीनकाल में ऐसी
ही
व्यवस्था
थी, जब नारी को अपनी इच्छा से ब्रह्मचारिणी का जीवन
चुनने का अधिकार था और एक राजकन्या
भी एक ऋषि का वरण कर सकती थी। यूरोप के देशों में कुछ वर्ष पहले तक स्त्री
एक पशु के समान थीं, परंतु क्रांतियाँ
उलट-फेर करने में सक्षम हैं और वही हुआ। लेकिन भारत के सामान्य पुरुष की
सोच आज भी यही है कि आँगन में बँधे पशु और घर की स्त्री में कोई अंतर नहीं
है और इसलिए स्त्री के मन और शरीर पर उसका पूरा अधिकार है।
कुछ लोगों
का मानना है कि स्त्री स्वावलंबी बनने पर विवाह नहीं करेगी और इस तरह
दुराचार बढ़ जाएगा। यदि यही सत्य है तो जिन देशों में स्त्रियाँ स्वतंत्र और
स्वावलंबी हैं, वहाँ तो विवाह जैसी संस्था का नामोनिशान ही मिट जाना चाहिए
था! हमारे यहाँ तो कन्या की शिक्षा के लिए खर्च करना घरवालों से सहन नहीं
होता। स्त्री पुरुष के अधिकार से बाहर न चली जाए इसलिए उसके लिए एक ही
विद्या प्राप्त करना उपयुक्त है – मनोरंजन विद्या। कभी भारतीय पत्नी अपने
देश के लिए गौरव का कारण थी, आज वह एक विडंबनामात्र है।
आरंभ से
ही नारी ने शारीरिक बल (पशुबल) में अपने को पुरुष से हेय पाया और साथ ही
पुरुष की बाहरी कठोरता के अंदर छिपी कोमल भावनाओं को भी उसने ढूँढ लिया। इस
खोज के बाद से नारी ने पुरुष के समक्ष अपने बल या विद्या के प्रदर्शन का
विचार छोड़ दिया, क्योंकि इससे तो प्रतिद्वन्द्विता उपजती और वैसी स्थिति
में केवल हार-जीत संभव है, आत्मसमर्पण नहीं। इसलिए उसने अपने स्त्रीत्व और
रूप के बल पर पुरुष को चुनौती दी और इसमें नारी की जीत हुई। उसकी यह जीत
लगातार चलती रही; क्योंकि उसके पास वह
था जो पुरुष के जीवन में कोमलता
और सरसता भर सकता था। परंतु प्रेयसी होने के साथ-साथ नारी का कर्तव्य और भी
बढ़ गया, क्योंकि उस पर मातृत्व का भी भार आ गया। एक स्नेहिल मातृत्व का
कर्तव्य निभाते-निभाते वह धीरे-धीरे अपने रमणीत्व को भूल गयी, क्योंकि
नारीत्व के विकास के लिए संतान साध्य है और रमणीत्व साधन-मात्र है।
पुरुष ने
नारी के इस माता के रूप
का
आदर किया,
अर्चना भी की, लेकिन उसे आत्मतुष्टि नहीं मिली। उसकी इच्छा हुई कि वह आजीवन
ऐसी स्त्री के साथ रहे जो सदैव प्रेयसी बनकर मनोंजन करती रहे। उसके इस
असंतोष का परिणाम है कि आज बाजारों में ऐसी स्त्रियाँ मिल जाती हैं जो केवल
एक रमणी की भूमिका निभा सकती हैं, दूसरे शब्दों में पुरुषों का मनोरंजन कर
सकती हैं। उन स्त्रियों में मोहकता है, स्थायित्व नहीं। उनके नारीत्व का
ध्येय दूसरों का मनोरंजन है। स्त्री पत्नी के रूप में पुरुष के जीवन को और
सरल और सुंदर बना सकती है, परंतु मातृत्व में उत्तेजना नहीं है जबकि पुरुष
उत्तेजना की कामना करते हैं, जिसे पाकर वे कुछ समय तक बेसुध हो जाएँ। अपने
नारीत्व को बाजार में बेचती स्त्रियों के हृदय के मर्म को पुरुष ने कब
समझा? और समझने की आवश्यकता भी उसे कब लगी? जीवन-भर इस क्रय-विक्रय में लीन
स्त्री अपनी सभी कोमल भावनाओं तथा आत्मसमर्पण की इच्छाओं को कुचल कर रख
देती है और अंत में भी उसे एकाकी दुःख ही मिलता है। इन स्त्रियों को केवल
भावुकता
के
दृष्टिकोण
से न देखकर यथार्थ को समझने के लिए व्यावहारिक दृष्टिकोण से भी देखना होगा।
कुछ लोगों का कहना है कि हर स्त्री –
समुदाय में ऐसी स्त्रियाँ मिल जाएँगी जो मातृत्व के भार से बचकर स्वतंत्र
जीवन बिताना चाहती हैं और कुछ का कहना है कि कितने ही पुरुषों को मनोरंजन
करने के लिए ऐसी स्त्रियों की आवश्यकता रहेगी; परंतु यह विचारणीय है कि
क्या किसी सामाजिक प्राणी को अपनी आवश्यकता के लिए दूसरे के स्वत्व को
कुचलने का अधिकार है?
