औरत नियति सी सुनीता ठाकुर
औरत के क्षितिज से आँचल में चाँद सी बिंदिया झिलमिलाती है। नदिया सी इठलाती है ज़िन्दगी उसकी रोटियों में बिलता है श्रम ज़िन्दगी का वह भरपेट सोती अपनी दुनिया को देखती है उसका चाँद और भी मुखर हो उठता है औरत नियति सी ख़ामोश है निहारती प्रारब्ध को।