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12.22.2007
 

प्रेम
सुनील घई


संसार पुकारे मुझे अधूरा
मैं अधूरा कैसे कहूँ अपने को
जब तुम पूर्ण और पूरक
तुम अंशी मैं अंश तेरा

प्रेम से भरा मन मेरा अनूठा
इन्द्रियों ने कह प्रेम गीत सुनाया
मन फुसलाया काम भरमाया
द्वेष भरा संसार को पाया
प्रेम मरा ...
तरस गया मैं बिन प्रेम पल में
कैसे जागृत हो फिर प्रेम मन में
जग लोभी कहे, मै लोभी
यह लोभ भी अच्छा!
प्रेम से भरा मेरा मन
एक बार फिर इठलाया
समझ बैठा सुखी जिसे
तब सब दुखिया, संसार को पाया
प्रेम भटक गया मद मोह के सागर में
मन डूब गया मत्सर भरे सागर में
तरंग उठे कोई - जो धो डाले
मैले कलुषित भाव पाप भरे
बेकार सब सारे के सारे
जग बोले वह क्रोधित तुम पर
मैं कहूँ नहीं क्रोध कहीं पर
बस प्रेम अटूट सब पूर्ण पूर्णता से भरपूर
मैं अधूरा कैसे कहूँ अपने को
मैं ही प्रेम... प्रेम से भरपूर


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