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03.22.2008
 

औरत नियति सी
सुनीता ठाकुर


औरत के क्षितिज से
आँचल में
चाँद सी बिंदिया
झिलमिलाती है।
नदिया सी
इठलाती है ज़िन्दगी
उसकी रोटियों में बिलता है
श्रम ज़िन्दगी का
वह भरपेट सोती
अपनी दुनिया को देखती है
उसका चाँद
और भी मुखर हो उठता है
औरत नियति सी
ख़ामोश है
निहारती प्रारब्ध को।


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