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12.22.2007
 

सत्य और असत्य
सुनील घई


सत्य है

गुरु सत्य है

भगवान सत्य है

प्रकाश सत्य है

जन्म सत्य है

मृत्यु सत्य है

आत्मा सत्य है

असत्य अंधकार है

सत्य की गणना करना असम्भव है क्योंकि सृष्टि भी सत्य है। अगर झूठ प्रकाश को अन्धकार में बदलने के प्रयास में व्यस्त है तो झूठ का यह प्रयास सत्य ही निष्फल रहेगा।

भौतिक विज्ञान के अनुसार प्रकाश की गति है, अन्धकार का वर्णन नहीं है। अन्धकार गतिहीन है। अन्धकार प्रकाश को मिटा नहीं सकता, छिपा सकता है - वह भी कुछ समय के लिए। इसी प्रकार झूठ कुछ समय के लिये छिपा रह सकता है। सत्यरूपी प्रकाश, अन्धकार रूपी झूठ को सत्य में बदल ही देगा। कहावत है न सत्य कड़वा लगता है, वास्तव में सत्य कड़वा नहीं है। जिस समय झूठ को सत्य की मिठास का अनुभव होता है तो झूठ को अपनी कड़वाहट का आभास होता है। झूठ को फल पा लेने की तृष्णा है, पा लेने की इच्छा है। सत्य को फल की अभिलाषा नहीं है, इच्छारहित है सत्य, क्योंकि सत्य ही फल है, प्रसाद है। जब प्राणी झूठ का अहसास कर लेता है, वह झूठ भी सत्य में बदल जाता है। उसी क्षण सत्य की नींव का प्रतिष्ठान होता है और सत्य के घरौंदे का निर्माण होने लगता है। घर मन्दिर बन जाता है, आश्रम बन जाता है और सभी सत्य इस घर के आश्रय में वास करते हैं, आश्रय लेते हैं।

की ध्वनि होगी और एक नया संसार शुरू होगा। सत्य समाधि है तो असत्य बेचैन। किसी ने ठीक ही कहा है - झूठ के पाँव नहीं होते। तभी तो सत्य का सामना नहीं कर सकता। सत्य के आगे दण्डवत्‌ गिर उसे प्रणाम कर अपने को समर्पित कर देता है। इसी सन्दर्भ में यह कहना भी उचित रहेगा कि समर्पण सत्य है। झूठ आकर्षित करता है और सत्य आकर्षण है। वास्तव में झूठ आकर्षित क्या करेगा, वह तो स्वयं आप आकर्षित है सत्य की ओर।

सत्य को प्रमाण की आवश्यकता नहीं। झूठ को सत्य का मुखौटा  पहनने के लिये हर पल प्रमाण का सहारा लेना पड़ता है।

जैसे पहले कहा जा चुका है, झूठ तो सत्य तभी बन पायेगा जब प्रमाण पैदा करने की नाटक-प्रणाली बन्द हो, और झूठ सत्य का मुखौटा उतार, सत्य का सामना कर उसे प्रणाम करे। याद रहे हर झूठ के पीछे सत्य छिपा है।

झूठ का कोई आकार नहीं, सत्य साकार है, साक्षात है। झूठ का भार सहन करना बहुत कठिन है। कब तक प्राणी झूठ की पोटली उठा के घूमता रहेगा। कमर टूटना अनिवार्य है, सत्य का कोई भार नहीं। रोम रोम में रचा पड़ा है, प्राणी का ही अंश है सत्य- (क्या हम अपने भार को अनुभव कर सकते हैं?)

झूठ सीमाबद्ध है और सत्य सीमारहित। यह भी एक कारण है कि झूठ की पराजय निश्चित है, क्योंकि सीमाबद्ध को ही जीता जा सकता है। सत्य को बस परम ही अपने में लीन कर परम सत्य बना लेगा। सत्य जब झूठ को अपने आँचल में समेट लेगा, उसकी क्षमता कदापि कम नहीं होगी क्योंकि क्षमता भी सिमित है वह भी सीमा का ही एक रूप है और सत्य तो सीमारहित है ही।

सत्य क्या है? सत्य जो मिटाया न जा सके। जो छिपाया न जा सके। सत्य पकड़ से बाहर है - सत्य साधना बन चुका है।

झूठ को र पल छिपाना पड़ता है और झूठ को घनघोर झूठ कह कर सम्बोधित किया जाता है और सत्य को परम। सत्य की खोज क्या कोई करेगा, क्योंकि वह कभी गुम हुआ ही नहीं। सत्य अगर प्राणी के अन्दर सुप्तावस्था में है तो उसे जागरूक करने का प्रयत्न करो, साधन की खोज करो। झूठ में डर छिपा है, सत्य निडर है। झूठ बोलने के लिए प्रयास करना पड़ता है, सत्य अपने आप प्रत्यक्ष होता है। प्रयास शिथिलता का कारण बनता है और सत्य में स्फूर्ति ही बनी रहती है।


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