हक़ के लिए सुनीता ठाकुर
अपने हक़ के लिए लड़ती, रौंदती- हक़ उम्र के। उम्र थी- सवालों से घिरी अपने लिए सुकून के दो पल तलाशती उम्र की ढलान पर बेतहाशा दौड़ती ज़िन्दगी को संभालती सहारा ढूँढती-सहारा बनती।