इतने
बलिदान करती और दुःख सहती ऐसी स्त्री फिर भी समाज में पतिता मानी जाती है
लेकिन इन स्त्रियों में और चुपचाप पति का घर संभालने पर देवी कहलाने वाली
मानवी में स्थिति के संकट के अलावा क्या अंतर है? यदि प्रेम और त्याग कर एक
विवाहिता अमर बन सकती है तो एक मजबूर महिला के लिए भी यह काम असंभव नहीं।
यह तो समाज है जो उसके काम में रुकावट डाल देता है। समाज ने कुष्ठ रोगियों
और विक्षिप्तों के लिए भी आश्रम-चिकित्सालय बनाए, परंतु इन पतिता कही जाने
वाली स्त्रियों के कल्याण के बारे में कभी नहीं सोचा। इनके मन को भी किसी
के स्नेह की आवश्यकता है। दिखावटी मुसकान सजा कर शरीर के साथ अपनी आत्मा
बेचती महिलाओं को खरीदने वाले इनकी हत्या नहीं कर रहे तो क्या कर रहे हैं?
इतिहास साक्षी है कि इस प्रथा के चलन में गिरावट नहीं आई है, क्योंकि मदिरा
से कभी प्यास नहीं बुझती। पुरुष की इस पशुता को जैसे-जैसे भोजन मिला वह और
बलशाली होकर अधिक भोजन की अपेक्षा रखने लगा। यदि कोई ऐसी स्त्री मिल भी जाए
जो ऐसे व्यवसाय में अपना अपमान न मानती हो
तो
इसका अर्थ
है कि अवश्य ही उसके जीवन में कोई ऐसी घटना घट चुकी है जो उसके हृदय के
समूचे स्नेह को उड़ा ले गई, जिससे उसका हृदय जीवन के प्रति इतना निष्ठुर है।
इन स्त्रियों के प्रति जो घृणा हम देखते हैं, वह बाहरी है, दिखावटी है,
जब-तब समाज अपनी लालसा बुझाने के लिए इन्हीं स्त्रियों की सहायता लेता है,
अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान बचाने के लिए निंदा भी इन्हीं की करता है।
“समाज
पुरुष-प्रधान
है, अतः पुरुष की दुर्बलताओं
का दंड उन्हें मिलता है, जिन्हें देखकर वह दुर्बल हो उठता है।“
इस तरह स्त्रियों को दोहरा दंड मिलता है। उनके सपने भी धरे रह जाते हैं और
उनके ही सभी सामाजिक अधिकार भी खो जाते हैं। दूसरी ओर पुरुष का चारित्रिक
पतन उसके सामाजिक अधिकारों में कटौती नहीं लाता, उसे गृह जीवन से भी
निर्वासन नहीं मिलता। वह उँचे से ऊँचे पद पर विराजमान हो सकता है और स्वयं
पतित व दुराचारी होकर भी एक सती स्त्री के जीवन पर, चरित्र पर कीचड़ उछाल
सकता है। महादेवी वर्मा स्त्री के शरीर-व्यवसाय संबंधी विषय पर इस टिप्पणी
से अपनी बात पूरी करती हैं कि
“जब
तक पुरुष को अपने अनाचार का मूल्य नहीं देना पड़ेगा, तब तक इन शरीर
व्यवसायिनी नारियों के साथ किसी रूप में कोई न्याय नहीं किया जा सकता।“
(अगले
अंक में समाप्य-----सं.) |
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