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ISSN 2292-9754

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10.22.2014


जमीं रहें अपनी जड़ों से औरतें

जमीं रहें अपनी जड़ों से औरतें
इसलिए बनाए रखो ऐसी ज़मीन
जो दे सके उनकी जड़ों को मज़बूती
औरतें पनपती हैं तो पनपा जाती हैं
उजड़ती हैं तो उजाड़ जाती हैं
सभी की जड़ों को सँभाले
न जाने कौन से अनाम क्षणों में
कमज़ोर हो जाती हैं औरतें
फल-फूल से लदे रहने के बावजूद
न जाने कौन सी डाली रिक्त रह जाती है
जिसे सींचने की ख़ातिर वह
अपनी ज़मीन से ही बग़ावत कर उठती है
हिला देती है अपनी जड़ों को अनजाने ही
थपथपाए रखो उसकी जड़ों की मिट्टी को
लीप दो उर्वरक से ताकि दरारें न पड़ जायें
आत्मघाती होती हैं ये दरारें
दीवारों में पड़ जाए तो टूट जाती हैं दीवारें
दरवाज़ों में पड़ जाए तो चीर देती हैं
दरवाज़े के पल्लों को
रंगाई-पुताई में पड़ जाए तो पपड़ी बन
उखड़ जाती हैं अपने ही अस्तित्व से
ज़मीन में पड़ जाए तो भूकंप ले आती हैं
समंदर में पड़ जाए तो सूनामी ले आती हैं
आसमान में पड़ जाए तो बादलों को
फटने पर मजबूर कर देती हैं दरारें
जानती हैं औरतें बहुत ख़तरनाक होती हैं दरारें…
इसीलिए रोज़ चूल्हा बुझते ही
गर्म आँच से पड़ने वाली दरारों को
झट से लीप देती हैं मिट्टी और गोबर की लेपन से
भर देती हैं चूल्हे की दरारें
ताकि दरारों से होने वाले नुकसान से बचा जाए
किन्तु नहीं बचा पाती वे ख़ुद को उन दरारों से
जो दबे पाँव न जाने कब दरका जाती हैं उन्हें
सभी की जड़ों को सँभाले हुए
जाने-अनजाने फट पड़ती हैं वे
अपनी ही जड़ों की दरारों से बेख़बर……


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