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ISSN 2292-9754

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10.22.2014


मुम्बई की बस में

पीठ पर बैग लादे धक्का-मुक्की के बीच
बदहवास सा पुरुष चढ़ जाता है बस में
घर जाने की जल्दी में
या फिर ऑफ़िस जाने की हड़बड़ी में
लाचारी से निहार रहा है कहीं सीट खाली मिले तो बैठ जाऊँ
महिलाओं की सीट खाली होने के बावजूद
वह महिला बैठी है पुरुषों वाली सीट में बड़ी ही ठसक के साथ
ज़रा सी भी टच हो जाने पर बिफर पड़ेगी
दिखता नहीं क्या? अंधा हो गया?
चढ़े जा रहा है आंग पर…..फलाना..फलाना
वह चुपचाप अपने को और अपनी साँसों को सँभाले खड़ा है
लेकिन उसकी आँखें मुआयना कर रही हैं पूरी बस का
वो सोच सोचने लगा…..
बस की सीटों के ऊपर मोटे-मोटे अक्षरों से
कहीं लिखा है ‘स्त्रियाँ साठी’ कहीं ‘अपंगा साठी’
तो कहीं लिखा है वृद्धांसाठी
कहीं नहीं लिखा है ‘पुरुषांसाठी’
सिवाय प्रसाधन कक्ष के…...
मन ही मन धत्त कहता हुआ
वह सारे अपमान को पी जाता है
पुरुष हमेशा बुरे नहीं लगते हैं
कभी-कभी अच्छे भी लगते हैं पुरुष….


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