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03.22.2008
 

अथक
सुनीता ठाकुर


वे नहीं जानते-
कब जन्मे, कब बुढ़ा गए,
वे नहीं जानते मायने
बचपन, यौवन या कि बुढ़ापे के।
उनकी आँखों में
तैरते रहे सपने - भूख के।
उनके हाथ तलाशते रहे
कचरों में भविष्य,
वे बोले नहीं- चीखे बार बार,
कब उनकी बातें
चीख में बदली- वे नहीं जानते।
कब उनकी उनकी पीठ पर
एक नंबर चिपक गया- नहीं जानते वे।
कब वे शातिरों के मोहरे बने,
कब सियासत का पियादा बने,
कब उनके लिए-
कोई बन बैठा ठेकेदार- वे नहीं जानते।
वे जानते हैं- तो अथक हाथ
वे तो आज भी वहीं हैं
पीढ़ी दर पीढ़ी
देश बहुत आगे निकल गया
उनके नाम पर।


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