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ISSN 2292-9754

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10.22.2014


एक पूरी दुनिया है औरत

देह से बेख़बर
एक पूरी की पूरी दुनिया है औरत
उसकी देह में बहती है नदी
बहते हैं नाले
पूरी देह में उतार-चढ़ाव
कटाव-छंटाव के साथ
उभरे हैं तमाम पर्वत-पहाड़
टीले-मैदान और घुमावदार
टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियाँ
जिनसे होकर गुज़रती हैं
उसकी देह की हवाएँ
वह हवाओं को रोक
बनाती है अनुकूल वातावरण
बरसने के लिए

बावजूद वह रौंदी जाती है
कुचली-मसली जाती है
फिर भी बेमौसम बेपरवाह
उग जाती है
कभी भी
कहीं भी

बढ़ाती है अपनी लताएँ
उगाती है अपने पौधे
सहेजती है बाग-उपवन
बनती है जंगल
बनती है हवा
बनती है वज़ह
जीवन के संचालन की

छोड़ दो उसे
निर्जन सुनसान टापू पर
या छोड़ दो उसे मंगल ग्रह पर
बसा लेगी औरत
एक पूरी की पूरी दुनिया
अपनी देह की मिट्टी से
कभी भी
कहीं भी।


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