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05.03.2012
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थप्पड़
सुमन कुमार घई

मालती भी यार का शब्द सुनते ही आपे से बाहर हो गई, मलिक की नशे की अवस्था और स्तर को भाँपते हुए कुछ दूर खड़ी होकर मलिक से भी ऊँचे स्वर में बोली, दिनरात मरती हूँ तुम जैसे नशेड़ी को ख़ुश रखने के लिए। अगर यार होते तो कब का तुम्हें छोड़ कर भाग चुकी होती। यह तो मेरी किस्मत ही खोटी है कि तुम्हारे से माथा भिड़ा है।अब तक आहाते के लोग अपने अपने कमरों से निकल कर आँगन में आ चुके थे। मालती की आवाज़ में यह नई कर्कशता से सभी विस्मित थे। मलिक भी एक क्षण को भौंचक्का रह गया। आगे की तरह मालती को सिर झुका कर रसोई में चला जाना चाहिए था। वह अचानक उसके सामने कैसे खड़ी होकर ऐसा लज्जाहीन उत्तर दे सकती है। इस बात से समझौता करना मलिक के अस्तित्व के बाहर था। अपने को सम्भाल कर जैसे-तैसे वह मालती पर लपका। उसके हाथ में मालती की साड़ी का पल्लू आ गया। मालती भी अपने को बचाने के लिए पीछे हुई - उसकी साड़ी खुलती चली गई। वह असहाय सी केवल पेटीकोट में पूरे अहाते के लोगों के सामने खड़ी रह गई। मालती की यह दशा देख कर मलिक का सीना गर्व से फूल गया, बोला- देखूँ अब तुम्हें तेरा कौन सा यार बचाता है, सबके सामने नंगा करके तुझे घर से न निकाल दिया तो मेरा नाम भी मलिक नहीं। ठीक उसी समय जसपाल ने अपने काम से लौटते हुए आहाते में कदम रखा। पहले की बातें तो उसने नहीं सुनीं थी पर मालती की दुर्दशा उससे देखी नहीं गई। उसने आगे बढ़ कर मालती को ढाँपने की चेष्टा की तो मलिक और भी आपे से बाहर हो गया, देखा आखिर आ ही गया तेरा यार! तुझे बचाने को!! तुम क्या समझते हो कि मुझे मालूम नहीं क्या हो रहा है।

जसपाल भी एक क्षण को ठिठका, फिर वह मलिक की ओर बढ़ा। मलिक ने जसपाल को अपनी तरफ बढ़ना आक्रमण समझ, पास ही पड़ी कुल्हाड़ी उठा ली। उसे हवा में लहराते हुए चीखा, "आ हरामज़ादे आज तेरा भी काम कर ही दूँ!” आहाते के दर्शक एकदम सन्न से हो गये मानो सकते की अवस्था में हों। भयभीत लोगों में से कोई भी इस झगड़े को समाप्त करने के लिए आगे नहीं बढ़ा। अचानक ही यह झगड़ा - जो उनके मनोरंजन का साधन था, एक हिंसक रूप ले रहा था। इसके लिए कोई भी तैयार नहीं था। जसपाल भी नहीं। उसने कड़वा घूँट पीया और पीछे हटता हुआ, सिर झुका कर ऊपर सीढ़ियाँ चढ़ गया। ऊपर जाते हुए वह बुदबुदा रहा था, ’बदला तो अवश्य लूँगा, समय आने दो।

इधर फिर से मालती को अकेला पा और अहाते के लोगों को भयभीत देख मलिक और भी दुस्साहसी बनते हुए मालती की तरफ लपका। मालती भी सकते की हालत में होने के कारण मलिक के हाथों की परिधि में आ गई। जब मालती ने अपनी गाल पर एक सनसनाता हुआ थप्पड़ महसूस किया तो वह सकते की हालत से निकली। उसने एक आहत सिंहनी की तरह लपक कर रसोईघर में घुसकर तुरन्त दरवाज़ा बन्द कर लिया और खिड़की की सुरक्षित सलाखों के पीछे से अपने पूरे स्वर में चीखी, हरामज़ादे मलिक अगर मैंने भी इन आहाते के नामर्दों  के सामने तूझे नंगा करके थप्पड़ नहीं मारा तो मैं भी अपने बाप की औलाद नहीं!

कोमल मालती के मुख से ऐसी भाषा और चेतावनी की आशा न तो मलिक को थी और न ही आहाते के अन्य लोगों को। मलिक की मर्दानगी को यह सीधा प्रहार था, इस पर उसकी क्या प्रतिक्रिया होनी चाहिए यह उसकी समझ के बाहर था। मालती अब उसके हाथों से निकल चुकी थी - यह बात वह अब समझ गया था। सो इससे पहले मालती और कुछ कहकर उसे अपमानित करे, वह कमरे में घुस कर बिस्तर पर गिर गया। कुछ ही क्षणों में नशे ने फिर आ दबोचा और वह खर्राटे भरने लगा। आहाते के लोगों ने भी नाटक के इस दृश्य का पटाक्षेप समझ अपने अपने कमरों की राह ली। हाँ, उन सबके मनों में आत्मग्लानि अवश्य थी और मालती का उन्हें नपुंसक कहना उन्हें अन्दर ही अन्दर साल रहा था। वह जानते थे कि यह सच ही है। उस रात आहाते को कोई भी व्यस्क व्यक्ति चैन की नींद नहीं सोया, सिवाय मलिक के।

