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12.22.2007
 

प्रश्न
सुनील घई


दूर क्षितिज में
फटते बादलों में से उभरता-
यह सुनहरा प्रकाश - ज्ञान किरण,
भरी प्रश्नों साथ।

किसी पुस्तक में न छपे उत्तर इसके,
न किये किसी ने
प्रश्न मुझ से।

यह अन्दर से उभरे प्रश्न,
अन्तकरण में ही
छिपे उत्तर इनके,
सिमित बुद्धि सहन कर पायेगी-
क्या उत्तरों की बरसात?

बैठा धरती पे देख रहा,
टकटकी लगाये,
क्या बसा है उस पार?

कुरेद कुरेद मन बुद्धि
थक चूर हुए,
आत्म समर्पण कर बैठ गया,
मैं यहाँ और-
मैं ही वहाँ - उस पार।

यह उत्तर था या
एक और प्रश्न?
बस इसी सोच में डूब गया
मैं फिर एक बार।


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