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ISSN 2292-9754

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01.26.2016


निशारम्भ

गुलशन में जाकर देख आया
वो बदरंग रहता है
बहारें तेरे बग़ैर आती नहीं

रात देखा रात को
छुपकर अँधेरे में रोते हुए
कृष्ण पक्ष को चाँद नज़र आता नहीं
सुबह रोज़ मुझे -
ख़्वाहिशें बेहाल सी रोती हुई
दरवाज़े पड़ी मिलती हैं
सुबह का सूरज...
रोशनी की किरण भी लाता नहीं
मेरी उम्मीद टूट सी रही है अब
बहुत दिन हो गये तू आया नहीं

गौ धूली उड़ने लगी
सब अपने घर को लौटे
तू भी आजा प्रिय निशारम्भ हुई


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