अगले दिन फिर वही सुबह हुई। मलिक को कुछ याद नहीं था। रोज़ की ह मालती ने बिना बोले नाश्ते में मलिक के सामने पराँठा और ऑमलेट रख दिया और मलिक भी बिना बोले उसे खाकर काम पर चला गया। मालती जानती थी कि अभी आहाते की औरतों का उसके साथ सहानुभूति जताने के लिए ताँता लगने वाला है और इसके लिए वह तैयार थी। वास्तव में वह प्रतीक्षा कर रही थी कि कब जसपाल अपने काम पर जाने के लिए जागे और वह उसे नाश्ता देने के बहाने उसके पास जाकर अपना दर्द बाँटे। बाकी के सब लोग तो सभी ज़नख़े हैं, कोई सहायता नहीं करेगा - रात की घटना ने यह प्रमाणित कर दिया था।

बात यहीं पर समाप्त नहीं हुई। यह घटना इस दम्पती की आपसी लड़ाई को एक नए स्तर पर ले गई थी, क्योंकि दोनों तरफ से ही आहाते के लोगों पर दोषारोपण हुआ था। आहाते के बड़े बुज़ुर्गों ने समस्या को सुलझाने के लिए विचार विमर्श किया और उसे क्रियान्वित करने में जुट गए।

 

मलिक को सोचते सोचते एक झपकी सी आ गई। न जाने उसके अवचेतन ने उसे कैसे झँझोड़ा कि वह एकदम झटके से उठ कर बैठ गया। दीवार पर घड़ी में देखा ग्यारह बज रहे थे। मालती का कहीं भी नामो निशान नहीं। कहीं मालती भाग तो नहीं गई?” - अचानक मलिक के मुँह से निकाला और तुरन्त ही उसने अपनी ही बात को काट दिया, नहीं, उसमें ऐसा साहस कहाँ। मैं उसकी टाँगे नहीं तोड़ दूँगा क्या?” लेकिन फिर मालती है कहाँ? चिन्ता उसकी सहनशक्ति की सीमायें लाँघ रही थी। भूख भी उसे बुरी तरह से सता रही थी। मलिक ने सोचा कि उसे तैयार होकर शायद बाहर जाकर स्वयं देखना चाहिए कि मालती गई तो गई कहाँ और वह हलवाई की दुकान पर जाकर चाय-नाश्ता भी कर आयेगा। मलिक ने जैसे ही कपड़े बदलने के लिए कपड़ों की अलमारी खोली तो उसके हाथों के तोते उड़ गये। मालती के सारे कपड़े गायब। एक ही छलाँग में वह स्टोररूम में पहुँचा तो देखा कि दो बड़े सूटकेस भी नहीं थे। नीचे के ट्रंक को खोला तो गहने नहीं थे। अब तक मलिक दिल धड़कते हुए, सीना फाड़कर बाहर आने को था। पसीने से तरबतर वह किसी तरह से बरामदे में आया। सामने बालकनी की दिशा में देखा जसपाल के कमरे का दरवाज़ा चौपट खुला है। कोई रेडियो की आवाज़ नहीं...। लपकता हुआ मलिक ऊपर पहुँचा तो वहाँ पर भी वही दृष्य...। सारा सामान बड़ी सफाई से गायब! मलिक को समझते देर नहीं लगी। किसी तरह से गिरता पड़ता नीचे बरामदे में आया। घुटनों में दम नहीं था। बरामदे के खम्भे के सहारे पीठ लगा कर खड़ा-खड़ा ज़ोर से चिल्लाया – मालती... जसपाल!! टाँगों ने बिल्कुल जबाव दे दिया- सरकते हुए नीचे फर्श पर टाँगे पसार कर बैठ गया। सिर यूँ चक्कर खा रहा था कि मानों किसी ने भारी भरकम हाथ से थप्पड़ मारा हो। हाँ! मालती का थप्पड़! मलिक की लुंगी खुल चुकी थी। वह नग्नावस्था में, निर्वाक बैठा था। सारे आहते के लोगों के सामने। वही लोग जो उसके डर के मारे अन्दर घुस जाते थे आज उसे इस दयनीय हालत में देख कर मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे।

कल रात मलिक के सो जाने के तुरन्त बाद ही पूरा आहात क्रियाशील हो गया था। जसपाल भी समय से पहले घर लौट आया था और सामान बाँध कर अपने कमरे में प्रतीक्षा कर रहा था। गाड़ी की टिकटें आज सामने वाले शर्मा जी दिन में ही ला चुके थे। पड़ोसनों ने भी शकुन के सभी साजो-सामान तैयार कर लिए थे। पड़ौस के इंजीनियर लड़के अपने स्कूटर पर जाकर ताँगा ले आये। मौसी ने पूरी रीत के साथ जसपाल और मालती की बलाएँ उतारीं और झोली में शगुन डाला। आहाते के सभी बज़ुर्गों के पाँव छू दोनों ने आशीर्वाद लिए। लड़कों ने सामान ताँगे में रखा और हाथ लगा के ताँगा यूँ आगे बढ़ाया जैसे कि बहिन की डोली विदा कर रहे हों। मौसी को लगा कि आज उसकी बेटी की डोली उठी है। उसी तरह वह प्रसन्न और उदास दोनों ही थी।

सभी देर तक गेट पर ताँगे के मोड़ पर ओझल हो जाने की प्रतीक्षा करते रहे।

और फिर नाटक के अन्तिम दृष्य की प्रतीक्षा जिसका पटाक्षेप अब हो रहा था।

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