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ISSN 2292-9754

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09.26.2014


किसके हित

अपने हित के बारे में
कुछ ऐसा सोचा था
मन व्याकुल हो गया था
अनेक आशंकायें
अनेक असंभावनायें
अनेक अनिवार्यतायें
फिर भी हौंसला था
सिर्फ अपने बलबूते पर
सिर्फ अपने आत्मस्थैर्य पर।

सपने टूटे
अपने रुठे
भाग्य खोया
मन रोया।

ज़िन्दगी से तंग होकर
निकल पड़ा सागर किनारे
सोचा था ख़त्म कर दूँ
अब यह यात्रा
पर बिना कोई उद्देश्य
जी रहा है सागर औरों के हित
तो मैं क्यों सोचूँ
सिर्फ मेरे हित
हित परहित में खोकर हम
सागर जैसे जीना अब
हमें भी औरों के हित में
कुछ तो करना है
औरों के हित में
कुछ तो मरना है॥


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