अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
07.19.2014


ये ज़रूरी था शायद

सरोज आ गई थी वापस, बाजार से,
स्वेटर लेने गई थी पर,
लाई नहीं,
मेरे पूछने पर एक कहानी सुना दी,
मासूम सा मुँह बनाकर,
स्वेटर के पैसे उधार दे दिए,
किसी अजनबी को,
बाजार में मिल गया था,
कहीं ठगा गया था वो और,
घर जाने का किराया भी नहीं था,
उसके पास,
सरोज को अपना दुःख सुनाया और,
सरोज ने उसे पैसे दे दिए,
उस पर यकीं कर के,
मैं सरोज कि तरफ देखता रहा,
कितनी भोली और कितनी मासूम थी,
बिलकुल अनजान,
दुनिया के फरेब और छल से,
मैंने कुछ नहीं कहा तो बोली,
आप देखना, वो पैसे लौटा देंगे,
बुरी बात नहीं है,
किसी मजबूर कि मदद करना,
..........
दिन महीनो में बदल गए पर,
उस अजनबी का कोई सन्देश नहीं आया,
पर सरोज को यकीं था,
ईमानदारी पर और खुद पर,
मैंने कहा-भूल जाओ,
वो कोई ठग था,
तुम्हें ठग लिया उसने,
तो कहने लगी
दुनिया में ईमानदारी ज़िंदा है,
ख़ामोशी में ही भलाई थी,
कुछ कहना भी बेकार था,
.......
अगले महीने कि पहली तारीख को,
सुबह-सुबह मैंने कहा-
अरे सुनो--तुम्हारे नाम से एक
मनी-आर्डर आया है,
किसी जयप्रकश का है,
५०० रूपए का है,
उसक चेहरा खिल गया,
मैंने कहा था न,
ईमानदारी ज़िंदा है,
आप तो कह रहे थे भूल जाओ,
धन्यवाद भी लिखा है - मैंने कहा,
सरोज ख़ुशी ख़ुशी अंदर चली गई,
चाय बनाने के लिए,
मैंने दोस्त को फ़ोन किया और,
मनी-आर्डर के लिए धन्यवाद कहा,
ये ज़रूरी था शायद,
सरोज कि ईमानदारी और,
विश्वास को बचाने के लिए,
उसमें एक नेक इंसान को,
ज़िंदा रखने के लिए,
ताकि इस बार सरोज मुँह ना फेरे,
किसी मजबूर कि मदद करने से..


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें