अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
03.22.2008
 

हक़
सुनीता ठाकुर


उसने कहा—भूख?
मैंने कहा—रोटी
उसने कहा—प्यास?
मैंने कहा—पानी?
उसने कहा—नींद?
मैंने कहा— सेज
उसने कहा—थकान?
मैंने कहा— गोद

उसके हर सवाल पर
मैंने दिया—जवाब
मेरे एक सवाल पर
वो खामोश है आज तक
मैंने कहा था— हक़?
और लगता है—
वो बोलना भूल गया....


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें