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03.22.2008
 

हक़ के लिए
सुनीता ठाकुर


अपने हक़ के लिए
लड़ती,
रौंदती- हक़ उम्र के।
उम्र थी-
       सवालों से घिरी
              अपने लिए
                    सुकून के दो पल तलाशती
         उम्र की ढलान पर
    बेतहाशा दौड़ती ज़िन्दगी
को संभालती
सहारा ढूँढती-सहारा बनती।


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