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ISSN 2292-9754

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02.17.2018


पापा की आँखों से

रातें ऐसी थीं कि जिनमें अंदर गर्मी लगे और बाहर सुबह तक ओस आकर ठंड हो जाए।

हम बाहर ही सोते थे रजाई लेकर।

मुझे अंदर सोने में मज़ा नहीं आता था क्योंकि मुझे जब तक चाँद घूर-घूर कर ना देखे मुझे नींद नहीं आती।

उस रात हम अंदर ही सोये थे। उस रात चाँद तो दिखाई नहीं दे रहा था उमड़-उमड़ कर काली घटाएँ आ रहीं थीं।

मैने कुछ देर वह्ट्सैप चलाया और कुछ देर कविताएँ पढ़ीं -

"उधर नीम की कलंगी पकड़ने को झुके बादल.... उठे बादल झुके बादल..."
और फिर सो गया।

सुबह उठा तो धीरे-धीरे ठंडी हवा चल रही थी। मैंने चाय पी और पापा के साथ खेत जाने को तैयार हुआ; सोचा घूम आऊँगा कुछ देर।

हमारे खेत के कच्चे रस्ते पर सरसों ने अपने फूल बिछा रखे थे और लगा जैसे हवा गाना गुन-गुना रही हो...

"पधारो म्हारे देश रे....."

पूरे लय से धीरे-धीरे।

हमारे खेत से पहले एक बबूल के पेड़ ने अपने सारे पुष्प बिखेर रखे थे मेरे रस्ते में।

"चुक के होंठा दे नाल ला लयीं...."

अपने खेत में पहुँचा सरसों की सफेद टहनियों पर कुछ ओस की, कुछ बारिश की बूँदें पड़ी थीं। थोड़ा सा सूरज भी निकल चुका था।

"आज चुग ले ओस की बूँदें हंसनी मोती जान के..."

"हो जाए भँवरे शराबी पीके तुपका तरेल दा..."

मैने पापा को देखा और कुछ देर रुका......

फिर दुबारा खेत को देखा -

फ़सलें सारी रात रोयीं थीं ओलों की मार से; अभी तक उनके आँसू नहीं सूखे थे, रो-रोकर धरती गीली कर दी थी।

हमारे खेत की धरती ने अपनी छाती से लगा रखा था सारी फ़सलों को।

धरती की छाती करड़ी थी वो सब सह गयी थी - चुप-चाप! एक आँसू ना रोयी मेरे पापा की तरह।

मैंने पहली बार देखा था फ़सलों का दर्द, धरती की छाती, खेतों का विरानापन - अपने पापा की आँखों से पहली बार।


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